बॉम्बे हाई कोर्ट: शाहरुख खान से रिश्वत मांगने की जांच को लेकर सीबीआई से मांगा जवाब, ट्रायल कोर्ट के दोषी व्यक्ति को मृत्युदंड मामले में गंभीर प्रश्न उठे

शाहरुख खान से रिश्वत मांगने की जांच को लेकर सीबीआई से मांगा जवाब, ट्रायल कोर्ट के दोषी व्यक्ति को मृत्युदंड मामले में गंभीर प्रश्न उठे
  • अदालत ने समीर वानखेड़े को रिश्वत मांगने को लेकर हलफनामा दाखिल करने का दिया निर्देश
  • वानखेड़े के अभिनेता शाहरुख खान से रिश्वत मांगने की जांच को लेकर सीबीआई से मांगा जवाब
  • अदालत ने ट्रायल कोर्ट को नए सिरे से सुनवाई करने का दिया आदेश

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के पूर्व जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के अभिनेता शाहरुख खान से 25 लाख रुपए रिश्वत मांगने की जांच को लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह के लिए टल गई है। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति सुमन श्याम की पीठ के समक्ष रशीद खान पठान की याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान वानखेड़े की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील आबाद पोंडा ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने कोई भी रिश्वत नहीं लिया, बल्कि रिश्वत किसी और ने ली थी। सीबीआई द्वारा अब तक इस मामले में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है, जिससे आरोपों की गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं। हाई कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई से ठोस सबूत पेश करने का निर्देश दिया था। समीर वानखेड़े ने 2023 में हाई कोर्ट का रुख किया था और उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा भी दी थी। सीबीआई इस मामले में जांच जारी होने की बात कह रही है। पीठ ने सीबीआई की लंबे समय से चल रही जांच पर सवाल उठाते हुए उससे जवाब मांगा है। पीठ ने वानखेड़े को भी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। क्रूज ड्रग्स केस में एनसीबी ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, जिसमें शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान भी शामिल थे। आरोप था कि वानखेड़े और चार अन्य लोगों ने शाहरुख खान से 25 करोड़ रुपए की रिश्वत मांगी थी। यह रकम शाहरुख खान के बेटे आर्यन को केस में फंसाने से बचाने के बदले मांगी गई थी। जबकि वानखेड़े ने इन आरोपों से इनकार किया है।

7 वर्ष की बच्ची के साथ दुराचार कर हत्या का मामला, बिना उचित वकील के ट्रायल न्याय का उल्लंघन है

उधर दूसरे मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 वर्ष की बच्ची के साथ दुराचार कर हत्या के मामले में दोषी को मौत की सजा दिए जाने को लेकर ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना उचित वकील के ट्रायल न्याय का उल्लंघन है। मृत्युदंड जैसे मामलों में कोर्ट को और ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। इस केस में आरोपी को सही मौका नहीं मिला है। इसलिए सजा पर फैसला देना उचित नहीं है। न्यायमूर्ति सारंग वी. कोतवाल और न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटील की पीठ ने विलास अन्नासाहेब महाले की याचिका पर कहा कि ट्रायल कोर्ट की अनावश्यक जल्दबाजी ने एक नाबालिग के दुराचार कर हत्या के मामले में निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार से समझौता किया है। नासिक ट्रायल कोर्ट द्वारा हर चरण पर निष्पक्ष सुनवाई की प्रक्रिया का उल्लंघन और अनावश्यक जल्दबाजी की गई है। पीठ ने कहा कि यह केस दोषी या निर्दोष तय करने का नहीं था, बल्कि यह तय करने का था कि क्या ट्रायल न्यायपूर्ण था? हमारा जवाब नहीं है। इसलिए पूरा ट्रायल रद्द किया जाता है और ट्रायल कोर्ट को नए सिरे सुनवाई करने का निर्देश जाता है। आरोपी द्वारा (सुनवाई के दौरान) नियुक्त वकील की गुणवत्ता और क्षमता पर कोई टिप्पणी किए बिना हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि जिरह (क्रास एक्जामिन) उन बुनियादी मानकों को पूरा नहीं करती, जो ऐसे गंभीर मामलों में आवश्यक होते हैं। पीठ ने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने सुनवाई पूरी करने में अनावश्यक जल्दबाजी दिखाई है। निस्संदेह यह एक गंभीर मामला था और सुनवाई में तेजी लाने की आवश्यकता थी, लेकिन ऐसा निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों की कीमत पर नहीं किया जा सकता था। यह अपराध गंभीर और बेहद संगीन है। पीड़िता का परिवार अभी भी न्याय का इंतजार कर रहा है, लेकिन साथ ही आरोपी के पास भी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है, जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता है। अभियोजन पक्ष के अनुसार 24 अप्रैल 2017 को गांव में एक धार्मिक समारोह चल रहा था, जब पीड़िता को उसकी मां ने आइसक्रीम खरीदने के लिए 5 रुपए दिए। आरोपी उसे रास्ते में मिला और उससे तंबाकू खरीदने के लिए कहा और उसे पैसे दिए। उसने एक दुकान से तंबाकू खरीदी और अपने लिए एक चॉकलेट ली। वह तंबाकू उसके घर ले गई। आरोप है कि याचिकाकर्ता ने अपने घर में उसके साथ दुराचार किया और उसकी हत्या कर दी। उसे अगले दिन दूसरे गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। ट्रायल कोर्ट ने मुख्य आरोपी को फांसी की सजा सुनाई और बाकी आरोपियों को 7 साल की सजा दी। पीठ ने पाया कि आरोपी को वकील नहीं मिला था। कई महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही के समय कोई वकील मौजूद नहीं था। पीठ ने ट्रायल कोर्ट का पूरा फैसला रद्द दिया और मामला वापस ट्रायल कोर्ट को नए सिरे से सुनवाई करने के लिए भेज दिया।

Created On :   24 March 2026 8:35 PM IST

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