शुरुआती 5 मिनट महत्वपूर्ण: पांच साल में 25% से अधिक बढ़े हार्ट अटैक मामले, युवाओं में कार्डियक अरेस्ट का बढ़ रहा संकट

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  • 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग में अचानक होने वाली मौतों में हृदय रोग प्रमुख कारणों में शामिल
  • 30 से 40 वर्ष की उम्र में भी बढ़ रहे हार्ट अटैक के मामले, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
  • समय पर सीपीआर और एईडी की मदद से बचाई जा सकती है मरीज की जान

डिजिटल डेस्क, नागपुर। फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर को कार्डियक अरेस्ट की घटना के बाद हार्ट अटैक और हृदय संबंधी बीमारियां एक बार फिर चर्चा में हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हार्ट अटैक अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा है। 30 से 40 वर्ष की उम्र के युवाओं में भी इसका खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 5 वर्षों में हार्ट अटैक के मामलों में करीब 25% से अधिक वृद्धि होने का दावा किया जा रहा है। साल दर साल बढ़ रहे अचानक कार्डियक अरेस्ट के मामले चिंता का विषय बने हुए हैं। नागपुर के सरकारी स्वास्थ्य विभागों से मिली जानकारी के अनुसार, यह भविष्य के लिए गंभीर चुनौती का संकेत है। वहीं, कार्डियक अरेस्ट के कारण होने वाली अचानक मौतों में करीब 40% मामले 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग में पाए जा रहे हैं।

30 से 40 साल के युवाओं में बढ़े मामले

एक दशक पहले तक 30 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में गंभीर हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट को अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता था। अब इस आयु वर्ग में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। नागपुर के शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय (मेडिकल), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और अन्य प्रमुख हृदय चिकित्सा संस्थानों के आपातकालीन विभागों में पिछले 5 वर्षों में कार्डियक इमरजेंसी के मामलों में 25% से अधिक वृद्धि दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।


हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में करीब 20% ऐसे मामले होते हैं, जिनमें कोरोनरी धमनियों में 70% से अधिक ब्लॉकेज होने के बावजूद पहले से कोई गंभीर या स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। बाल हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में जन्मजात हृदय रोग और बढ़ता मोटापा आगे चलकर रक्तचाप और लिपिड असंतुलन जैसी समस्याओं का कारण बन रहा है। नागपुर जिले में हर वर्ष सैकड़ों नवजात शिशुओं में जन्मजात हृदय संबंधी विकृतियां पाए जाने की जानकारी है।

साइलेंट हार्ट अटैक बन रहा प्रमुख ट्रिगर

मानसिक तनाव, धूम्रपान, सिडेंटरी लाइफस्टाइल यानी शारीरिक गतिविधियों की कमी और अनियमित जीवनशैली 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग में हृदय संबंधी समस्याओं के प्रमुख जोखिम कारक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस आयु वर्ग में अचानक होने वाली मौतों में बड़ी संख्या हृदय रोग से जुड़ी होती है। 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में इस्केमिक हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और मधुमेह प्रमुख जोखिम कारक हैं। पुरुषों में यह जोखिम महिलाओं की तुलना में अधिक देखा जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कार्डियक अरेस्ट के बाद शुरुआती 3 से 5 मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। तत्काल सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) और जरूरत पड़ने पर डिफिब्रिलेटर (एईडी) की मदद मिलने से मरीज की जान बचने की संभावना बढ़ सकती है। कार्डियक अरेस्ट के बाद मस्तिष्क को लंबे समय तक ऑक्सीजन नहीं मिलने पर मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने लगता है।

बचाव के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी

हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार, 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, फास्टिंग ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल की जांच करवानी चाहिए। 40 वर्ष के बाद चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ईसीजी और इकोकार्डियोग्राम को नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा बनाया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम 30 से 40 मिनट व्यायाम, तेज चलना, दौड़ना या योग करना, संतुलित आहार लेना और 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेना जरूरी है। परिवार के कम से कम एक सदस्य को बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) या सीपीआर की ट्रेनिंग भी लेनी चाहिए, क्योंकि एंबुलेंस पहुंचने से पहले के शुरुआती मिनट महत्वपूर्ण हो सकते हैं।


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छाती में दर्द को नजरअंदाज न करें

छाती में दर्द या भारीपन और बेचैनी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान या अन्य जोखिम कारक होने पर ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। लगातार मानसिक तनाव, व्यायाम की कमी, अनियमित नींद, धूम्रपान और जंक-फास्ट फूड का अधिक सेवन हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

डॉ. सुनील वाशिमकर, हृदय रोग विभाग प्रमुख, मेडिकल के मुताबिक बच्चों में बढ़ता मोटापा भी चिंता का विषय है। मोटापे के कारण आगे चलकर डायबिटीज और ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ सकता है, जो हृदय रोग के प्रमुख जोखिम कारक हैं। इसलिए बचपन से ही स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित खानपान के प्रति जागरूक रहना जरूरी है।


Created On :   8 Oct 2026 8:20 PM IST

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