Behind the Success: फ्लॉप पर फ्लॉप के बाद आमिर खान कैसे बने 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट'? जानें शाहरुख और सलमान के दौर में अलग पहचान बनाने की पूरी कहानी

फ्लॉप पर फ्लॉप के बाद आमिर खान कैसे बने मिस्टर परफेक्शनिस्ट? जानें शाहरुख और सलमान के दौर में अलग पहचान बनाने की पूरी कहानी
शाहरुख और सलमान के दौर में आमिर खान ने कम फिल्में, मजबूत स्क्रिप्ट और किरदारों के लिए लंबी तैयारी की रणनीति अपनाकर खुद को अलग साबित किया। जानिए कैसे फ्लॉप फिल्मों के बाद भी उन्होंने 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' की पहचान बनाई और बॉलीवुड के सुपरस्टार में शामिल हो गए।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। इन दिनों आमिर खान अपनी तीसरी शादी को लेकर चर्चा में हैं। लेकिन हिंदी सिनेमा में जब भी तीन सबसे बड़े सुपरस्टार्स की बात होती है तो आमिर खान, शाहरुख खान और सलमान खान का नाम साथ में लिया जाता है। तीनों ने लगभग एक ही दौर में फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाई, लेकिन क्या आपने नोटिस किया कि तीनों की ही स्टार इमेज एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रही। जहां शाहरुख खान रोमांस के किंग बनकर उभरे, वहीं सलमान खान ने एक्शन, स्टाइल और मास एंटरटेनमेंट के जरिए अपनी अलग फैन फॉलोइंग बनाई। दूसरी तरफ आमिर खान ने कम फिल्में करने, स्क्रिप्ट पर फोकस रखने और हर किरदार के लिए लंबी तैयारी करने की स्ट्रेटजी अपनाई। तो चलिए हम आपको एक्सप्लेन करने है कि, कैसे आमिर खान बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट बने।

शाहरुख और सलमान से अलग कैसे बनी पहचान?

1990 और 2000 के दशक में शाहरुख खान रोमांटिक फिल्मों के सबसे बड़े चेहरे बन चुके थे। दूसरी ओर सलमान खान की पॉपुलारटी एक्शन, स्टाइल और बड़े लेवल के मनोरंजन वाली फिल्मों के कारण लगातार बढ़ रही थी। ऐसे में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए आमिर खान ने इन दोनों से अलग रास्ता चुना। उन्होंने खुद को किसी एक स्टायरल में नहीं बांधा। रोमांस, खेल, कॉमेडी, सोशल इसूज, ऐतिहासिक विषय और बायोपिक बेस्ड फिल्मों जैसे अलग-अलग जॉनर में काम किया। यही वजह रही कि दर्शकों के एक बड़े वर्ग के बीच यह धारणा बनी कि आमिर खान की फिल्म का मतलब एक अलग कहानी और नया एक्सपिरियंस होगा।


शुरुआत से ही अलग था आमिर का काम करने का तरीका

1988 में कयामत से कयामत तक की सफलता के बाद आमिर खान बेहद ही पॉपुलर हो गए, लेकिन उन्होंने अपने करियर को दूसरे सुपरस्टार्स की तरह ज्यादा फिल्में नहीं की। 1990 के दशक में जब कई सारे एक्टर्स साल में चार से छह फिल्में कर रहे थे, तब आमिर ने कम प्रोजेक्ट किए। उनका ध्यान इस बात पर रहता था कि कहानी, डायरेक्टर और किरदार शानदार हो। और यही कारण रहा की इंडस्ट्री में धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि आमिर किसी फिल्म को साइन करने से पहले उसकी स्क्रिप्ट पर गहराई से काम करते हैं और शूटिंग शुरू होने के बाद भी हर छोटे-बड़े पहलू में अपनी राय देते हैं और काम करते हैं।

आमिर खान के करियर में कुछ फिल्मों ने उनकी अलग पहचान बनाने में अहम रोल निभाया। लगान ने यह साबित किया कि वे बेसिक फार्मूले से हटकर बड़े जोखिम लेने के लिए तैयार हैं। इस फिल्म को ऑस्कर में भी ऑफिशियल एंट्री मिली थी। इसके बाद दिल चाहता है ने शहरी यंगस्टर की सोच और दोस्ती को नए अंदाज में पेश किया। रंग दे बसंती ने यंगस्टर्स के बीच गहरा प्रभाव छोड़ा, जबकि तारे ज़मीन पर ने शिक्षा और बच्चों की मानसिक चुनौतियों जैसे विषय को फिल्मों में जगह दिलाई। इसके बाद 3 इडियट्स, पीके और दंगल जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस सफलता के साथ-साथ सोशल डिसक्शन भी बढ़ाया। लगातार अलग विषयों वाली फिल्मों ने आमिर की इमेज का बदला।

कैसे मिला 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' का टैग?

आमिर खान को "मिस्टर परफेक्शनिस्ट" कहे जाने की सबसे बड़ी वजह उनका काम करने का तरीका माना जाता है। वे किरदार की जरूरत के हिसाब से अपने लुक, शरीर, भाषा और व्यवहार पर महीनों मेहनत करते हैं। गजनी के लिए उन्होंने खास तरह की बॉडी बनाई, 3 इडियट्स में अपनी उम्र से काफी छोटा किरदार निभाने के लिए अलग तैयारी की और दंगल में एक ही फिल्म के लिए पहले वजन बढ़ाया और फिर उसे काफी हद तक कम किया। इन फिल्मों से जुड़ी ट्रासफॉर्मेशन की कहानियां भी आपने जरुर सुनी होगी। इन उदाहरणों ने ही उन्हें लोगों के बीच 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' बनाया।


'सत्यमेव जयते' ने बदली स्टार की इमेज

आमिर खान ने अपनी इस इमेज को फिल्मों तक ही नहीं रखा टेलीविजन पर भी दिखाया। 2012 में शुरू हुए टीवी शो सत्यमेव जयते में उन्होंने महिला सुरक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज, स्वास्थ्य व्यवस्था, बाल शोषण और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा की। यह शो मनोरंजन के बजाय सोशल मद्दो पर बेस्ड था। इससे आमिर की छवि एक ऐसे अभिनेता की बनी जो लोकप्रियता का इस्तेमाल सामाजिक मुद्दों पर बातचीत शुरू करने के लिए भी कर सकता है और आम लोगों के हित की बात कर सकता है।

अवॉर्ड शोज से दूरी ने भी बनाई अलग पहचान

आमिर खान कई सालों से ज्यादातर फिल्म अवॉर्ड शोज में नजर नहीं आते। उनका मानना है कि किसी कलाकार के लिए सबसे बड़ा अवॉर्ड दर्शकों का प्यार होता है। उन्होंने कई इंटरव्यू में यह भी कहा है कि वे फिल्म अवॉर्ड्स के सलेक्शन प्रोसेस से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, इसलिए ऐसे समारोहों से दूरी बनाए रखते हैं। हालांकि, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों को लेकर उनका नजरिया अलग रहा है। अवॉर्ड शोज में कम दिखाई देने की वजह से भी आमिर की एक अलग छवि बनी। जहां दूसरे बड़े सितारे अक्सर इन मंचों का हिस्सा बनते रहे, वहीं आमिर ने अपने काम को ही अपनी पहचान बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया।


Created On :   5 July 2026 6:21 PM IST

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