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हाईकोर्ट ने कहा - राज्य महिला आयोग के पास न्य़ायिक अधिकार नहीं 

हाईकोर्ट ने कहा - राज्य महिला आयोग के पास न्य़ायिक अधिकार नहीं 

डिजिटल डेस्क, मुंबई। राज्य महिला आयोग के पास किसी को सपंत्ति का अधिकार दिलाने का अधिकार नहीं है। न्यायिक निर्णय लेना आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में बात स्पष्ट की है। महानगर निवासी सुजीत लावंडे ने आयोग की ओर से अप्रैल 2018 में जारी किए गए एक आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। दरअसल लावंडे ने अपनी मां को घर से बाहर निकाल दिया था। इसलिए लावंड की मां ने महिला आयोग के पास शिकायत की थी। महिला आयोग ने 4 अप्रैल 2018 को अपने आदेश में कहा था कि लावंडे घर को खाली कर उसे अपनी मां को सौपे। यहीं नहीं वह अपनी मां के मेडिकल खर्च का भी वहन करे और तुरंत अपनी मां को उनका आधारकार्ड, पैनकार्ड व फ्लैट का शेयर सर्टिफिकेट वापस कर दे। आयोग ने लावंडे को 15 दिन के भीतर इस आदेश का पालन करने को कहा था। 

महिला आयोग के पास संपत्ति दिलाने का अधिकार नहीं

लावंडे ने आयोग के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी व न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान लावंडे की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने दावा किया कि आयोग के पास न्यायिक निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। आयोग ने अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर आदेश दिया है। जबकि लावंडे की मां की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल की मां घर की मालिक हैं। आयोग ने सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद उचित आदेश जारी किया है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने व सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि फिलहाल हम संपत्ति के मालिकाना हक के मुद्दे को नहीं देख रहे हैं। अभी हम सिर्फ यह परीक्षण कर रहे है कि मामले को लेकर आयोग ने जो आदेश दिया है, वह सही है अथवा नहीं। 

खंडपीठ ने साफ किया कि आयोग के पास न्यायिक निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। यह बात कहते हुए खंडपीठ ने आयोग के आदेश के उस हिस्से को खत्म कर दिया जिसमे 15 दिन के भीतर आयोग के आदेश का पालन करने के लिए कहा गया था। खंडपीठ ने कहा कि आयोग के आदेश का ऊपरी हिस्सा सिफारिशी स्वरुप में है। खंडपीठ ने अपने इस आदेश की प्रति जानकारी के लिए राज्य महिला आयोग के रजिस्ट्रार के पास भेजने का निर्देश दिया है।   
 

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