दैनिक भास्कर हिंदी: मां नर्मदा की परिक्रमा के बिना हर तीर्थ अधूरा - शिप्रा पाठक

January 30th, 2019

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। बचपन में बच्चे परियों की कहानियां सुनते हैं, लेकिन मुझे मां धार्मिक कहानियां सुनाया करती थीं। मां के दिए संस्कार या स्वयं की रुचि कहिए, मुझे धर्म के प्रति बहुत आस्था है। चारों धामों की यात्रा, 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन, 40 शक्तिपीठों की यात्रा, सप्तपुरी दर्शन के बाद भी मुझे ऐसा लग रहा था कि शायद मुझसे कुछ छूट रहा है। तब मैंने नर्मदा परिक्रमा करने के बारे में सोचा और निकल पड़ी। दातागंज जिला बदायूं, उत्तरप्रदेश की रहने वाली शिप्रा पाठक नर्मदा परिक्रमा के दौरान ग्वारीघाट पहुंचीं, जहां उन्होंने भास्कर के साथ अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि नर्मदा परिक्रमा से जुड़कर उन्हें न सिर्फ आनंद की अनुभूति हो रही है, बल्कि बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है। लोगों को स्वच्छता और बेटियों को शिक्षित करते हुए, वह अपनी नर्मदा परिक्रमा पूरी कर रही हैं।

लोगों से मिला नि:स्वार्थ प्रेम
अमरकंटक से मेरी यात्रा शुरू हुई। रास्ते में कई गांव मिले, जहां मैंने रात्रि विश्राम किया। कुछ ऐसे लोगों से मिलने का मौका भी मिला, जिनके पास खुद गर्म मोजे नहीं थे, लेकिन उन्होंने मुझे मोजे लाकर दिए। लोगों को जैसे ही पता चलता है कि मैं नर्मदा परिक्रमा के लिए निकली हूं, वैसे ही उनमें सेवाभाव देखने को मिल जाता है। मां नर्मदा के लिए लोगों के दिल में इतना प्यार और सम्मान है कि वे उन्हें नदी कहना भी नहीं पसंद करते। वे नर्मदा को माई कहकर बुलाते हैं।

मिला है सुकून
शिप्रा ने बताया कि प्रोफेशनली ईवेंट मैनेजमेंट के फील्ड में काम करती हैं। उन्होंने इंग्लिश से एमए किया है। अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर पगयात्रा पर निलकना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था, लेकिन अब ऐसा लगने लगा है, मानों माई की कृपा मेरे साथ चल रही है। मुझे अब कल के बारे में सोचने की जरूरत नहीं रहती, सारी व्यवस्था अपने आप हो जाती है।

3300 किलोमीटर की यात्रा
शिप्रा ने अब तक 85 दिनों तक यात्रा की है। 3300 किलोमीटर की यात्रा में अब उन्हें 581 कि.मी. की यात्रा और तय करनी है। नर्मदा परिक्रमा के दौरान वह अपने साथ 2 जोड़ी कपड़े, शॉल, जैकेट, स्लीपिंग बैग और एक दंड लेकर चल रही हैं।

लोगों को किया जागरूक
क्योंकि मैं शिक्षित हूं, तो लोगों को अवेयर करना अपना कर्तव्य समझती हूं। गांव में जहां बालिकाओं की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता, स्वच्छता को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती, ऐसी जगहों पर मैंने लोगों को अवेयर करने की कोशिश भी की, ताकि लोग कुछ सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक हों।

निकालें भगवान के लिए भी समय
24 घंटों में से कम से कम एक घंटा तो भगवान के लिए देना ही चाहिए। युवाओं को मेरा यही संदेश है कि उन्हें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए स्वयं अवेयर होना होगा। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमने भारत देश में जन्म लिया।