दैनिक भास्कर हिंदी: पंडालों को लेकर सभी महानगरपालिकाओं के लिए समरुप नीति बनाएं, जानिए हाईकोर्ट में कितने मामले लंबित?

April 25th, 2019

डिजिटल डेस्क, मुंबई। त्यौहारों के दौरान बननेवाले पंडालो के निर्माण की अनुमति को लेकर राज्य सरकार समरुप नीति तैयार करे और इसे सभी महानगरपालिकाओं को लागू करने को कहे। गुुरुवार को बांबे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया है। इससे पहले हाईकोर्ट को बताया गया कि कोर्ट ने काफी पहले सरकार को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक जगहों पर पंडाल के निर्माण को लेकर सभी महानगरपालिकाओं के लिए एक जैसी नीति बनाए लेकिन सरकार ने अब तक इस दिशा में पहल नहीं की है। हर महानगरपालिका की अपनी नीति होने के चलते अवैध पंडालों पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। इस बात पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति अभय ओक व न्यायमूर्ति एमएस शंकलेचा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पंडाल के निर्माण की अनुमति के विषय में समरुप नीति बनाए जिसे सभी महानगरपालिकाओं को लागू करने का निर्देश दिया जाए। सरकार के पास ऐसा निर्देश जारी करने का अधिकार है। इस बीच खंडपीठ ने पाया कि पांच महानगरपालिकाओं ने कोर्ट के आदेश के बावजूद ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे को लेकर कार्रवाई के संबंध में हलफनामा नहीं दायर किया है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि यदि अगली सुनवाई के दौरान हलफनामा नहीं दायर किया गया तो हम मालेगांव,भिवंडी,उल्हासनगर,मीरा-भायंदर व ठाणे महानगरपालिका के आयुक्त के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का नोटिस जारी करने पर विचार करेंगे। इससे पहले खंडपीठ को बताया गया कि राज्य के अलग-अलग शहरों में ‘नीरी’ को नाइज मैपिंग का कार्य को पूरा करने में अभी 12 महीने का और वक्त लगेगा। इस पर खंडपीठ ने कहा कि यह काफी लंबी अवधि है। आखिर इतना वक्त क्यों लग रहा इसकी हमे अगली सुनवाई के दौरान जानकारी दी जाए। पिछले साल गणपित व सब ए बरात त्यौहार के दौरान मुंबई में हुए ध्वनि प्रदूषण के नियमों के उल्लंघन को लेकर की गई कार्रवाई के विषय में खंडपीठ ने मुंबई पुलिस आयुक्त को हलफनामा दायर करने के लिए एक और अवसर दिया है। सरकारी वकील ने कहा कि हमे ध्वनि प्रदूषण को लेकर 377 शिकायते मिली है। इसमें से हमने 47 मामले दर्ज किए है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से चर्चा कर और शिकायते दर्ज की जाएगी। खंडपीठ ने फिलहाल मामले की सुनवाई 2 मई तक के लिए स्थगित कर दी है। 

एसटीडी व पीसीओ बूथ में खाद्य समाग्री बेचने की अनुमति देने पर हो विचार-हाईकोर्ट

वहीं दूसरे मामले में बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि दिव्यांगो को आवंटित किए जानेवाले पीसीओ अथवा एसटीडी बूथ परिसर के इस्तेमाल के संबंध में बदलाव किए जाने की जरुरत है। क्योंकि आज लोगों के बीच मोबाइल की सहज उपलब्धता बढने से सार्वजनिक जगहों में लैंडलाइन टेलिफोन का इस्तेमाल बेहद कम हो गया है।  पीसीओ अथवा एसटीडी बूथ दिव्यांग लोगों की जीविका का साधन होते है। इसलिए पीसीओ बूथ परिसर के इस्तेमाल को लेकर जारी किए जानेवाले लाइसेंस में बदलाव किए जाने की जरुरत नजर आ रही है। बूथ परिसर में लोगों को पानी की बोतल,चाकलेट,मीठाई व दूसरी खाद्य समाग्री बेचने की इजाजत दी जाए। क्योंकि यह आम लोगों की जरुरत की चीजे है।
मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नांदराजोग व न्यायमूर्ति एनएम जामदार की खंडपीठ ने  उल्हास सावंत की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। 60 प्रतिशत दिव्यंाग सावंत के पीसीओ के लाइसेंस की अवधि समाप्त हो गई थी। जिसे महाराष्ट्र स्टेट रोड टॉंसपोर्ट (एमएसआरटीसी) के अधिकारियों ने बढाने से इंकार कर दिया था। हालांकि उपजिला अधिकारी ने सावंत के बूथ के लाइसेंस की अवधि बढाने का निर्देश दिया था लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा था। इसलिए सावंत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने एमसआरटीसी के विभागीय नियंत्रक(मुंबई) को निर्देश दिया कि वह बूथ के संबंध में सावंत की ओर से दिए गए निवेदन पर आठ सप्ताह के भीतर निर्णय ले। 

हाईकोर्ट में 48 हजार से ज्यादा मामले लंबित

इसके अलावा मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में पिछले दस साल के रिकार्ड पर नजर डाले तो 48 हजार 163 मामले लंबित है। यह खुलासा आरटीआई में हुआ है। न्याय में देरी का सीधा असर पीडित पक्ष पर होता है। हालांकि हाईकोर्ट अपनी तरफ से पेंडेंसी कम करने की कोशिश में लगा है। मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के अंतर्गत नागपुर समेत पूरा विदर्भ क्षेत्र आता है। नागपुर बेंच में क्रिमिनल केसेस में एक साल से ज्यादा समय से 2254, पांच साल से ज्यादा समय से 3610 व दस साल से ज्यादा समय से 1301 मामले चल रहे है। इसतरह दस साल में हाईकाेर्ट की नागपुर बेंच में 7165 क्रिमिनल केसेस पेंडिंग है। इसीतरह दिवाणी स्वरूप के एक साल से 10891, पांच साल से 20455 व 10 साल से 9652 मामले चल रहे है। इसतरह दिवाणी (सिविल) स्वरूप के कुल 40998 मामले लंबित है। जिला कोर्ट से फैसला होने के बाद मामले हाईकोर्ट पहुंचते है। जिला व सत्र न्यायालय में इन मामलों के निपटारे में कई साल लग जाते है। यहां से निपटारा होने के बाद हाईकोर्ट में अपील होती है। हाईकोर्ट में मामले के निपटारे में देरी होने का सीधा असर पीड़ित पक्ष पर होता है। 

सिविल    40998
क्रिमिनल   7165  

कुल       48163

क्राइम रेट बढ़ने के साथ ही कार्यक्षेत्र भी बड़ा है 

क्राइम रेट बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यक्षेत्र भी काफी बड़ा है। नागपुर समेत पूरे विदर्भ के मामले यहां आते है। न्यायाधीशों की भी थोड़ी कमी है। मामले एडजर्न भी होते रहते है। न्यायपालिका पंेडेंसी कम करने का निरंतर प्रयास कर रही है। कभी-कभी शनिवार को भी न्यायपालिका काम करती है। सिविल मामले कई प्रकार के होते है, इन मामलों में शीघ्र फैसला नहीं हो पाता। पेंडेंसी में सिविल मामले बहुत ज्यादा है। जिला कोर्ट से अधिकांश मामले हाईकोर्ट पहुंच रहे है। 
-एड. राजेेंद्र डागा, विधी विशेषज्ञ. 

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