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ताक पर नियम: प्रदूषण की फैक्ट्री बन रहीं गगनचुंबी इमारतें, धंतोली-रामदासपेठ में निर्माण स्थलों के आसपास धूल का कहर

Nagpur News. उपराजधानी में तेजी से खड़ी हो रही गगनचुंबी इमारतें अब विकास का प्रतीक कम और प्रदूषण की फैक्ट्री ज्यादा नजर आने लगी हैं। शहर के धंतोली और रामदासपेठ जैसे प्रमुख इलाकों में निर्माण कार्य से उठने वाली धूल ने हालात गंभीर कर दिए हैं। यहां कई बहुमंजिला इमारतों और अस्पतालों का निर्माण चौबीसों घंटे जारी है। भारी मशीनें, सीमेंट मिक्सर और रेडी मिक्स कंक्रीट ट्रकों की आवाजाही से पूरे इलाके में धूल का गुबार छाया रहता है। इसका असर न केवल मरीजों, बल्कि स्थानीय नागरिकों, दुकानदारों और राहगीरों पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
नाम बड़े, पर नियम ताक पर
धंतोली-रामदासपेठ क्षेत्र में करीब चार बड़े अस्पतालों के साथ कई हाउसिंग प्रोजेक्ट्स का निर्माण चल रहा है। ये सभी प्रोजेक्ट बड़े बिल्डर समूहों से जुड़े हैं। नियमों के अनुसार निर्माण स्थल को ग्रीन नेट से कवर करना, नियमित पानी का छिड़काव करना और ट्रकों के पहियों की सफाई अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश जगह इन नियमों का पालन नहीं हो रहा। केवल टीन शेड लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है, जबकि अंदर धूल नियंत्रण के उपाय नदारद हैं।
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हर तरफ धूल की चादर
इलाके में ऐसा कोई घर या दुकान नहीं, जहां धूल की परत न जमी हो। घरों की छतों पर लगे सोलर पैनल इसकी गवाही दे रहे हैं, जिन पर मोटी धूल की परत जमा हो चुकी है। हालात यह हैं कि लोगों को रोजाना सफाई करनी पड़ रही है। आसपास मौजूद खान-पान की दुकानों पर भी धूल का असर साफ दिखता है, जिससे खाद्य सामग्री तक प्रभावित हो रही है। स्वास्थ्य का खतरा बढ़ रहा है। धंतोली और रामदासपेठ मध्य भारत का बड़ा मेडिकल हब हैं। यहां दूर-दराज से मरीज इलाज के लिए आते हैं। धूल भरे माहौल के कारण मरीजों की स्थिति और खराब हो रही है, जबकि उनके परिजनों को भी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
जिम्मेदार बेखबर
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल और महानगर पालिका पर इन नियमों के पालन की जिम्मेदारी है। दोनों ही विभाग इस गंभीर समस्या को लेकर सुस्त नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि दोनों के मुख्यालय इन इलाकों से कुछ ही दूरी पर स्थित हैं। बावजूद इसके अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे बिल्डरों और ठेकेदारों के हौसले बुलंद हैं।
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प्रदूषण बेहद खतरनाक
डॉ. अमन देशमुख, फिजिशियन के मुताबिक धूल में मौजूद सूक्ष्म कण (पीएम 2.5 और पीएम 10) सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं। इससे अस्थमा, एलर्जी और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। खासकर अस्पतालों के आसपास इस तरह का प्रदूषण बेहद खतरनाक है, क्योंकि यहां पहले से ही कमजोर मरीज आते हैं।
गुजरना भी मुश्किल
राहुल वानखेड़े, राहगीर के मुताबिक यहां से गुजरना भी मुश्किल हो गया है। हर समय धूल उड़ती रहती है, आंखों में जलन होती है। सांस लेना तक भारी लगता है। कई बार मुंह ढंककर निकलना पड़ता है। फिर भी राहत नहीं मिलती है।
Created On :   11 April 2026 6:37 PM IST












