‘द इंडिया स्टोरी’: अब खाना खाने में सोचना पड़ता है कि क्या सही पोषण है?- श्रेयस तलपड़े

फिल्म के लिए तुरंत हां नहीं की
श्रेयस तलपड़े कहते हैं, मैने इस फिल्म को तुरंत हां नहीं की थी। मुझे लगा था एक तो इंडिपेंडेंट फिल्म है और निर्देशक की पहली फिल्म है ऐसे में फिल्म करना एक रिस्क है । लेकिन मेरे पास जब वो स्क्रिप्ट लेकर आए और मैने उनके जुटाए जब तथ्य देखे तो मैं हैरान हो गया कि क्या वाकई में ऐसा होता है? मिलावटी खाने से लोगों की या बच्चों की जान जा सकती है ? मेरे मन में कई सवाल उठे? फिर मैने तय किया कि ये फिल्म जरूर करनी चाहिए क्योंकि यह घटना हमसे जुड़ी है। आश्चर्य है कि इस पर कोई फिल्म अब तक नहीं बनी या किसी ने बात भी नहीं की।
मैं भी अब खाने को लेकर सतर्क हो गया हूं
लोग कहते हैं कि घर का खाना खाओ आप सेहतमंद रहेंगे लेकिन इस फिल्म के बाद मुझे यह बात बेमानी लगती है। हमारी प्लेट में कौन से डिश में क्या मिलावटी जहर है आप नहीं जानते । इस फिल्म के बाद मै खुद खाने को लेकर सतर्क हो गया हूं। खाते वक्त हमेशा ये टेंशन होती है कि क्या सही चीज खा रहा हूं ? मेरी पत्नी मुझे कहने लगी हैं कि मैं थोड़ा साइको हो रहा हूं लेकिन जब आपको पता चले कि चावल में प्लास्टिक, गेहूं में पत्थर , फलों में रसायन है जिससे आप मर भी सकते हैं और ये लोगों के साथ हो भी रहा है तो आपको कैसे चिंता नहीं होगी ?पंजाब के मालवा क्षेत्र जो कैंसर बेल्ट के नाम से मशहूर है। वहां यही समस्या है। मुंबई तक कैंसर स्पेशल ट्रेन चलती है लेकिन कोई इस समस्या पर बात नहीं करना चाहता ।
सेंसर बोर्ड की आपत्ति समझ नहीं आई
फिल्म 24 जुलाई को रिलीज होने वाली है। हम सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट में अटकने के कारण इसका ट्रेलर रिलीज नहीं कर पा रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि फिल्म में क्या आपत्ति नजर आ रही है ? इसमें ना तो मारधाड़ है, ना किसी का गला काटा जा रहा है। ना खून बहाया गया है। बस एक ऐसे मुद्दे को सामने लाने की कोशिश है जिस पर कभी चर्चा नहीं हुई ।खाने में मिलावट कर ज़हर खिलाने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। इससे कई लोग बीमार हो रहे हैं और कैंसर से मर रहे हैं।
डिमांड और सप्लाई का कोई तालमेल नहीं
5 करोड़ दूध की सप्लाई है और आप 26 करोड़ लोगों तक दूध पहुंचा रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि वह दूध नकली है जिसे लोग आज पी रहे हैं। पर समझ नहीं आ रहा कि पहचाने कैसे कि क्या नकली है और क्या ऑर्गेनिक। ऑर्गेनिक के नाम पर वही बेसिक चीज कई गुना महंगी है जो दरअसल बेसिक जरूरत है। दाल चावल ही आपका जहरीला होगा तो आप सर्वाइव कैसे करेंगे ? मै सवाल पूछना चाहता हूं कि ऑर्गेनिक शब्द क्यों होना चाहिए ? सबको एक जैसा साफ़ सुथरा खाना आप क्यों नहीं दे सकते ? सरकारी तंत्र को इस पर तो ध्यान देना चाहिए ना।
जो विदेशों में बैन वो हम इस्तेमाल करते हैं
विदेश में लोग अपने खाने और उसकी गुणवत्ता पर बहुत ध्यान देते हैं। बल्कि यहां से जो फल, अनाज या बाकी उत्पाद विदेशों में जाते हैं वह उच्चतम क्वालिटी के होते हैं तो यहां वो प्रोडक्ट हम अपने ही लोगों को क्यों खिलाते। आपने नोटिस किया होगा बाहर के देशों में जो उत्पाद एक्सपायर्ड होता है उसका इस्तेमाल हम यहां करते हैं। मैने खुद विदेशी ब्रांड की विदेशी क्वालिटी और देसी क्वालिटी में फर्क महसूस किया है।
बात छेड़ेंगे तो बात होगी ना
मुझे लगता है फिल्म समाज का आईना है। मैने कई कॉमेडी फिल्में कर जब लोगों को हंसाया है तो इन गंभीर और सामाजिक मुद्दों पर बात कर उन्हें चेताना भी जरूरी है। मुझे लोग स्क्रीन पर हंसाने के लिए पसंद करते हैं। मैं यह भी मानता हूं कि थिएटर में लोग मनोरंजन के लिए जाते हैं पर यह फिल्म भी उनके हित के लिए ही बनीं है। मुझे नहीं पता कि इस फिल्म से क्या बदलाव आएगा लेकिन कम से कम चर्चा तो होगी।
फेलियर को कर सकता हूं हैंडल
जब से मैं बीमार हुआ था तब से मैंने अपनी सेहत पर काफी ध्यान देना शुरू कर दिया है हालांकि मैंने पाने काम से बेहद प्यार करता हूं। उतार चढ़ाव आपकी जिंदगी में आते हैं और फिल्म कभी फ्लॉप होती है तो कभी आप सफलता की ऊंचाई पर होते हैं लेकिन मुझे अब समझ आ गया है कि आपको फेलियर को कैसे हैंडल करना है। मैं ज्यादा अब इस बारे में सोचता ही नहीं। सिर्फ सिनेमा बनाना और अभिनय करना एन्जॉय करता हूं।
Created On :   16 July 2026 4:13 PM IST












