दवा बाज बड़े दगाबाज: एमआरपी के मायाजाल से डाल रहे हैं जेब पर डाका, सब कमीशन का खेल है बाबू.....खबर के अंदर है कुछ खास टिप्स

एमआरपी के मायाजाल से डाल रहे हैं जेब पर डाका, सब कमीशन का खेल है बाबू.....खबर के अंदर है कुछ खास टिप्स
  • सोचिए - आप जिस दवा के लिए 100 रुपए चुकाते हैं, शायद वह 10 की भी नहीं होती
  • अंदर की बात- डॉक्टर भी व्यवसायी बने, 75 फीसदी ने खुद की फार्मेसी शुरू कर दी है
  • उत्पादन से बिक्री तक चल रहा लूट का खेल

Nagpur News. चंद्रकांत चावरे| यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि जिस दवा के लिए 100 रुपए चुकाने पड़ते हैं, शायद वह दवा 10 रुपए की भी नहीं होती। जानकार इसे ‘कमीशन का खेल’ बताते हैं। नाम के भ्रम में आम लोग इस जाल में फंसते हैं। मान लीजिए किसी दवा का असली नाम (सॉल्ट) है। लेकिन इस दवा का ब्रांड बदलते ही कीमतें भी बढ़ जाती हैं। दो-चार प्रतिशत नहीं, बल्कि 500 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ जाती हैं। यानी 10 रुपए की दवा 50 रुपए तक में खरीदनी पड़ सकती है। दूसरी तरफ कुछ डॉक्टर्स ऐसे ही ब्रांड लिखकर देते हैं, जिससे संबंधित कंपनियां उन्हें मोटे पैकेज देती है।

7 प्रतिशत राहत से पहले ही बढ़े थे 100 प्रतिशत दाम

सरकार ने 12 प्रतिशत जीएसटी घटाकर 5 प्रतिशत कर दी है। जबकि सूत्रों ने बताया कि पिछले पांच सालों में दवा कंपनियों ने 100 प्रतिशत दाम बढ़ा दिये थे। ऐसे में आम जनों के लिए 7 प्रतिशत राहत कोई मायने नहीं रखती। कुछ खास दवाएं केवल अस्पताल की अपनी फार्मेसी या आसपास की विशेष फार्मेसी पर ही मिलती है। इन फार्मेसियों में ग्राहकों के लिए छूट का विकल्प खत्म हो जाता है। मजबूरी ऐसी होती है कि जितना बिल बनता है, उतना भुगतान करना पड़ता है। कुल मिलाकर दवा निर्माण से बिक्री तक सांठगांठ की श्रृंखला बनी है।

मरीज मजबूर हो जाता है

अक्सर डॉक्टर अक्सर दवा का सॉल्ट नेम लिखने की बजाय ब्रांड का नाम लिखकर देते हैं। चूंकि मरीज को इसका ज्ञान नहीं होता, इसलिए वह महंगी ब्रांडेड दवा खरीदने पर मजबूर होता है। कई डॉक्टर ऐसी दवाएं लिखते हैं, जो केवल उनके अस्पताल की फार्मेसी या किसी खास मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं। यह प्रतिस्पर्धा को खत्म करने और ग्राहकों से मनमानी कीमतें वसूलने का तरीका है।

उदाहरण से समझें कि दवाओं के दामों में फर्क कैसे होता है


दवा का नाम बीमारी ब्रांडेड दवा के दाम जेनेरिक दवा के दाम दाम का अंतर

  • एटोरवास्टेटिन 10 एमजी कोलेस्ट्रॉल 120 रु. (10 गोलियां) 20 रु. (10 गोलियां) 6 गुना अंतर
  • टेल्मिसर्टन 40 एमजी ब्लड प्रेशर 90 रु. (15 गोलियां) 15 रु. (15 गोलियां) 3.5 गुना अंतर
  • पेंटोप्राजोल 40 एमजी गैस, एसिडिटी 150 रु. (10 गोलियां) 35 रु. (10 गोलियां) 4 गुना अंतर
  • ग्लिमेपिराइड 2 एमजी शुगर 110 रु. (10 गोलियां) 15 रु. (10 गाेलियां) 7 गुना अंतर
  • इमैटिनिब 400 एमजी कैंसर 25 हजार रु. महीना 2500 रु. महीना 10 गुना अंतर

3 बड़े टिप्स- लूट से बचने जागरूक रहना जरूरी

  • डॉक्टर की पर्ची पर ब्रांड के साथ दवा का जेनेरिक (सॉल्ट) नेम भी लिखकर मांगना चाहिए।
  • दवा खरीदने से पहले सर्च इंजिन या अलग-अलग एप्स से दामों का पता कर लेना अच्छा है।
  • प्रधानमंत्री भारतीय जनौषधि केंद्रों पर 80 से 90 प्रतिशत तक दवाएं सस्ती मिलती हैं।

फार्मेसी व्यवसाय पर भी असर

सूत्रों ने बताया कि डॉक्टर अब उपचारकर्ता साथ ही व्यवसायी भी बन चुके हैं। 75 प्रतिशत डॉक्टरों ने स्वयं की फार्मेसियांं शुरू कर दी है। वे अपने रिश्तेदार या परिचितों को डिप्लोमा इन फार्मेसी करवाते हैं। बाद में दुकानें शुरू कर देते हैं। डॉक्टरों का यह नया व्यवसाय तेजी से फैल रहा है।


उत्पादन से बिक्री तक चल रहा लूट का खेल

दवा बनने से लेकर मरीज के हाथ में पहुंचने तक की प्रक्रिया में दाम कई गुना बढ़ जाते हैं। उत्पादन के दौरान दवा की मूल लागत यानी कच्चा माल और मजदूरी काफी कम होती है। असली खेल पैकेजिंग व मार्केटिंग से शुरू होता है। कंपनियां डॉक्टरों को सालाना पैकेज और कॉन्फ्रेंस ट्रिप के अलावा अलग-अलग लुभावने ऑफर देती है। वितरण सिस्टम में स्टॉकिस्ट व होलसेलर के बाद दवा रिटेलर के पास पहुंचती है। ब्रांडेड दवाओं में मार्जिन कम होती है। लेकिन जब यही दवा जेनेरिक ब्रांडेड बन जाती है, तो मार्जिन 500 से 1000 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। एक ही सॉल्ट की दो दवाओं के दाम अलग-अलग होते हैं। यहां दवा वही होती है, केवल कंपनी व ब्रांड बदलता है।

‘एक राष्ट्र, एक दवा और एक दाम’ नीति की जरुरत

स्टेट फार्मेसी काउंसिल के एक पूर्व सदस्य ने स्पष्ट किया है कि पिछले पांच सालों में दवाओं के दामों में लगभग दोगुनी वृद्धि हो चुकी है। इस पर नियंत्रण नहीं है। जीएसटी पर 7 प्रतिशत राहत का कोई लाभ नहीं है। सरकार को एक राष्ट्र, एक दवा और एक ही दाम नीति लागू करने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे देश में एक ही दवा बनानेवाली अलग-अलग कंपनियों के दवाओं के दाम अलग-अलग है।

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