दैनिक भास्कर हिंदी: ‘नो एडमिशन’श्रेणी में डाले गए शैक्षणिक संस्थान को हाईकोर्ट से राहत

May 30th, 2019

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने लाइब्रेरी में जरुरी संख्या में किताबे न होने के आधार पर कालेज को ‘नो एडमिशन’की श्रेणी में डाले गए कालेज को राहत प्रदान की है।  हाईकोर्ट ने आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एज्युकेशन (एआईसीटीई) को निर्देश दिया है कि वह नवयुग विद्यापीठ ट्रस्ट को अपनी बात रखने का एक और मौका प्रदान करे। ताकि वह कालेज से जुड़ी कमियों को खत्म करने की दिशा में उठाए गए कदमों की जानकारी एआईसीटीई को दे सके। यदि कालेज को नो एडमिशन की श्रेणी में डाल दिया जाता है तो वहां कालेज दाखिले के अपात्र हो जाता है। एआईसीटीई ने पिछले दिनों नवयुग विद्यापीठ ट्रस्ट के कालेज को नो एडमिशन की श्रेणी में डाल दिया था। एआईसीटीई के अनुसार ट्रस्ट के कालेज में नियमानुसार कालेज की लाइब्रेसी में जितनी संख्या में किताबे होनी चाहिए उतनी किताबे नहीं है। इसके अलावा ट्रस्ट ने अपने कालेज का डिजाइन भी नहीं सौपा है। एआईसीटीई के इस निर्णय के खिलाफ ट्रस्ट ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अवकाशकालीन न्यायमूर्ति भारती डागरे व न्यायमूर्ति एनजे जमादार की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। ट्रस्ट ने याचिका में दावा किया था कि उसका कालेज 1993 में स्थापित किया गया था। ट्रस्ट ने अपने संस्थान की कमियों को काफी पहले ही दूर कर लिया था। ट्रस्ट की ओर से सक्षम प्राधिकरण की ओर से मंजूर की गई कालेज की डिजाइन व कालेज के लिए जरुरी किताबों की खरीददारी से जुड़ी जानकारी एआईसीटीई को सौप दी गई थी। लेकिन एआईसीटीई ने ट्रस्ट द्वारा सौपी गई जानकारी पर  न तो गौर किया गया और न ही ट्रस्ट को अपनी बात रखने का अवसर दिया । एआईसीटी का रुख नैसर्गिक न्याय के सिध्दांत के खिलाफ है। ट्रस्ट की ओर से दायर याचिका पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने एआईसीटीई को ट्रस्ट को अपनी बात रखने के लिए एक अवसर प्रदान करने का निर्देश दिया। खंडपीठ ने कहा कि एआईसीटीई ट्रस्ट की ओर से पेश किए जानेवाले दस्तावेजों पर गौर करके 31 मई तक पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करे। 

27 सप्ताह के भ्रूण के गर्भपात की अनुमति के लिए महिला ने हाईकोर्ट में दायर की याचिका

इसके अलावा एक महिला ने अपने 27 सप्ताह के भ्रूण के गर्भपात की अनुमति दिए जाने की मांग को लेकर बांबे हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में महिला ने निजी अस्पताल में कराई गई सोनोग्राफी रिपोर्ट के आधार पर दावा किया है कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के नाक में हड्डी नहीं है। ओठो में काफी उभरा है। जिससे बच्चे के चेहरे का आकार मेढक जैसे होने का आभास होता है। इसके अलावा भ्रूण में कई विकार व विसंगतिया है। लिहाजा उसे गर्भपात की अनुमति दी जाए। अवकाशकालीन न्यायमूर्ति भारती डागरे व न्यायमूर्ति एनजे जमादार की खंडपीठ के सामने महिला की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड को महिला की जांच करने का निर्देश दिया और अपनी रिपोर्ट 31 मई को कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया। नियमानुसार 20 सप्ताह से अधिक के भ्रूण का गर्भपात अदालत की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता है। लिहाजा महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। 

कार्यस्थल पर महिला के यौन उत्पीड़न पर हाईकोर्ट ने अपना कड़ा रुख

बांबे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिला के यौन उत्पीड़ने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी प्रकाश साल्वे को जमानत दी जाती है तो वह मामले से जुड़े सबूतों के साथ छेड़छाड कर सकता है। यहीं नहीं आरोपी को जमानत देने से मामले की जांच प्रभावी तरीके से नहीं हो पाएगी। प्रथम दृष्टया मामले से जुड़े सबूत पीड़ित महिला द्वारा कार्यस्थल पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों में दम नजर आ रहा है। इसलिए आरोपी की जमानत अर्जी खारिज की जाती है। पीड़ित महिला ने आरोपी के खिलाफ दादर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में महिला ने दावा किया है कि आरोपी उसके साथ न सिर्फ छेड़छाड करता था बल्कि उस पर अश्लील टिप्पणियां भी करता था। महिला के अनुसार आरोपी ने उससे शारीरिक सुख की भी मांग की थी। यहीं नहीं आरोपी ने मेरे ड्रावर से 50 हजार रुपए व उसमें रखी सोने की दो चूडिया चुरा ली है। महिला की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354,354 ए व 380 के तहत मामला दर्ज किया था। मामले में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए साल्वे ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत अर्जी दायर की थी। अवकाशकालीन न्यायमूर्ति एनजे जमादार के सामने साल्वे की जमानत पर सुनवाई हुई। इस दौरान साल्वे के वकील ने दावा किया कि मेरे मुवक्किल को इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है। मेरे मुवक्किल ने शिकायतकर्ता को उसके दायित्वों का सही तरीके से निवर्हन करने को कहा था। जिससे शिकायतकर्ता नाराज हो गई थी। इसलिए उसने मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। मेरे मुवक्किल पर लगाए गए आरोप निराधार है। वहीं अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी पर गंभीर आरोप है। उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरुरी है। यदि आरोपी को जमानत प्रदान की जाती है तो वह मामले से जुड़े गवाहों को प्रभावित कर सकता है। अभियोजन पक्ष की दलीलों को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति ने आरोपी को जमानत देने से इंकार कर दिया।