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हाईकोर्ट : 2 जून तक जरूरी मामलों की होगी सुनवाई, नियमित चाहते हैं वकील, मुख्य न्यायधीश को लिखा था पत्र

हाईकोर्ट : 2 जून तक जरूरी मामलों की होगी सुनवाई, नियमित चाहते हैं वकील, मुख्य न्यायधीश को लिखा था पत्र

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिलहाल कोर्ट में वास्तविक रुप से मामलों की नियमित रुप से सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि 2 जून तक मौजूदा व्यवस्था के तहत सिर्फ जरूरी मामलों की ही सुनवाई की जाएगी। सोमवार को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। बैठक में मुख्य न्यायाधीश के सामने हाईकोर्ट में मामलों की सुनवाई के विषय को लाया गया। हाईकोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरु करने की मांग की थी। 

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के मद्देनजरनजर हाईकोर्ट फिलहाल कोर्ट में नियमित सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। अब इस संबंध में अगली बैठक दो जून को होगी। इस दौरान अदालत में सुनवाई की रुपरेखा तय की जाएगी। वर्तमान में हाईकोर्ट में सप्ताह में दो दिन सिर्फ दोपहर 12 बजे से दो बजे के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जरुरी मामलों कि सुनवाई हो रही है। बैठक में एडिसनल सलिसीटर जनरल अनिल सिंह व वकील संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे। 

जिला स्तर पर बने तीन न्यायाधीशो की कमेटी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र व गोवा की सभी निचली अदालतों को कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए जारी किए गए उपायो को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जिला स्तर पर तीन न्यायाधीशों की कमेटी गठित करने का निर्देश दिया है। कमेटी सुनिश्चित करे की कोरोना रोकने के उपायों को कड़ाई से लागू किया जाए। इसके साथ ही अदालत में प्रवेश व निकलने का एक द्वार बनाया जाए। अदालत आनेवालों की थर्मल स्क्रिनिंग की जाए। स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाए।  
 
बॉम्बे हाईकोर्ट में मामलों की नियमित रुप से सुनवाई की मांग को लेकर वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता को पत्र लिखा था। पत्र में दावा किया गया कि यदि अदालत में मामलों की सुनवाई नियमित रूप से नहीं शुरु की गई, तो इससे अदालत में प्रलंबित मामलों की संख्या बढ़ेगी। लिहाजा कोरोना संक्रमण को रोकने से जुड़ी सभी सतर्कताओं और सावधानियों का पालन करते हुए सुबह 11 से दोपहर 2 बजे और दोपहर 3 बजे से शाम पांच बजे के बीच नियमित सुनवाई की जाए। 

पत्र में कहा गया कि 20 मार्च 2020 से हाईकोर्ट का काम काज लगभग थम सा गया है। फिलहाल हाईकोर्ट में पांच न्यायाधीश बैठ रहे हैं। जो सप्ताह में सिर्फ दो दिन दोपहर 12 बजे से दो बजे के बीच जरूरी मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। हाईकोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक 24 मार्च से अब तक सिर्फ 404 आदेश जारी किए हैं। इससे कोर्ट में सुनवाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

इसके अलावा यह स्पष्ट नहीं है कि किस आधार पर हाईकोर्ट में जरुरी और बहुत जरुरी मामलों को वर्गीकृत किया गया है। जिस तरह अभी मामले दायर हो रहे हैं, उसके हिसाब से 30 जून 2020 तक 6,700 मामले दायर हो जाएंगे। यह पत्र वरिष्ठ अधिवक्ता इकबाल छागला, जनक द्वारकादास व नवरोज सिरवई सहित अन्य वकीलों ने लिखा है। वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश से मिलने के लिए भी समय मांगा। 

पत्र के मुताबिक अब लॉकडाउन 31 मई तक बढ़ा दिया गया है। यदि अगले महीने लॉकडाउन खत्म भी हो गया, तो जनजीवन सामान्य होने में वक्त लगेगा। क्योंकि लोग सोशल डिस्टेंसिंग और कई पाबन्दियों का खुद पालन करेंगे। ऐसे में सिर्फ सीमित समय के लिए सुनवाई करने से लोगों की न्याय से दूरी बढ़ेगी। इसलिए अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की बजाय वास्तविक रुप से कोर्ट में नियमित सुनवाई की जाए। पत्र में कहा गया है कि अदालत के लिए जरुरी स्टाफ के आने के लिए सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था की जाए। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने सभी मामलों के अंतरिम आदेश 15 जून तक बढ़ा दिया है। फिल्हाल कोर्ट ने नियमित सुनवाई की मांग ठुकरा दी है।

आदतन अपराधी को नहीं दे सकते जमानत

वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि आदतन अपराधी को अंशकालिक जमानत पर नहीं छोड़ा जा सकता। भले ही ऐसे अपराधी अथवा आरोपी को कोरोना के प्रकोप के चलते जेल से रिहा किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत राज्य की हाईपावर कमेटी ने पात्र माना है। हाईकोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी के पूर्व नगरसेवक महेश पाटिल की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया है। इससे पहले सत्र न्यायालय ने पाटिल के जमानत आवेदन को खारिज कर दिया था। लिहाजा उसने निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में अपील की थी। न्यायमूर्ति साधना जाधव के सामने पाटिल की याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील एस वी गावंद ने कहा कि आरोपी (पाटिल) के खिलाफ 17 मामलों में आरोपपत्र दायर किया गया है। इसमें एक हत्या जैसा गंभीर मामला शामिल है। जिसमें आरोपी पर एक साथी नगरसेवक की हत्या की साजिश का आरोप है। ऐसे में यदि आरोपी को जमानत दी जाती है, तो वह मामले की सुनवाई को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा आरोपी पर एक मामला आर्म्स एक्ट की धारा 25 व 29 के तहत दर्ज किया गया है। यह गंभीर मामला है। आरोपी का कल्याण इलाके में काफी आतंक है। आरोपी की आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं पर आरोपी के आचरण व रुख में बदलाव नहीं आया है। इस लिहाज से आरोपी बार बार अपराधों को दोहरा रहा है। इसलिए आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है।

कोरोना के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत जेल में भीड़ कम करने के लिए जिन आरोपियों को सात साल की सजा सुनाई गई है अथवा जिन आरोपियों पर ऐसी धाराओं के तहत आरोप है, जिसमें सात साल की सजा का प्रावधान है, इन्हें 45 दिन की अंशकालिक जमानत पर छोड़ने का प्रावधान किया गया है। आरोपी को इसके तहत पात्र पाया गया था। न्यायमूर्ति ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि आरोपी लगातार आपराधिक गतिविधियों को दोहरा रहा है। इस लिहाज से उसे जमानत पर रिहा न किया जाने का निर्णय न्यायसंगत नजर आ रहा है। यह कहते हुए न्यायमूर्ति ने पाटिल को राहत देने से इंकार कर दिया। 
 

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डिजिटल डेस्क, जबलपुर। किसी के लिए भी प्रॉपर्टी खरीदना जीवन के महत्वपूर्ण कामों में से एक होता है। आप सारी जमा पूंजी और कर्ज लेकर अपने सपनों के घर को खरीदते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इसमें इतनी ही सावधानी बरती जाय जिससे कि आपकी मेहनत की कमाई को कोई चट ना कर सके। प्रॉपर्टी की कोई भी डील करने से पहले पूरा रिसर्च वर्क होना चाहिए। हर कागजात को सावधानी से चेक करने के बाद ही डील पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि कई बार हमें मालूम नहीं होता कि सही और सटीक जानकारी कहा से मिलेगी। इसमें bhaskarproperty.com आपकी मदद कर सकता  है। 

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कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखे कि वो भारतीय रियल एस्टेट इंडस्ट्री के रेगुलेटर RERA से अप्रूव्ड हो। रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवेलपमेंट एक्ट, 2016 (RERA) को भारतीय संसद ने पास किया था। RERA का मकसद प्रॉपर्टी खरीदारों के हितों की रक्षा करना और रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देना है। राज्य सभा ने RERA को 10 मार्च और लोकसभा ने 15 मार्च, 2016 को किया था। 1 मई, 2016 को यह लागू हो गया। 92 में से 59 सेक्शंस 1 मई, 2016 और बाकी 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आए। 6 महीने के भीतर केंद्र व राज्य सरकारों को अपने नियमों को केंद्रीय कानून के तहत नोटिफाई करना था।