Exclusive Interview: मनोज बाजपेयी ने बताया एक जैसे किरदारों को अलग बनाने का फॉर्मूला, बोले- वर्दी नहीं, इंसान की कहानी समझता हूं

अभिनेता मनोज बाजपेयी जल्द ही नीरज पांडे की फिल्म ‘गजब रात’ में नजर आएंगे। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने अपने किरदार, पुलिस और इंटेलिजेंस अफसर की भूमिकाओं को अलग अंदाज में निभाने की चुनौती, नीरज पांडे के साथ 16-17 साल पुराने रिश्ते और एक्शन सीन के दौरान सुरक्षा को लेकर बात की। मनोज ने बताया कि अब वह एक्शन दृश्य करते समय पहले से ज्यादा सावधानी बरतते हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि वर्दी एक जैसी हो सकती है, लेकिन उसे पहनने वाले हर इंसान की कहानी अलग होती है।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। अभिनेता मनोज बाजपेयी उन कलाकारों में शामिल हैं, जो अपने किरदारों को सिर्फ उनके पेशे या बाहरी व्यक्तित्व तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनकी सोच, संघर्ष और परिस्थितियों को भी पर्दे पर उतारने की कोशिश करते हैं। पुलिस अधिकारी से लेकर सीबीआई और इंटेलिजेंस अफसर तक, उन्होंने कई तरह की भूमिकाएं निभाई हैं। अब वह फिल्मकार नीरज पांडे की फिल्म ‘गजब रात’ में नजर आएंगे। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो रही यह फिल्म एक रात में घटने वाली घटनाओं पर आधारित है, जिसमें सस्पेंस, ड्रामा और ब्लैक ह्यूमर देखने को मिलेगा। नीरज के साथ मनोज की यह पुरानी रचनात्मक साझेदारी भी है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने फिल्म में अपने अलग अंदाज, बार-बार एक जैसे पेशे के किरदार निभाने की चुनौती, शीर्षक में बदलाव, नीरज के साथ अपने रिश्ते और एक्शन दृश्यों में सुरक्षा को लेकर विस्तार से बात की।

सवाल: ‘गजब रात’ में दर्शकों को आपका कौन-सा अलग अंदाज देखने को मिलेगा?

मनोज बाजपेयी: दर्शकों ने मुझे पहले भी फास्ट-पेस्ड थ्रिलर फिल्मों में देखा है, लेकिन ‘गजब रात’ में मेरा अंदाज अलग होगा। इस फिल्म की कहानी एक रात में घटती है और इसमें कई दिलचस्प किरदार हैं। फिल्म की खासियत यह है कि घटनाएं किस तरह आगे बढ़ती हैं और अलग-अलग किरदार किस तरह कहानी को नई दिशा देते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। इसके अलावा, फिल्म में ऐसे कई कलाकार हैं, जिन्होंने मेरे साथ पहले काम नहीं किया है। हर कलाकार अपने साथ एक अलग ऊर्जा और कुछ नया लेकर आया है। मुझे लगता है कि इन सभी चीजों का अनुभव दर्शकों के लिए अलग होगा।

सवाल: आपने कई बार पुलिस अधिकारी, सीबीआई और इंटेलिजेंस अफसर की भूमिकाएं निभाई हैं। ऐसे में हर बार किरदार को अलग बनाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है?

मनोज बाजपेयी: सीबीआई और इंटेलिजेंस के किरदार भी जोड़ दें, तो ऐसी भूमिकाओं की गिनती काफी बढ़ जाएगी। लेकिन मेरे लिए पुलिस अधिकारी, इंटेलिजेंस अधिकारी और सेना के अधिकारी की जिम्मेदारियां एक जैसी नहीं हैं। इन सभी का काम करने का तरीका, सोचने का नजरिया और परिस्थितियों से निपटने का ढंग अलग होता है। मैं जब भी किसी किरदार को निभाता हूं, तो सिर्फ उसकी वर्दी या पद पर ध्यान नहीं देता। मैं यह समझने की कोशिश करता हूं कि वह व्यक्ति आखिर है कौन। उसके परिवार का माहौल कैसा है, उसने जिंदगी में क्या संघर्ष किए हैं, उसके अनुभव क्या रहे हैं और किन परिस्थितियों ने उसे ऐसा बनाया है। ये सारी बातें किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को गढ़ती हैं। बाहर से देखने पर दो लोग एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन उनके भीतर की दुनिया अलग होती है। इसलिए मेरे लिए जरूरी है कि किरदार को निभाते समय उसकी अपनी पहचान सामने आए। वर्दी एक जैसी हो सकती है, लेकिन उसे पहनने वाले इंसान की कहानी अलग होती है।

सवाल: ‘गजब रात’ के शीर्षक में बदलाव को लेकर काफी चर्चा हुई। आपको क्या लगा कि उस समय शीर्षक बदलना सही फैसला था?

मनोज बाजपेयी: मुझे लगता है कि उस समय जो फैसला लिया गया, वह सही था। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए, आपने अपनी पत्नी के लिए एक साड़ी खरीदी। आपने अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी से साड़ी पसंद की और उन्हें देने के लिए लेकर आए। लेकिन अगर उन्हें लगता है कि आपने पैसे बचाने के लिए सस्ती साड़ी खरीद ली है, तो फिर आप क्या करेंगे? हो सकता है कि आप दूसरी साड़ी खरीदकर ले आएं, ताकि उन्हें यह महसूस हो कि आपने उनकी पसंद और उनकी भावनाओं का ध्यान रखा है। यहां सवाल साड़ी की कीमत का नहीं, बल्कि उस नजरिए का है, जिसके साथ उसे देखा जा रहा है। फिल्म के शीर्षक को लेकर भी कुछ ऐसा ही था। हमारा उद्देश्य फिल्म को लेकर किसी तरह की गलतफहमी को बढ़ाना नहीं था। हम चाहते थे कि दर्शक फिल्म को उसी रूप में देखें, जिस रूप में हमने उसे बनाया है। कभी-कभी किसी बात को लेकर अनावश्यक बहस करने के बजाय उसे सहजता से सुलझा लेना ज्यादा समझदारी होती है।

सवाल: क्या आपको लगता है कि आज लोग किसी बात की पूरी सच्चाई जाने बिना अपनी राय बना लेते हैं?

मनोज बाजपेयी: आज तकनीक ने हर व्यक्ति को बहुत ताकत दे दी है। आपके पास फोन है, कैमरा है और आप किसी भी घटना को तुरंत रिकॉर्ड करके लोगों तक पहुंचा सकते हैं। यह तकनीक अपने आप में अच्छी है और इसके बहुत सारे फायदे भी हैं। लेकिन परेशानी तब होती है, जब किसी घटना को उसके पूरे संदर्भ से अलग करके देखा जाता है। कोई एक तस्वीर, कुछ सेकंड का वीडियो या किसी बातचीत का छोटा-सा हिस्सा पूरी सच्चाई नहीं बता सकता। उसके पीछे क्या परिस्थितियां थीं, उससे पहले क्या हुआ था और संबंधित लोगों की क्या स्थिति थी, यह समझना भी जरूरी है। जब हम अधूरी जानकारी के आधार पर किसी के बारे में राय बना लेते हैं, तो कई बार गलतफहमी पैदा हो जाती है। इसलिए किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया देने या अपनी राय बनाने से पहले उसकी वास्तविक स्थिति को समझना जरूरी है।

सवाल: नीरज पांडे के साथ आपकी दोस्ती करीब 16-17 साल पुरानी है। इस पुराने तालमेल का काम करते समय कितना फायदा मिलता है?

मनोज बाजपेयी: मैं नीरज को करीब 16-17 साल से जानता हूं। इतने लंबे समय तक किसी व्यक्ति के साथ काम करने और उसे जानने के बाद आप उसकी कार्यशैली, सोच और अपेक्षाओं को समझने लगते हैं। मुझे पता होता है कि नीरज किसी दृश्य को किस तरह देख रहे हैं और उनसे किस तरह की अपेक्षा की जा सकती है। इसी तरह वह भी मेरे काम करने के तरीके को समझते हैं। इससे सेट पर संवाद करना आसान हो जाता है और कई चीजों को लेकर बार-बार समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे बीच सहजता भी है। शूटिंग खत्म होने के बाद भी हम साथ बैठते हैं, बातें करते हैं और एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। जरूरी नहीं कि हर बातचीत फिल्म या काम को लेकर ही हो। जब आपका रिश्ता सिर्फ काम तक सीमित नहीं होता, तो साथ काम करने का अनुभव और भी अच्छा हो जाता है। यह सहजता निश्चित रूप से शूटिंग के दौरान मदद करती है।

सवाल: आप जैसे अनुभवी अभिनेता के लिए भी एक्शन दृश्य करते समय डर लगता है? उम्र के साथ इसमें क्या बदलाव आया है?

मनोज बाजपेयी: एक्शन करते समय डर आज भी लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैं पहले से ज्यादा सावधान रहता हूं। पहले कई बार हम बिना ज्यादा सोचे कहीं से भी कूद जाते थे या कोई एक्शन दृश्य कर लेते थे। उस समय शायद हम इस बात पर उतना ध्यान नहीं देते थे कि ऐसा करते हुए चोट लगने की कितनी संभावना है। अब उम्र और अनुभव के साथ समझ बढ़ी है। मैं किसी भी एक्शन दृश्य को करने से पहले उसके बारे में सोचता हूं और यह समझने की कोशिश करता हूं कि उसे सुरक्षित तरीके से कैसे किया जा सकता है। इसमें निर्देशक और एक्शन डायरेक्टर की भी अहम भूमिका होती है। वे भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि दृश्य अच्छा दिखे, लेकिन उसे करते समय कलाकार की सुरक्षा से समझौता न हो। आखिरकार, किसी दृश्य को पर्दे पर प्रभावशाली बनाने के लिए अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज करना जरूरी नहीं है।

सवाल: हाल ही में टाइगर श्रॉफ से जुड़ी घटना के बाद फिल्म इंडस्ट्री में सुरक्षा को लेकर चर्चा हुई। आप इस घटना को किस तरह देखते हैं?

मनोज बाजपेयी: यह घटना निश्चित रूप से चौंकाने वाली थी। खुशी की बात है कि टाइगर सुरक्षित हैं और उनके ड्राइवर को भी गंभीर नुकसान नहीं हुआ। ऐसी घटनाएं किसी को भी विचलित कर सकती हैं। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, वहां अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इसे सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री की समस्या के तौर पर नहीं देखना चाहिए। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीरता जरूरी है, ताकि ऐसी घटनाओं से लोगों को बचाया जा सके।

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