दैनिक भास्कर हिंदी: भीमा कोरेगांव केस: SC ने फैसला रखा सुरक्षित, सोमवार को दाखिल करना होगा लिखित नोट

September 20th, 2018

हाईलाइट

  • भीमा कोरेगांव केस में आज पांच आरोपियों के खिलाफ एफआईआर रद्द कराने को लेकर सुनवाई
  • बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केन्द्र सरकार ने पेश किए थे सबूत
  • FIR में छह लोगों के नाम हैं लेकिन किसी की भी तुरंत गिरफ्तारी नहीं की गई थी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नक्सल कनेक्शन के आरोपों पर पहले गिरफ्तार और अब नजरबंद वामपंथी विचारकों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस और विचारकों, दोनों पक्षों से सोमवार तक लिखित नोट दाखिल करने को कहा है। विचारकों की तरफ से दाखिल अर्जी में इस मामले को मनगढ़ंत बताते हुए एसआईटी जांच की मांग की गई है। 

 

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई में विचारकों की तरफ से वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर पेश हुए। ग्रोवर ने दलील दी कि पुलिस जिस लेटर का जिक्र कर रही है उसका कंटेंट हिंदी में है। ग्रोवर ने बेंच से कहा कि पुलिस कह रही है कि रोना विल्सन और सुधा भारद्वाज ने चिट्ठी लिखी है। उन्होंने आगे कहा कि कंटेंट से साफ जाहिर होता है कि किसी मराठी जानने वाले ने हिंदी में चिट्ठी लिखी है। यह मामला पूरी तरह फर्जी नजर आ रहा है। इससे पहले बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में महाराष्ट्र सरकार की ओर से ASG तुषार मेहता ने कहा कि सभी आरोपियों के खिलाफ मामले में पुख्ता सबूत हैं। FIR में छह लोगों के नाम हैं लेकिन किसी की भी तुरंत गिरफ्तारी नहीं की गई थी, शुरुआती जांच में सबूत सामने आने पर 6 जून को एक गिरफ़्तारी हुई जिसे कोर्ट में पेश करके रिमांड पर लेकर पूछताछ की गई, कोर्ट से सर्च वांरट मांगा गया था।

 

सरकारी तथ्यों को बताया षड्यंत्र
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि ये बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि विरोध और सरकार के खिलाफ साजिश दोनों अलग-अलग बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने जो डॉक्यूमेंट दिया है, उसमें कई यूनिवर्सिटी, सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के नाम हैं। क्या ये सब सरकार के खिलाफ षड्यंत्र में शामिल हैं ? सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि आपके पास इन पांच लोगों के खिलाफ तथ्य हैं ? तब महाराष्ट्र सरकार की ओर से एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि कोर्ट का काम सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है न कि केवल इन पांच लोगों की। इस दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पांचों एक्टिविस्टों के खिलाफ पुणे पुलिस की ओर से जुटाए गए सबूतों को पेश किया गया था। कोर्ट को मामले से जुड़े लैपटॉप, हार्ड डिस्क से कई तरह दस्तावेज और अन्य सबूत सौंपे गए। डीसीपी व सीनियर अधिकारी ने सीज किए गए कंप्यूटर लैपटाप पेनडराइव को फोरेॉसिक जांच के लिए लैब भेजा गया।

 

पिछली सुनवाई में था सबूतों का अभाव
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि पुणे पुलिस की ओर से जुटाए गए सबूत पर्याप्त नहीं होने की स्थिति में मामले की जांच SIT को सौंपी जा सकती है। कोर्ट ने राज्य सरकार के वकील को 45 मिनट और बचाव पक्ष के वकील को 15 मिनट में दलीलें पूरी करने को कहा था। दरअसल, महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश ASG तुषार मेहता ने फिर याचिका का विरोध किया था।उन्होंने कहा था कि ये याचिका ऐसे लोगों ने डाली है, जिनका केस से कोई सरोकार नहीं और न ही उन्हें केस के बारे में पता है,इस पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए। 

 

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