दैनिक भास्कर हिंदी: 58 मिनट की सर्जिकल स्ट्राइक के लिए 24 घंटे आतंकियों के सामने घास में छिपे रहे थे 19 वीर जवान

September 26th, 2017

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ठीक एक साल पहले 29 सितंबर 2016 को भारत के मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह ने जब घोषणा की कि भारत ने सीमापार आतंकियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की है, तो पूरी दुनिया सन्न रह गई थी। इस सर्जिकल स्ट्राइक पर भारत के ही कुछ राजनीतिक दलों ने संदेह जताया था। इसके बाद जब शांति काल में देश के सबसे बड़े सैन्य सम्मान घोषित हुए तो इसमें सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने वाले दो शूरवीर भी थे।

एलओसी क्रास करके हमारे 19 शूरवीर पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों तक पहुंचे थे। इन सैनिकों को मालूम था कि ये सर्जिकल स्ट्राइक उनके जीवन का अंतिम सैन्य ऑपरेशन भी हो सकता है, लेकिन वे पूरी तैयारी के साथ इस ऑपरेशन के लिए रवाना हुए थे। वे पूरी तरह बलिदान देने के लिए तैयार थे। सेना की इस बहादुरी भरी कहानी को कम ही लोग जानते हैं।

इस ऑपरेशन को अंजाम देने के पहले हमारे 19 सैनिकों ने पूरे 24 घंटे पाक पोषित आतंकियों के अड्डे के ठीक सामने घास में छिपकर 24 घंटे बिताए थे। सैनिकों के सामने एलओसी क्रास करके दुश्मन पर कार्रवाई करने से ज्यादा बड़ी चुनौती वापस आने की थी। इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए जिस मेजर को जिम्मेदारी दी गई थी उनका नाम गुप्त रखकर उन्हें माइक टेंगो नाम दिया गया था। इंडियाज मोस्ट फियरलेस-ट्रू स्टोरीज ऑफ़ माडर्न मिलिट्री हीरोज़ नामक बुक में शिव अरूर और राहुल सिंह ने इस पूरे मिलिट्री ऑपरेशन का वर्णन किया है। bhaskarhindi.com ये रोमांच से भर देने वाली ये स्टोरी अपने रीडर्स के सामने प्रस्तुत कर रहा है। 

ऐसा नहीं था कि इससे पहले लाइन ऑफ कंट्रोल के पार सर्जिकल स्ट्राइक न की गई हो, लेकिन ये पहली बार था कि भारतीय सेना दुनिया को साफ़ साफ़ बता रही थी कि वास्तव में उसने ऐसा किया था। भारतीय सेना के उड़ी ठिकाने पर आतंकियों द्वारा किया गया हमला, जिसमें 17 भारतीय सैनिक मारे गए थे और दो सैनिकों की बाद में अस्पताल में मौत हो गई थी। जैसे ही ये ख़बर फैली दिल्ली के रायसिना हिल्स पर गतिविधियां तेज़ हो गईं।

आनन-फानन में अत्यंत गोपनीय 'वार रूम' में भारत के सुरक्षा प्रबंधन की खुफ़िया बैठकें बुलाई गई, जिसमें कम से कम एक बैठक में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ शामिल हुए। 'इंडियाज़ मोस्ट फ़ियरलेस-ट्रू स्टोरीज़ ऑफ़ माडर्न मिलिट्री हीरोज़' के सह लेखक राहुल सिंह बताते हैं, "इस बारे में हमने बहुत सारे जनरलों और स्पेशल फ़ोर्स के अधिकारियों से बात की है और हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इस बैठक में ही ये फ़ैसला लिया गया कि भारतीय सेना लड़ाई को दुश्मन के क्षेत्र में ले जाएगी और इस हमले पर भारत चुप नहीं बैठेगा और इसका समुचित जवाब दिया जाएगा।"

माइक टैंगो को ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी

एलओसी के पार पाक परस्त आतंकियों के ठिकानों को ध्वस्त करने की ज़िम्मेदारी एलीट पैरा एसएफ़ के टूआईसी मेज़र माइक टैंगो को दी गई। ये उनका असली नाम नहीं है। सुरक्षा कारणों से इस पूरी किताब में उन्हें उनके इस ऑपरेशन के दौरान रेडियो नाम मेज़र माइक टैंगों के नाम से बताया गया है। 'इंडियाज़ मोस्ट फ़ियरलेस' के लेखक, शिव अरूर बताते हैं, "स्पेशल फ़ोर्स के अधिकारियों को क्रेम डेला क्रेम ऑफ़ सोल्जर्स कहा जाता है। ये भारतीय सेना के सबसे फ़िट, मज़बूत और मानसिक रूप से सजग सैनिक होते हैं। इनकी फ़ैसला लेने की क्षमता सबसे तेज़ होती है और जहां ज़िदगी और मौत का मामला हो, इनका दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है।"

वो कहते हैं, "ख़तरनाक परिस्थितियों में ज़िंदा रहने की कला जितनी इन्हें आती है किसी को नहीं। सेना का इस्तेमाल आमतौर से रक्षण के लिए किया जाता है, लेकिन स्पेशल फ़ोर्सेज़ शिकारी होते हैं। उनका इस्तेमाल हमेशा आक्रमण के लिए होता है।"

मोदी और सुषमा भी बने अनजान, ताकि दुश्मन रहे भ्रमित

दिल्ली में इस पूरे मामले को इस तरह लिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। नरेंद्र मोदी ने कोझिकोड़ में भाषण देते हुए उड़ी पर एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने ये ज़रूर कहा कि भारत और पाकिस्तान को ग़रीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज ने भी उड़ी पर भारत के गुस्से का कोई इज़हार नहीं किया। पाकिस्तान को ये आभास देने की कोशिश की गई कि सब कुछ सामान्य है जबकि अंदर ही अंदर सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी ज़ोरों पर थी।

राहुल सिंह बताते हैं, "मेज़र टैंगो की टीम ने पाकिस्तान के अंदर अपने चार सूत्रों से संपर्क किया। इनमें से दो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के ग्रामीण थे और दो जैश-ए-मोहम्मद में भारत के लिए काम कर रहे जासूस थे। चारों लोगों ने अलग अलग इस बात की पुष्टि की कि आतंकियों के लॉंचिंग पैड में चरमपंथी मौजूद हैं।"

पैदल चलते हुए साढे तीन घंटे में टारगेट के सामने थे जवान
 

माइक टैंगो के नेतृत्व में 19 भारतीय जवानों ने 26 सितंबर की रात साढ़े आठ बजे अपने ठिकानों से पैदल चलना शुरू किया और 25 मिनटों में उन्होंने एलओसी को पीछे छोड़ दिया। टैंगो के हाथ में उनकी एम 4 ए1 5।56 एमएम की कारबाइन थी। उनकी टीम के दूसरे सदस्य एम4 ए1 के अलावा इसराइल में बनी हुई टेवर टार-21 असॉल्ट रायफ़लें लिए हुए थे। माइक टैंगो ने शिव अरूर और राहुल सिंह को बताया कि उन्होंने इस अभियान के लिए स्पेशल फ़ोर्स में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ जवान चुने थे। लेकिन इस तरह के अभियान में कुछ लोगों का हताहत होना अवश्यसंभावी है।

असल में इसकी संभावना 99.09 फ़ीसदी थी और उनकी टीम ये कुर्बानी देने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी थी। टैंगो मान कर चल रहे थे कि इस अभियान का सबसे मुश्किल चरण होगा वापसी का, जब पाकिस्तानियों को उनके वहां होने के बारे में पूरी जानकारी मिल चुकी होगी।

जब 24 घंटे घास पर लेटे रहे और फिर किया अंधेरे का इंतजार

चार घंटे चलने के बाद टैंगो और उनकी टीम अपने लक्ष्य के बिल्कुल नज़दीक पहुंच गई। वो वहां से 200 मीटर की दूरी पर थे कि वो हुआ जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। लांच पैड से अचानक फ़ायरिंग शुरू हो गई। एक सेकंड को उन्हें लगा भी कि क्या पाकिस्तानियों को उनके आने का पता चल गया है। सारे जवान एक सेकेंड से भी कम समय में ज़मीन के बल लेट गए, लेकिन टैंगो के अनुभवी कानों ने अंदाज़ा लगा लिया कि ये अंदाज़े से की गई फ़ायरिंग है और उसका निशाना उनकी टीम नहीं है, लेकिन एक तरह से ये बुरी ख़बर भी थी, क्योंकि इससे साफ़ ज़ाहिर था कि लांच पैड के अंदर रह रहे चरमपंथी सावधान थे। टैंगो ने तय किया कि वो उस इलाक़े में छिपे रहेंगे और अपना हमला 24 घंटे बाद अगली रात में बोलेंगे।

लेखक शिव अरूर बताते हैं, "ये इस ऑपरेशन का सबसे संवेदनशील और ख़तरनाक हिस्सा था। रात के अंधेरे में तो दुश्मन के इलाक़े में छिपे रहना शायद इतना मुश्किल काम नहीं था, लेकिन सूरज चढ़ने के बाद उस इलाक़े में जमे रहना ख़ासा जीवट का काम था। लेकिन उससे उन्हें एक फ़ायदा ज़रूर होने वाला था कि उन्हें उस इलाक़े को पढ़ने और रणनीति बनाने के लिए 24 घंटे और मिलने वाले थे। टैंगो ने आख़िरी बार सेटेलाइट फ़ोन से अपने सीओ से संपर्क किया और फिर उसे ऑफ़ कर दिया।

50 गज़ की दूरी पर थे आतंकी, एक ही फायर में हुए ढेर

28 सितंबर का रात दिल्ली में भारतीय कोस्ट गार्ड कमांडर्स का वार्षिक भोज हो रहा था, लेकिन सभी चोटी के मेहमान रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह ने अपने मेज़बानों से माफ़ी मांगी और सेना के मिलिट्री ऑपरेशन रूम पहुंच गए ताकि वहां से उस समय शुरू हो चुके इस अभियान को दिल्ली से मॉनीटर किया जा सके। आधी रात को दिल्ली से 1000 किलोमीटर दूर टैंगो और उनकी टीम अपने छिपे हुए स्थान से निकले और उन्होंने लांच पैड की तरफ़ बढ़ना शुरू किया। लांचपैड से 50 गज़ पहले टैंगो ने अपनी नाइट विजन डिवाइस से देखा कि दो लोग आतंकियों के ठिकाने पर पहरा दे रहे हैं।

राहुल सिंह बताते हैं, "टैंगो ने 50 गज़ की दूरी से निशाना लिया और एक ही बर्स्ट में दोनों आतंकियों को धाराशाई कर दिया। पहली गोली चलने तक ही कमांडोज़ के मन में तनाव रहता है। गोली चलते ही ये तनाव जाता रहता है।" इसके बाद तो गोलियों की बौछार करते हुए टैंगो के कमांडो लांच पैड की तरफ़ बढ़े। अचानक टैंगो ने देखा कि दो चरमपंथी जंगलों में भागने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो भारतीय सैनिकों पर पीछे से हमला कर सकें। टैंगो ने अपनी 9एमएम बेरेटा सेमी ऑटोमेटिक पिस्टल निकाली और 5 फ़ीट की दूरी से उन आतंकियों पर फ़ायर कर उन्हें गिरा दिया।

शिव अरूर बताते हैं, "माइक टैंगो और उनकी टीम वहां पर 58 मिनटों तक रही। उन्हें पहले से ही बता दिया गया था कि वो शवों को गिनने में अपना समय बरबाद न करें। लेकिन लेकिन एक अनुमान के अनुसार, चार लक्ष्यों पर कुल 38 से 40 चरमपंथी और पाकिस्तानी सेना के 2 सैनिक मारे गए। इस पूरे अभियान के दौरान पूरी तरह से रेडियो साइलेंस रखा गया।

कानों के बग़ल से गोलियां

अब टैंगो के सामने असली चुनौती थी कि किस तरह वापस सुरक्षित भारतीय सीमा में पहुंचा जाए, क्योंकि अब तक पाकिस्तानी सेना को उनकी उपस्थिति का पता चल चुका था।
राहुल सिंह बताते हैं, "माइक टैंगो ने हमे बताया कि अगर मैं कुछ इंच लंबा होता तो आपके सामने बैठ कर बात न कर रहा होता। पाकिस्तानी सैनिकों की गोलियां हमारे कानों के बग़ल से गुज़र रही थीं। जब ऑटोमेटिक हथियार की गोली कान के बगल से गुज़रती है तो आवाज़ आती है।।।। पुट।। पुट।। पुट। हम चाहते तो उसी रास्ते से वापस आ सकते थे, जिस रास्ते से हम वहां गए थे। लेकिन अपने जानबूझ कर वापसी का लंबा रास्ता चुना।

"हम पाकिस्तानी क्षेत्र में और अंदर गए और फिर वहां से वापसी के लिए वापस मुड़े। बीच में 60 मीटर का एक ऐसा हिस्सा भी आया जहां आड़ के लिए कुछ भी नहीं था। सारे कमांडोज़ ने पेट के बल चलते हुए उस इलाक़े को पार किया।''

"टैंगो की टीम ने सुबह साढ़े चार बजे भारतीय क्षेत्र में क़दम रखा। लेकिन तब भी वो पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थे। लेकिन तब तक वहां पहले से मौजूद भारतीय सैनिकों ने उन्हें कवर फ़ायर देना शुरू कर दिया था। सबसे बड़ी बात ये थी कि इस पूरे अभियान में टैंगो की टीम का एक भी सदस्य न तो मारा गया और न ही घायल हुआ।

खुशी में बोतल से सीधे मुंह में व्हिस्की

भारत की सीमा पार करते ही एक चीता हेलिकॉप्टर, टैंगो को 15 कोर के मुख्यालय ले गया। उनको सीधे ऑपरेशन रूम ले जाया गया। वहां उनके सीओ ने उन्हें गले लगाया। कोर कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल सतीश दुआ को देखते ही टैंगो ने उन्हें सेल्यूट किया।

राहुल सिंह बताते हैं, "जब जनरल दुआ टैंगो से मिल रहे थे, एक वेटर एक ट्रे में ब्लैक लेबेल व्हिस्की भरे कुछ ग्लास ले कर आया। जनरल ने हुक्म दिया, इन्हें वापस ले जाओ। सीधे बोतल लाओ। तुम्हें पता नहीं कि ये लोग गिलास खा जाते हैं। ये सही भी है क्योंकि स्पेशल फ़ोर्स के कमांडोज़ को गिलास खाने की ट्रेनिंग दी जाती है।

"वेटर तुरंत ब्लैक लेबेल की बोतल ले आया। जनरल दुआ ने बोतल अपने हाथ में ली और टैंगो से अपना मुंह खोलने के लिए कहा। वो तब तक टैंगो के मुंह में व्हिस्की डालते रहे जब तक उन्होंने बस नहीं कह दिया। उसके बाद टैंगों ने भी जनरल दुआ के मुंह में सीधे बोतल से व्हिस्की उड़ेली।

मेजर टैंगो को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कीर्ति चक्र से सम्मानित किया

जब टैंगो उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल डीएस हूदा से मिलने ऊधमपुर गए तो व्हिस्की का एक और दौर चला। राहुल बताते हैं, "टैंगो ने मन ही मन सोचा, कोई खाना दे दो। सारे दारू ही पिला रहे हैं।" इसी साल मार्च में मेज़र टैंगो को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। उस समय इस बात का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया कि कीर्ति चक्र पाने वाले और कोई नहीं, सर्जिकल स्ट्राइक के हीरो मेज़र माइक टैंगो ही हैं।