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भीमा-कोरेगांव हिंसा : भारद्वाज, गोन्साल्विस और फरेरा की जमानत याचिका खारिज

भीमा-कोरेगांव हिंसा : भारद्वाज, गोन्साल्विस और फरेरा की जमानत याचिका खारिज

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने मंगलवार को माओवादियों से कथित संबंध रखने व भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपी सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, वरनन गोन्साल्विस व अरुण फरेरा  की जमानत आवेदन को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपियों पर लगे आरोप सही नजर आ रहे हैं। पुलिस आरोपपत्र में आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत जोड़े हैं। लिहाजा आरोपियों के जमानत आवेदन को खारिज किया जाता है। तीनों आरोपियों को 28 अगस्त 2018 को गिरफ्तार किया गया था। पुणे पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 121,124ए, 153 व अवैध गतिविधि प्रतिबंध कानून की धारा 13, 16, 17, 18, 18बी, 38, 39 व 40 के तहत मामला दर्ज किया है। शुरुआत में तीनों आरोपियों को नजरबंद किया गया था। इसके बाद इन्हें न्यायिक हिसात में भेज दिया गया था। एक साल से तीनों आरोपी जेल में हैं। पुणे कोर्ट ने तीनों आरोपियों की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। इसलिए तीनों ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन दायर किया था। 

न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल ने तीनों आरोपियों के जमानत आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि आरोपियों पर लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही नजर आ रहे है। इसके अलावा आरोपियों पर अवैध गतिविधि प्रतिबंध कानून की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं, इसलिए इन्हें फिलहाल जमानत देना सही नहीं होगा। जहां तक बात आरोपियों  द्वारा प्रकरण से जुड़ सबूतों पर सवाल उठाने का है तो उसकी प्रमाणिकता को मुकदमे की सुनवाई के दौरान परखा जाएगा। बीते सात अक्टूबर को न्यायमूर्ति कोतवाल ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को सुुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।

इस दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील अरुणा पई ने दावा किया था कि आरोपियों के पास कई दस्तावेज मिले हैं, जो प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) से उनके कथित संबंधों को दर्शाते हैं। इनके पास प्रतिबंधित संगठन का साहित्य भी मिला है। तीनो आरोपी प्रतिबंधित संगठन के लिए भर्ती करने व वित्तीय सहयोग प्रदान के लिए काम करते थे। उन्होंने कहा कि प्रकरण में गिरफ्तार आरोपियों के पास से जो दस्तावेज मिले है। वह आरोपियों की भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में संलिप्तता को दर्शाते हैं। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ काफी ठोस सबूत इकट्ठा किए है। इसलिए इन्हें जमानत देना उचित नहीं होगा। 

वहीं भारद्वाज की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता युग चौधरी ने दावा किया था कि उनके मुवक्किल के खिलाफ पुलिस को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला है। मेरी मुवक्किल कानून की प्रोफेसर हैं। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसके अलावा उन्होंने काफी सामाजिक कार्य किए हैं। आरोपी फरेरा व गोंसाल्विस के वकीलों ने भी दावा किया कि पुलिस के पास हमारे मुवक्किल के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है। किंतु न्यायमूर्ति कोतवाल ने इससे असहमति जताते हुए आरोपियों के जमानत आवेदन को खारिज कर दिया। 
 

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