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Explainer: हॉन्गकॉन्ग में क्यों बेची जा रही टियर गैस फ्लेवर की आइसक्रीम? जानिए इस देश की चीन के खिलाफ विरोध की पूरी कहानी

Explainer: हॉन्गकॉन्ग में क्यों बेची जा रही टियर गैस फ्लेवर की आइसक्रीम? जानिए इस देश की चीन के खिलाफ विरोध की पूरी कहानी

हाईलाइट

  • हॉन्गकॉन्ग में टियर गैस फ्लेवर की आइसक्रीम बेची जा रही है
  • इस आइसक्रीम का मुख्य इंग्रेडियंट ब्लैक पेपरकॉर्न है
  • जानिए हॉन्गकॉन्ग की चीन के खिलाफ विरोध की पूरी कहानी

डिजिटल डेस्क, हॉन्गकॉन्ग। लोकतंत्र की स्थापना के लिए चीन से भिड़ रहे हॉन्गकॉन्ग में इन दिनों आइसक्रीम का एक नया फ्लेवर पॉपुलर हो रहा है। ये फ्लेवर है टियर गैस का जो लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के प्रतीक के तौर पर बनाया गया है। इसका मुख्य इंग्रेडियंट ब्लैक पेपरकॉर्न है। इस फ्लेवर की आइसक्रीम को बनाने के पीछे का मकसद है कि कोरोनावायरस के चलते थमा आंदोलन दोबारा गति पकड़ सके। आइसक्रीम का ये स्वाद हांगकांग के लोगों को पिछले साल के उन प्रदर्शनों की याद दिला रहा है जब पुलिस ने उन पर टियर गैस के गोले दागे थे। हॉन्ग कॉन्ग के अधिकारियों के मुताबिक प्रदर्शनों के दौरान 16,000 से अधिक राउंड टियर गैस फायर की गई थी। 

किसने क्या कहा?
अनीता वोंग नाम की एक ग्राहक ने कहा, इस आइसक्रीम का स्वाद टियर गैस की तरह लगता है। पहली बार में सांस लेना मुश्किल होता है और यह वास्तव में तीखा और परेशान करने वाला है। आपको इस आइसक्रीम को खाने के तुरंत बहुत सारा पानी पीने की इच्छा होती है। अनिता ने कहा, मुझे लगता है कि यह एक फ्लैशबैक है जो मुझे आंदोलन की याद दिलाता है। उस समय जब पुलिस ने टियर गैस के गोले छोड़े थे तो वो काफी दर्दनाक था और मुझे यह नहीं भूलना चाहिए।

टियर गैस के स्वाद वाली आइसक्रीम बेच रहे दुकानदार ने कहा- आइसक्रीम का ये फ्लेवर लोगों को याद दिलाएगा कि उन्हें अभी भी विरोध प्रदर्शन में बने रहना है और अपना जुनून नहीं खोना है।'दुकानदार ने बताया कि टियर गैस के स्वाद वाली आइसक्रीम को बनाने के लिए उन्होंने वसाबी और सरसों सहित विभिन्न सामग्रियों का इस्तेमाल किया। लेकिन काली मिर्च के इस्तेमाल से ही उन्हें ऐसा स्वाद मिल पाया जो टियर गैस के करीब है। ये गले में तीखा लगता है और आपको टियर गैस में सांस लेने जैसा अहसास दिलाता है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं हॉन्गकॉन्ग के बारे में वो सब कुछ जो आपके जानने लायक है।

क्या है चीन के खिलाफ हॉन्गकॉन्ग के लोगों के प्रदर्शन की वजह?
चीन के खिलाफ हॉन्गकॉन्ग के लोगों के प्रदर्शन की वजह प्रत्यर्पण बिल में किया गया चीनी सरकार का संशोधन है। दरअसल, हॉन्गकॉन्ग के मौजूदा प्रत्यर्पण कानून में कई देशों के साथ इसके समझौते नहीं है। इसके चलते अगर कोई व्यक्ति अपराध कर हॉन्गकॉन्ग वापस आ जाता है तो उसे मामले की सुनवाई के लिए ऐसे देश में प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता जिसके साथ इसकी संधि नहीं है। चीन को भी अब तक प्रत्यर्पण संधि से बाहर रखा गया था।

लेकिन नया प्रस्तावित संशोधन इस कानून में विस्तार करेगा और ताइवान, मकाऊ और मेनलैंड चीन के साथ भी संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देगा। इस कानून का विरोध कर रहें लोग मानते हैं कि अगर हॉन्गकॉन्ग के लोगों पर चीन का क़ानून लागू हो जाएगा तो लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया जाएगा और उन्हें यातनाएं दी जाएंगी। जबकि  सरकार का कहना है कि नया क़ानून गंभीर अपराध करने वालों पर लागू होगा। प्रत्यर्पण की कार्रवाई करने से पहले यह भी देखा जाएगा कि हॉन्गकॉन्ग और चीन दोनों के क़ानूनों में अपराध की व्याख्या है या नहीं।

चीन क्यों थोप रहा हॉन्गकॉन्ग पर अपना कानून?
आपके जहन में एक सवाल उठ रहा होगा कि चीन और हॉन्गकॉन्ग तो अलग-अलग देश है फिर चीन क्यों इस देश पर अपना कानून थोप रहा है। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। दरअसल 1841 में पहला अफीम युद्ध हुआ था। चीन को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा। इस हार की कीमत चीन को हॉन्गकॉन्ग को गंवाकर चुकानी पड़ी। हार के बाद 1842 में चीन ने नानजिंग संधि के तहत अंग्रेजों को हमेशा के लिए हॉन्गकॉन्ग सौंप दिया। इसके बाद ब्रिटेन ने अगले 50 सालों में हॉन्गकॉन्ग के सभी तीन मुख्य क्षेत्रों पर नियंत्रण हासिल कर लिया। 1898 में ब्रिटेन और चीन के बीच एक नई संधि हुई। इस संधि में ब्रिटेन को 99 सालों के लिए हॉन्गकॉन्ग के नए क्षेत्र भी मिल गए।

जैसे-जैसे संधि की खत्म होने की तारीख करीब आने लगी नए क्षेत्रों को हॉन्गकॉन्ग से अलग करने करना अकल्पनीय होने लगा। 1970 के दशक में चीन और ब्रिटेन ने हॉन्गकॉन्ग के भविष्य पर चर्चा करना शुरू किया। 1984 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर और चीन के प्रमुख झाओ ज़ियांग ने सीनो ब्रिटिश जॉइंट डिक्लेरेशन पर साइन किया। इस डिक्लेरेशन के तहत दोनों देश इस बात पर राजी हुए कि चीन 50 साल के लिए 'एक देश-दो व्यवस्था' की नीति के तहत हॉन्गकॉन्ग को कुछ पॉलिटिकल और सोशल ऑटोनॉमी देगा।

1997 में चीन के हवाले हुआ हॉन्गकॉन्ग
1997 में ब्रिटेन ने हॉन्गकॉन्ग को चीन के हवाले किया। इस दौरान बीजिंग ने 'एक देश-दो व्यवस्था' की अवधारणा के तहत कम से कम 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और अपनी क़ानूनी व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी दी। इसी के चलते हॉन्गकॉन्ग में रहने वाले लोग खुद को चीन का हिस्सा नहीं मानते। एक देश, दो नीति' के अंतर्गत यहां की अपनी मुद्रा, कानून प्रणाली, राजनीतिक व्यवस्था, अप्रवास पर नियंत्रण और सड़क के नियम हैं। केवल विदेशी और रक्षा से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी चीन सरकार की है। इसके बावजूद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने हॉन्गकॉन्ग सरकार पर प्रभाव डाला है।

हॉन्गकॉन्ग के लोग सीधे तौर पर अपना नेता नहीं चुनते बल्कि 1,200 सदस्यीय चुनाव समिति एक मुख्य कार्यकारी चुनती है। 2014 के आखिरी महीनों में काफी सारे लोग हॉन्गकॉन्ग के चुनाव में चीन की दखलंदाजी के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। इस प्रदर्शन को 'अंब्रैला मूवमेंट' के नाम से जाना जाता है जो 79 दिन तक चला था। हॉन्गकॉन्ग के लोग चाहते हैं कि ये प्रतिनिधि जनता के जरिए चुने जाए। चीन और ब्रिटेन के समझौते के कुछ साल और बचे हैं। क्या चीन तब भी हॉन्गकॉन्ग की ऑटोनॉमी को मान्यता देगा? ये हमें 2047 में ही पता चलेगा।

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