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सोशल मीडिया पर ‘साइकोमेट्रिक प्रोफाइल’ से फेक न्यूज फैला रहीं पार्टियां

सोशल मीडिया पर ‘साइकोमेट्रिक प्रोफाइल’ से फेक न्यूज फैला रहीं पार्टियां

डिजिटल डेस्क, नागपुर। सोशल मीडिया मतदाताओं पर प्रभाव डालने के लिए बड़ा अस्त्र बन गया है। अब तक राजनीतिक दल के उम्मीदवार द्वारा खुद के कार्यों का गुणगान सोशल मीडिया पर किया जाता था, लेकिन अब विरोधियों की छवि खराब कर विजय का लक्ष्य साधने के लिए उम्मीदवार अपने कार्यकर्ताओं के जरिए ‘फेक न्यूज’ फैलाने का सोशल मीडिया नया पर्याय बन गया है। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के सोशल मीडिया बाबत मार्गदर्शनक तत्वों का क्रियान्वयन करने के लिए कोई तकनीक नहीं होने से ‘फेक न्यूज’ के मामले बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। विशेष यह कि अब तक इसमें दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं होने से इसे बढ़ावा मिल रहा है। संवाददाताओं से बात करते हुए सोशल मीडिया विश्लेषक अजित पारसे ने कहा कि भारतीय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता सोशल मीडिया के फेक न्यूज पर विश्वास रखने व उसपर तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करने में आगे हैं। लोकसभा चुनाव में फेक न्यूज की 150 से ज्यादा घटनाओं का उल्लेख केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मान्य किया था। समाचार पत्र, टीवी आदि पर किसी खबर के पीछे सत्य खोजा जाता है। लेकिन सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होने से फर्जी खबरें, ट्रोलिंग आदि पद्धति से यह बड़ा प्लेटफार्म बन गया है। जिस कारण प्रत्येक राजनीतिक पार्टी के पास खुद का आईटी सेल है। सोशल मीडिया आज के युवाओं के लिए नशा बन गया है। युवा जल्दबाजी में अपरिपक्वता दिखाकर कोई भी संदेश विविध मार्गों से फैलाता है। ऐसे में युवा राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के लिए सॉफ्ट टारगेट बन गया है।

बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान भी संकट में

राजनीतिक पार्टियों ने युवाओं की ‘साइकोमेट्रिक प्रोफाइल’ तैयार की है। युवाओं की पसंद, उनके विचार, उनकी कार्यक्षमता आदि का निष्कर्ष निकालकर प्रोफाइल तैयार की जाती है। इस अनुसार राजनीतिक दल अथवा उम्मीदवार उनतक जैसा चाहिए वैसा संदेश सोशल मीडिया द्वारा पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। इससे पहले नकारात्मक खबरों के कारम इंफिबीम नाम की भारतीय ई-कॉमर्स कंपनी के शेयर्स 73 प्रतिशत से कम हुए हैं। सोशल मीडिया नकारात्मक पद्धति से निर्णायात्मक बनने से देश के बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान भी संकट में आ गए हैं। जेट एयरवेज इसका ज्वलंत उदाहरण है। माइक्रोसॉफ्ट के सर्वेक्षण अनुसार विश्व स्तर पर फर्जी खबरों का प्रमाण 57 प्रतिशत है। अकेले भारत में 64 प्रतिशत से अधिक इसका प्रमाण है। 

दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं

राजनीतिक दलों की ओर से सोशल मीडिया पर होने वाले प्रचार, प्रसार पर नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग द्वारा तैयार किए गए मार्गदर्शन तत्व उत्कृष्ट है। लेकिन उसके क्रियान्वयन के तंत्र अभी तक स्पष्ट नहीं है। इन मार्गदर्शक तत्वों का उल्लंघन करने के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। चुनाव आयोग के मार्गदर्शक तत्वों से छुटने के अनेक मार्ग है। जिस कारण फर्जी खबरों का गंभीर खतरा निर्माण हो गया है। फेक न्यूज सिर्फ गोमांस, अपहरण अथवा ईवीएम बाबत मर्यादित नहीं है। उसमें सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक विचारधारा, मत-प्रवाह बदलने की भी संभावना है।  

 

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