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बॉम्बे हाई कोर्ट: बच्चे का हित देखते हुए उसे मां के साथ भारत में रहने उचित, दाभोलकर हत्याकांड में दोषी कलास्कर को जमानत

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक पिता की बेटे परवरिश के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर अपने फैसले में कहा कि बच्चे का हित सर्वोपरि है। उसके हित देखते हुए उसे मां के साथ भारत में रहने देना ही उचित है। इंग्लैंड भेजना सही नहीं है। अदालत ने डॉक्टर पिता को बच्चे की कस्टडी देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति सारंग वी. कोटवाल और न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटील की पीठ ने डॉ. श्रेयस दिलीप मांद्रे की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए कहा कि मां इंग्लैंड में स्थायी रूप से नहीं रह सकती है। उसके अमेरिका जाना भी संभव नहीं है। अगर बच्चे को इंग्लैंड भेजा गया, तो वह मां से लंबे समय तक अलग हो सकता है। यह बच्चे के लिए नुकसानदायक होगा। पीठ ने याचिकाकर्ता के व्यवहार पर चिंता जताते हुए कहा कि पिता ने बच्चे के पासपोर्ट नवीनीकरण में सहयोग नहीं किया। यह बच्चे के हित के खिलाफ है। वह भारत में मां के साथ रहना चाहता है। बच्चे का भारत में रहना फिलहाल उचित है। वह भारत में पढ़ रहा है और ठीक है। पिता भारत आकर बच्चे से मिल सकता है। बच्चे को इंग्लैंड भेजने का आदेश नहीं दिया जाएगा। मां के पास बच्चे के परवरिश का अधिकार बना रहेगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि मां ने पहले ही बांद्रा में फैमिली कोर्ट में तलाक, गुजारा भत्ता और बच्चे की परवरिश के लिए एक याचिका दायर कर दी है। पिता उन कार्यवाहियों में हिस्सा ले सकते हैं। वह कोर्ट अपने सामने आई याचिका पर कानून के मुताबिक फैसला करेगा। मां ने उन राहतों के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वह एक सही उपाय है, जहां दोनों पक्षों को सबूत पेश करके अपना पक्ष साबित करने का बराबर मौका मिलता है। हम इस याचिका को मंजूर करने के पक्ष में नहीं हैं। पिता ने भारत में याचिका दायर कर दावा किया कि बच्चे को इंग्लैंड भेजा जाए। वर्तमान में मां के पास बच्चे की कस्टडी अवैध है। इंग्लैंड कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ है। बच्चे का भविष्य इंग्लैंड में बेहतर है। मां अपने फायदे के लिए बच्चे को भारत लेकर आई। मां की ओर से दलील दी गई कि इंग्लैंड में उसका वीजा रद्द हो गया था। इसलिए मजबूरी में भारत आई है। उसने घरेलू हिंसा के आरोप लगाए और दावा किया कि बच्चा उसके साथ सुरक्षित है।
बॉम्बे हाई कोर्ट से नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड में दोषी शरद कलास्कर को मिली जमानत
उधर बॉम्बे हाई कोर्ट से नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड में दोषी शरद कलास्कर को जमानत मिली। उन्होंने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ याचिका पर सुनवाई लंबित रहने तक जमानत मांगी थी। 10 मई 2024 को पुणे सेशन कोर्ट ने सचिन अंदुरे और शरद कलास्कर को दाभोलकर की हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति आर.आर.भोंसले की पीठ ने शरद कलास्कर की याचिका को स्वीकार करते हुए जमानत दे दी। 67 वर्षीय दाभोलकर अंधविश्वास विरोधी संगठन ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति' के संस्थापक थे। 20 अगस्त 2013 को जब वह पुणे में सुबह की सैर पर थे, तो इस दौरान मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावरों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें कथित तौर पर कट्टरपंथी संगठन ‘सनातन संस्था' से जुड़े लोगों द्वारा गोली मारी थी। शुरुआत में इस मामले की जांच पुणे के डेक्कन पुलिस स्टेशन ने की थी। उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर की याचिका के बाद 2014 में जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। पुणे सेशन कोर्ट ने सचिन अंदुरे और शरद कलास्कर को दाभोलकर की हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालांकि उन्हें गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और शस्त्र अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया था। अदालत ने अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए वीरेंद्र सिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को भी बरी कर दिया। कलास्कर ने हाई कोर्ट में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी। उन्होंने अपनी अपील पर सुनवाई लंबित रहने तक जमानत मांगी थी।
Created On :   29 April 2026 9:46 PM IST
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