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बॉम्बे हाई कोर्ट: कर्मचारी को ठीक से बचाव का मौका नहीं मिलना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, जंगल की जमीन पर अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि किसी कर्मचारी को ठीक से बचाव का मौका नहीं मिला, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है। अदालत ने 32 साल बाद मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के कर्मचारी की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और उसे बर्खास्तगी से सेवानिवृत्ति की तारीख तक सभी बकाया पेमेंट की राशि देने का आदेश दिया है। अदालत ने कर्मचारी के खिलाफ केंद्रीय सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के फैसले को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकल पीठ ने बाबासाहेब वाघमारे की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि जब क्रिमिनल कोर्ट ने गंभीर संदेह जताया और सबूत कमजोर थे, तब केवल उसी आधार पर कर्मचारी को नौकरी से निकालना गलत है। न्यायालय ने कर्मचारी को पूरा न्याय देते हुए उसकी सेवा और आर्थिक अधिकार बहाल कर दिए थे। सामान्यत क्रिमिनल केस में विभागीय जांच को उचित संदेह से परे नहीं माना जा सकता है। इस केस में क्रिमिनल कोर्ट ने गंभीर कमियां बताई थी। चोरी का सामान कहां से आया? उसका मालिक कौन था? यह पता नहीं चल सका था। उसी कमजोर सबूत के आधार पर विभागीय जांच में भी इस्तेमाल हुए किए गए। पीठ ने माना कि 4 साल की अनुचित देरी को विभाग ने कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया। इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल है। कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज चार्जशीट में नहीं थे। पोर्ट ट्रस्ट की ओर से नए दस्तावेज देर से पेश किए गए। इससे कर्मचारी को ठीक से बचाव का मौका नहीं मिला, यह प्रकृति न्याय का उल्लंघन है। इस मामले में सजा बहुत कठोर दिया गया। सबूत कमजोर थे, फिर भी अधिकतम सजा देना गलत था। पीठ ने यह भी कहा कि विभागीय जांच निष्पक्ष नहीं थी। कर्मचारी के खिलाफ सबूत कमजोर और अविश्वसनीय थे। देरी और प्रक्रिया की गलतियों से कर्मचारी को गंभीर नुकसान हुआ है। इसलिए कर्मचारी के खिलाफ ट्रिब्यूनल का फैसला और बर्खास्तगी को रद्द किया जाता है। कर्मचारी को सेवानिवृत्ति तक सेवा में माना जाएगा। पूरा पिछला वेतन दिया जाएगा। इसके साथ पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ दिए जाएंगे। पोर्ट ट्रस्ट को कर्मचारी के बकाया वेतन को 12 हफ्ते में भुगतान करने का आदेश दिया है।। ऐसा नहीं करने पर बकाया वेतन पर ब्याज देना होगा। याचिकाकर्ता वाघमारे पर आरोप था कि वह 1994 में इलेक्ट्रॉनिक सामान चोरी करते हुए पकड़ा गया था। उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 379 के तहत क्रिमिनल केस दर्ज हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने 1998 में उन्हें बरी कर दिया और कहा कि गवाहों में गंभीर विरोधाभास थे। चोरी किए गए सामान का मालिक कौन है? यह साबित नहीं हुआ। ऐसे में कर्मचारी को झूठा फंसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट ने अपने कर्मचारी वाघमारे के खिलाफ 4 साल बाद 1998 में विभागीय जांच शुरू की और जांच अधिकारी ने उसके खिलाफ आरोप को साबित मान लिया और उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। वाघमारे ने पोर्ट ट्रस्ट के फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल में अपने निर्णय में जांच को सही माना और बर्खास्तगी को सही ठहराया। इसके बाद उन्होंने ट्रिब्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
जंगल की जमीन पर अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं दिया जा सकता...बॉम्बे हाई कोर्ट
उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि जंगल की जमीन पर अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं दिया जा सकता है। अदालत ने जहीर उस्मान वाडिया के दो अवैध निर्माण के खिलाफ वन विभाग की कार्रवाई को उचित ठहराया है। वन विभाग ने 4 और 7 मार्च 2024 को दो अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए नोटिस भेजा है। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने जहीर उस्मान वाडिया की याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का कोई वैध मालिकाना हक नहीं है। दो निर्माण अवैध अतिक्रमण हैं। वन विभाग की कार्रवाई कानूनी और उचित है। उप-विभागीय वन अधिकारी को संरक्षित वन, आरक्षित वन और वन विभाग के स्वामित्व वाली किसी भी अन्य भूमि पर अवैध रूप से काबिज व्यक्तियों को बेदखल करने की शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है। ये शक्तियां राज्य सरकार द्वारा 30 जनवरी 1997 को जारी सरकारी प्रस्ताव के माध्यम से उप-विभागीय वन अधिकारी को सौंपी गई हैं। उप-विभागीय वन अधिकारी ने याचिकाकर्ता को 20 फरवरी 2024 को एक नोटिस जारी किया है, जिसमें उसे नोटिस प्राप्त होने के 3 दिनों के भीतर अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया गया है। पीठ ने कहा कि वन अधिकारी के हलफनामे में याचिकाकर्ता को नोटिस तामील कराने के लिए किए गए प्रयासों के बारे में भी बताया गया है, लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि वह मौके पर नहीं मिला और नोटिस इमारत के प्रवेश द्वार के बाहर एक प्रमुख स्थान पर चिपका दिए गए थे। इस संबंध में 22 फरवरी 2024 को एक पंचनामा भी तैयार किया गया था। इसलिए सहायक वन संरक्षक का यह पक्ष है कि याचिकाकर्ता ठाणे जिला के भिवंडी तहसील स्थित राहुड़ गांव का निवासी नहीं है। उसका सटीक पता किसी भी रिकॉर्ड में नहीं मिलता है। इसलिए भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों के तहत बेदखली की कार्यवाही शुरू करने के लिए जारी किए गए वैधानिक नोटिस रिकॉर्ड में उपलब्ध अंतिम ज्ञात पते पर जारी किए गए थे। पीठ ने यह भी कहा कि हमें ऐसा नहीं लगता कि याचिकाकर्ता उस जमीन पर अपना मालिकाना हक होने का दावा कर रहा है। याचिका में दी गई दलीलों के अनुसार भी उसने कहीं भी यह नहीं कहा है कि सर्वे नंबर 48 (बी) वाली जमीन का मालिक वह स्वयं है, बल्कि दलील तो इसके विपरीत यह है कि वह केवल उस जमीन पर लंबे समय से काबिज है, जिस पर उसने अवैध निर्माण किए हैं। इसलिए हमें याचिका में मांगी गई उन राहतों में कोई औचित्य नजर नहीं आता, जिनमें 4 मार्च 2024 और 7 मार्च 2024 की तारीख वाले नोटिस को रद्द करने और निरस्त करने की मांग की गई है।
Created On :   29 March 2026 9:42 PM IST





