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झारखंड की कोर्ट में वॉट्सएप पर सुनवाई, SC ने कहा- क्या यह मजाक है?

September 09th, 2018 18:35 IST
झारखंड की कोर्ट में वॉट्सएप पर सुनवाई, SC ने कहा- क्या यह मजाक है?

हाईलाइट

  • झारखंड के हजारीबाग कोर्ट में वॉट्सएप के जरिए ट्राइल का मामला सामने आया है।
  • SC ने इस मामले पर नाराजगी जाहिर की है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह किस तरह का ट्राइल है। क्या यह एक तरह का मजाक है?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप के माध्यम से किसी क्रिमिनल केस के ट्राइल के बारे में सुना है? नहीं न, लेकिन यह सच है। झारखंड के हजारीबाग कोर्ट का यह असाधारण मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की बेंच ने निचली अदालत के वॉट्सऐप के जरिए सुनवाई करने पर नाराजगी जाहिर की। बेंच ने कहा झारखंड में यह क्या हो रहा है। यह किस तरह का ट्राइल है। क्या यह एक तरह का मजाक है?

दरअसल, झारखंड के पूर्व मंत्री योगेंद्र साव और उनकी पत्नी निर्मला देवी, जिन्हें 2016 के दंगों के मामले में आरोपी बनाया गया था, को पिछले साल शीर्ष अदालत ने जमानत दे दी थी। जमानत की शर्त थी कि वे भोपाल में रहेंगे और केवल अदालती कार्यवाही में भाग लेने के लिए झारखंड में प्रवेश कर सकेंगे। दोनों अभियुक्तों ने अब सर्वोच्च न्यायालय को बताया है कि मुकदमे के न्यायाधीश ने इस साल 19 अप्रैल को 'व्हाट्सएप' कॉल के माध्यम से उनके खिलाफ आरोप तय किए, जबकि इसे लेकर उन्होंने आपत्ति भी उठाई थी।

जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एलएन राव की बेंच ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा, 'झारखंड में क्या हो रहा है। इस प्रक्रिया की अनुमति नहीं दी जा सकती है और हम न्याय प्रशासन की बदनामी की अनुमति नहीं दे सकते।' बेंच ने झारखंड सरकार के वकील से कहा, 'हम यहां वॉट्सऐप के जरिये मुकदमा चलाए जाने की राह पर हैं। इसे नहीं किया जा सकता। यह किस तरह का मुकदमा है? क्या यह मजाक है?’

बेंच ने दोनों आरोपियों की याचिका पर झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया और दो सप्ताह के अंदर राज्य से इसका जवाब देने को कहा। इस याचिका में आरोपियों ने केस को हजारीबाग से नई दिल्ली ट्रांसफर करने की अपील की है। झारखंड सरकार के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि साव जमानत की शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं और ज्यादातर समय भोपाल से बाहर थे। इसी वजह से इस मामले की कार्यवाही में देरी हुई थी।

इसपर बेंच ने कहा, "यह एक अलग बात है। अगर आपको लगता है कि आरोपी जमानत की शर्तों का उल्लंघन कर रहें है, तो आप जमानत रद्द करने की मांग कर एक अलग आवेदन कर सकते हैं। हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमें उन लोगों के साथ सहानुभूति नहीं है जिन्होंने जमानत की शर्त का उल्लंघन किया है।" साव दंपति की ओर से उपस्थित सीनियर एडवोकेट विवेक तन्खा ने कहा कि आरोपियों को 15 दिसंबर, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत दी थी और उन्हें मध्य प्रदेश के भोपाल में रहने के निर्देश दिए गए थे।

अदालत ने आरोपियों का ट्राइल झारखंड के हजारीबाग अदालत में भोपाल की जिला अदालत से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किए जाने का निर्देश दिया था। विवेक तन्खा ने कहा, भोपाल और हजारीबाग की कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की कनेक्टिविटी ज्यादातर समय "बहुत कम" थी और निचली अदालत के जज ने वॉट्सऐप वीडियो कॉल के जरिये 19 अप्रैल को आदेश सुनाया।

बेंच ने तंखा से पूछा कि दोनों आरिपियों के खिलाफ कितने मामले लंबित हैं। तंखा ने कहा कि साओ के खिलाफ 21 मामले लंबित है, जबकि उनकी पत्नी के खिलाफ नौ मामले लंबित है। उन्होंने कहा, "वे दोनों राजनेता हैं और झारखंड में राष्ट्रीय थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विभिन्न विरोध प्रदर्शन किए हैं और इनमें से अधिकतर मामले उन आंदोलनों से संबंधित हैं।"

तन्खा ने कहा कि चूंकि ये मामले दायर किए जाने के दौरान दोनों आरोपी विधायक थे। इसलिए उनके खिलाफ इन मामलों को दिल्ली की स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए, जो नेताओं से संबंधित मामलों पर खासतौर पर विचार करती है। बता दें कि साव और उनकी पत्नी 2016 में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प से संबंधित मामले में आरोपी हैं। इसमें चार लोग मारे गए थे। साव अगस्त 2013 में हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री बने थे। 

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