दैनिक भास्कर हिंदी: हामिद का दर्द : पाकिस्तानी जेल के तहखाने में रखा, सोना तो दूर हिलने पर भी पीटते थे

December 23rd, 2018

डिजिटल डेस्क, मुंबई। पाकिस्तान से लौटे हामिद का दर्द फूट पड़ा। उसने हाल-ए-दिल बयां करते हुए कहा कि हां, मैंने उसे माफ कर दिया है। आखिर सजा देने वाला मैं कौन? सजा देने वाले से बड़ा होता है माफ करने वाला, अब यही दुआ है कि वह जहां भी रहे, खुश रहे। मेरे साथ धोखा हुआ है। पाकिस्तान के खिलाफ कुछ करना मेरा मकसद कतई नहीं था। मैं वहां लड़की की मदद करने गया था। उस लड़की ने मुझसे कहा था कि मेरी मदद करो, मेरे घर वाले जबरदस्ती मेरी शादी करवा रहे हैं। मैंने भी पीछे हटना मुनासिब नहीं समझा। वहां पहुंचने पर मुझे पता चला कि मेरे साथ धोखा हुआ है। जिन लोगों ने मुझे रास्ता बताया, उन्होंने ही जाल बिछा रखा था। जब पाकिस्तान में एक लॉज से मुझे गिरफ्तार किया गया, तब मुझे अहसास हुआ कि अब हिंदुस्तान लौट पाना मेरे लिए मुश्किल होगा। मुझे कैद करने के बाद ऐसी जगह रखा था, जहां से पता ही नहीं चलता था कि दिन है या रात। जमीन के 15 फीट नीचे तहखाने में पड़ा रहता था। न ठीक से खाने के लिए कुछ दिया जाता था और न ही कोई अन्य सुविधा। पड़े रहो और अपनी रिहाई की दुआ करो। पाकिस्तान के अफसर कभी भी आते। पूछताछ के लिए ले जाते। फिर लौट जाते। मुझे आज भी याद है। सर्दी की रात थी। पूरा हफ्ता मुझसे पूछताछ की गई। पूरा हफ्ता पैरों पर खड़ा रहने को कहा गया। वह भी बिना सोए।आंखों पर पट्टी बंधी थी। हिलता तो वार होता। एक हफ्ते बाद आंखों की पट्टी खोली गई। सच कहूं तो सामने अफसर था, पर मुझे झरने और पहाड़ दिखाई दे रहे थे। पूरा हफ्ता न सोने की वजह से मुझे वहम हो रहा था। महीने बीते, लेकिन कुछ भी नहीं बदला। अफसर आते, मारपीट करते, न कोई दोस्त, न हमदर्द। कैदी भी एक-दूसरे से बात नहीं करते थे। क्या जाने, इसकी वजह से फिर तकलीफ सहनी पड़ जाए। हर दिन पिछले दिन से मुश्किल होता था। ईद के दिन थोड़ी राहत होती। न मारपीट होती और न ही टॉर्चर। जेल की कैंटीन में सिंवइयों की खीर बनती और अगला दिन फिर दर्द से भरा।

पाकिस्तानी अफसर भी जानते थे कि मैं बेगुनाह हूं। वे कहते थे कि तुम एक पका-पकाया फल हो, जो हमारे हाथ आ गया है। हमें पता है कि तुमने कोई गुनाह नहीं किया। लेकिन तुम एक हिंदुस्तानी हो। इसी वजह से यहां हो। इन बातों ने मेरा धीरज बनाए रखा। मैंने कहा- अगर यही तुम्हारा इंसाफ है। तो मेरे लिए मदद का कोई रास्ता भी होगा। छह साल में हर एक दिन, एक-एक पल गुजारना मुश्किल था। पर भरोसा था कि मैं एक दिन वतन लौटूंगा। अपनी मां के पास लौटूंगा। हालांकि मैंने पाकिस्तान में वैध तरह से जाने की कोशिश की थी। पाकिस्तान हाई-कमीशन से पूरे दस महीने तक आधिकारिक तौर पर वीजा के लिए आवेदन किया था। वीजा मिल नहीं रहा था। इस दौरान मुझे उकसाया गया। कहा गया कि ‘भाई वीजा के चक्कर में मत पड़ो'। अफगानिस्तान के रास्ते आ जाओ। मैं जज्बाती हो गया। दिमाग के बजाय दिल से सोचा। जो नहीं करना था, वह कर बैठा।

इन छह सालों में दुआ करने के अलावा मेरे हाथ में कुछ नहीं था। दिमाग में चल रहा था कि ऊपरवाले, कोई तो रास्ता बना तू तो जानता है कि मैंने कोई गुनाह नहीं किया। जब मैं अटारी-वाघा बॉर्डर के उस पार पाकिस्तान में था, तब हर बीतते पल के साथ मेरी धड़कनें तेज हो रही थीं। फिर दरवाजा खुला। सीमा के इस पार मुझे मेरी मां, पापा और मेरा भाई दिखे। छह साल बाद उन्हें मैंने देखा। मैं इस मंजर को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। जब सीमा पार कर भारत आया तो सुकून मिला। मेरे जीवन का वह काला अध्याय मैं कभी नहीं भूल सकता।  पर मुझे आगे बढ़ना है। मेरे माता-पिता और भाई के लिए। उन लोगों ने भी मेरे साथ सजा भुगती है। मेरे भविष्य के सुनहरे सपने मुझे बुला रहे हैं। 15 फीट नीचे तहखाने में रखा, एक हफ्ते आंखों पर पट्टी बांधे रखी, 6 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने वाले भारतीय हामिद की कहानी, उन्हीं की जुबानी।