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मनमाड में फंसे महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूरों को रेलवे अधिकारी ने अपने खर्चें पर पहुंचाया मराठवाड़ा 

मनमाड में फंसे महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूरों को रेलवे अधिकारी ने अपने खर्चें पर पहुंचाया मराठवाड़ा 

डिजिटल डेस्क, मुंबई। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही वाराणसी में फंसे महाराष्ट्र के 22 प्रवासी मजदूरों को जब 2 जून को वाराणसी से विशेष श्रमिक ट्रेन में बैठने की इजाजत मिली, तो उन्हें लगा कि उनकी परेशानियां खत्म हो गई, लेकिन बुधवार रात 10 बजे जब यह लोग मनमाड स्टेशन पर उतरे, तो उन्हें पता चला की वे एक नई मुसीबत में फंस गए हैं। मराठवाड़ा के इन प्रवासी मजदूरों के लिए घर तक पहुंचने की कोई व्यवस्था नहीं थी। चक्रवात ‘निसर्ग’ के चलते हो रही बारिश की वजह से वे स्टेशन के बाहर तक नहीं जा सकते थे। मजदूरों के पास खाने-पीने और यात्रा के लिए पैसे भी नहीं थे। महिलाओं और बच्चों समेत सभी प्रवासी मजदूर करीब 24 घंटे रेलवे स्टेशन पर ही फंसे रहे। इसके बाद इनके खाने पीने की व्यवस्था कर रहे रेलवे अधिकारी ने ही आगे बढ़कर इनकी मदद की और अपने खर्च से इनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की।

मध्य रेलवे के भुसावल डिवीजन के वाणिज्य निरीक्षक मिलिंद थीगाले ने अपनी जेब से करीब तीन हजार रुपये खर्च कर इन यात्रियों के खाने पीने की व्यवस्था की और आखिरकार जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए, तो अपने पास से ही तीन हजार रुपए और खर्च कर प्रवासी मजदूरों के लिए निजी वाहन की व्यवस्था की। मिलिंद ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि वाराणसी से आ रही श्रमिक विशेष गाड़ी में करीब 35 यात्रियों के लिए खाने पीने की व्यवस्था करनी है। ट्रेन पहुंची तो वे खाने पीने का सामान लेकर यात्रियों के पास गए लेकिन उनमें से 22 यात्री मनमाड रेलवे स्टेशन पर ही उतर गए। उन्होंने इसकी वजह पूछी तो यात्रियों ने बताया कि उन्हें जालना और नांदेड जाना है इसलिए मुंबई जाकर लौटना उनके लिए और मुश्किल होगा।

इस दौरान भारी बारिश हो रही थी और नांदेड के लिए अगली गाड़ी सुबह थी। इसलिए यात्रियों को रेलवे स्टेशन पर ही समय बिताने की इजाजत दे दी गई लेकिन अगली सुबह जब नांदेड के लिए रेल गाड़ी आयी तो उस पर मौजूद अधिकारियों ने श्रमिकों को यह कहते हुए उस पर चढ़ने की इजाजत नहीं दी कि उनका टिकट वाराणसी से मुंबई तक का है और उस गाड़ी में सफर के लिए उनके पास कोई टिकट या इजाजत नहीं है। प्रवासी मजदूरों के पास किसी तरह के दस्तावेज या मेडिकल सर्टिफिकेट भी नहीं थे। इसलिए कोरोना संक्रमण के खतरे का हवाला देते हुए उन्हें रेलवे में जगह नहीं दी गई।

प्रशासन ने खड़े किए हाथ

मिलिंद ने बताया कि उन्होंने संबंधित जिलाधिकारियों से प्रवासी मजदूरों की परेशानी के बारे में बात की और उनकी यात्रा की व्यवस्था करने को कहा लेकिन सभी ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि उन्हें प्रवासी मजदूरों के लिए 1 जून तक ही पैसे खर्च करने की इजाजत थी। यह समय सीमा खत्म हो चुकी है इसलिए वह पैसे की व्यवस्था नहीं कर सकते। स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी किसी तरह की मदद नहीं की। इस बीच करीब 24 घंटे तक यात्री मनमाड स्टेशन पर ही फंसे रहे और मिलिंद उनके खाने-पीने की व्यवस्था करते रहे। आखिरकार औरंगाबाद के जिलाधिकारी ने उन्हें कहा कि अगर प्रवासी मजदूरों को उनकी सीमा तक पहुंचा दिया जाए तो वह आगे उनकी व्यवस्था कर सकते हैं। इसके बाद मिलिंद ने अपने पास से पैसे खर्च कर यात्रियों के लिए निजी गाड़ी की व्यवस्था की और उन्हें औरंगाबाद जिले की सीमा तक पहुंचाया। वापस लौटे यात्रियों में से एक अभिमान गायकवाड के मुताबिक वे सभी लोग वाराणसी में टेलीफोन की अंडरग्राउंड केबल बिछाने के काम के लिए गए थे लेकिन 21 मार्च को उनके पहुंचने के बाद लॉकडाउन हो गया। उनका काम भी रुक गया ऐसे में सभी लोग बेरोजगार हो गए। वापसी के लिए पैसे नहीं थे इसलिए वे वाराणसी स्टेशन के पास एक जगह पर रुककर लॉकडाउन खुलने का इंतजार कर रहे थे। इसी दौरान रेलवे अधिकारियों की नजर उन पर पड़ी और उन्हें वापस भेजने की व्यवस्था की गई। 

वाराणसी में थे मेहमान, अपने राज्य में सौतेला व्यवहार

गायकवाड कहते हैं हमें अपने गृह राज्य में इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने बताया कि वाराणसी में हमें मेहमान की तरह रखा गया था। हमारी सुख सुविधा का ख्याल रखा गया। गर्मी से बचाने के लिए हमारे लिए कुलर लगाया गया था। लेकिन अपने ही राज्य में पराए जैसे व्यवहार से हम दुखी हैं। 

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