दैनिक भास्कर हिंदी: मप्र : मजदूरों को आखिर गाड़ी मिली, मगर ..!

May 11th, 2020

हाईलाइट

  • मप्र : मजदूरों को आखिर गाड़ी मिली, मगर ..!

भोपाल, 11 मई (आईएएनएस)। कई बार जिंदगी में अजब संयोग सामने आते हैं और इन दिनों देश में कोरोनावायरस के कारण लागू लॉकडाउन के दौरान घरों को वापस लौट रहे मजदूरों के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। मजदूर देश के विभिन्न हिस्सों से घर लौटना चाहते हैं, कई बार उन्हें लौटने के लिए साधन नहीं मिल रहे हैं, और पैदल चल रहे मजदूरों के साथ हादसे भी हो रहे हैं।

सरकार हालांकि विशेष ट्रेनों के जरिए मजदूरों को उनके घर पहुंचाने की कोशिश में जुटी हुई है। और तमाम प्रवासी मजदूर इन विशेष ट्रेनों के जरिए अपने गांव वापस लौट भी चुके हैं। लेकिन कई मजदूर ट्रेन का इंतजार किए बगैर पैदल चल पड़े और उनमें से कई के साथ दुर्घटनाएं भी घटीं। मध्यप्रदेश के शहडोल और उमरिया के मजदूरों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वे विशेष ट्रेनों का इंतजार किए बगैर पैदल घरों को चल पड़े और परिणामस्वरूप 16 मजदूरों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।

राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दूसरे राज्यों में फंसे ऐसे मजदूरों से अपील की है कि वे वहीं रुकें और सरकार उनके लिए ट्रेन की व्यवस्था कर रही है। उन्होंने कहा है, हमारे मजदूर भाई जहां हैं वहीं रुकें। राज्य सरकार उनके लिए ट्रेन की व्यवस्था कर रही है। कई ट्रेन मजदूरों को लेकर आ चुकी है आगे भी ये गाड़ियां आएंगी। प्रत्येक मजदूर भाई को प्रदेश वापस लाया जाएगा, वे बिल्कुल चिंता न करें।

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक स्टील फैक्टरी में काम करने वाले मध्यप्रदेश के उमरिया और शहडोल जिले के मजदूर कोरोना महामारी के कारण बंद हुए काम-धंधे के कारण घर वापस आना चाहते थे। परिवहन के साधन बंद होने के कारण वे पैदल ही गांव के लिए चल दिए थे।

सरकार ने बसों के साथ ट्रेन की व्यवस्था की है, मगर इन मजदूरों को लगा कि उन्हें परिवहन का साधन नहीं मिल पाएगा। उन्हें उम्मीद थी कि भुसावल से उन्हें ट्रेन मिल जाएगी। वे भुसावल पहुंचते, उससे पहले ही 16 मजदूरों को मौत ने अपनी आगोश में ले लिया।

औरंगाबाद के जालना से भुसावल के लिए पैदल चले मजदूर जब थक हार गए और ट्रेन की पटरियों पर विश्राम करने लगे तो वहां से गुजरी एक मालगाड़ी ने उनकी जिंदगी पर ही विराम लगा दिया।

उसके बाद इन मजदूरों के शवों को ट्रेन से जबलपुर होते हुए उमरिया व शहडोल तक लाया गया और एम्बुलेंस से उनके गांव तक भेजा गया।

सामाजिक कार्यकर्ता और उमरिया के निवासी संतोष द्विवेदी कहते हैं कि इन मजदूरों को अपने घरों तक लौटने के लिए जीते जी तो कोई गाड़ी नहीं मिली, मगर मरने के बाद ट्रेन और चार पहिया एंबुलेंस घर तक पहुंचाने के लिए जरूर मिल गई। यह बदनसीबी है मजदूरों की।

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ का कहना है, अभी भी हजारों मजदूर प्रदेश वापसी के इंतजार में हैं, सड़कों पर हैं। सरकार अभी भी समय पर उनकी चिंता कर ले, जिससे इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति ना हो।

उन्होंने आगे कहा, औरंगाबाद के ट्रेन हादसे में अपनी जान गवा चुके प्रदेश के हमारे मजदूर भाई अपने गांव तो पहुंचे लेकिन जीवित नहीं। काश इन्हें पहले ट्रेन व पास उपलब्ध करा दिया जाता तो आज न विशेष विमान, न विशेष ट्रेन की आवश्यकता पड़ती।

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