दैनिक भास्कर हिंदी: जानिए क्या है अविश्वास प्रस्ताव, कितने सांसदों के समर्थन की होती है जरूरत

July 20th, 2018

हाईलाइट

  • लोकसभा में लाया जाता है अविश्वास प्रस्ताव।
  • इंदिरा गांधी के कार्यकाल में सबसे ज्यादा बार लाया गया है अविश्वास प्रस्ताव।
  • दो बार अविश्वास प्रस्ताव के शिकार हुए हैं पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सड़क से लेकर संसद तक इस समय भूचाल सा मचा हुआ है। कुछ दिनों पहले तक कम सांसद और विधायक वाले जिन दलों को कोई पूछता तक नहीं था, अब उनकी भी पूछ-परख बढ़ गई है। विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया है, जिसे सरकार विफल करने की कोशिश कर रही है। ये पहला मौका नहीं है, जब किसी सरकार को अविश्वास प्रस्ताव की परीक्षा से गुजरना होगा। पहले भी कई बार ऐसे मौके आए हैं। आइए जानते हैं, विपक्ष किस तरह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाता है और इसे किस तरह पारित किया जाता है।

 

50 सांसदों का समर्थन चाहिए
जब विपक्षी दलों को लगता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं रह गया है, तब अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। इसे केवल लोकसभा में ही रखा जा सकता है, राज्यसभा में नहीं। कोई भी सांसद अविश्‍वास प्रस्‍ताव पेश कर सकता है, लेकिन उसके पास कम से कम 50 लोकसभा सदस्‍यों का समर्थन होना जरूरी है। ये आंकड़ा पूरा होने के बाद अविश्‍वास प्रस्‍ताव लोकसभा अध्‍यक्ष के सामने पेश किया जाता है।

 

10 दिन में चर्चा कराना जरूरी
स्‍पीकर की मंजूरी के 10 दिनों के अंदर अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर चर्चा होती है। सरकार अपने सांसदों को व्हिप जारी करती है। सत्ता पक्ष को सरकार बनाए रखने के लिए अविश्वास प्रस्ताव को गिराना या नामंजूर कराना जरूरी होता है। सदन में अविश्वास प्रस्ताव मंजूर होने पर सरकार गिर जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में ऐसा हो चुका है।  

 

विश्वास प्रस्ताव को इस तरह समझिए
अविश्वास प्रस्ताव को समझने के लिए विश्वास प्रस्ताव को समझना जरूरी है। विश्वास प्रस्ताव केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री पेश करता है। सरकार को बनाए रखने के लिए इस प्रस्ताव का मंजूर होना मतलब पारित होना जरूरी है। प्रस्ताव पारित न होने की स्थिति में सरकार गिर जाती है। सरकार को समर्थन देने वाले घटक यदि समर्थन वापसी का ऐलान कर दें तो राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को सदन का भरोसा हासिल करने को कह सकते हैं। सरकार बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना यानी नामंजूर होना जरूरी है। 

 

दो बार 'अविश्वास' के शिकार हुए अटल
अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है। अविश्‍वास प्रस्‍ताव सदन में विपक्ष लेकर आता है, जबकि विश्‍वास प्रस्‍ताव सत्‍ता पक्ष लाता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दो बार सदन में विश्‍वास मत हासिल करने का प्रस्‍ताव पेश किया था और दोनों बार वे हार गए थे। उन्होंने 1996 में वोटिंग से पहले ही इस्‍तीफा दे दिया था। 1998 में एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी।

 

सबसे पहले नेहरू के खिलाफ आया 'अविश्वास'
सबसे पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ जेबी कृपलानी ने अगस्‍त 1963 में अविश्‍वास प्रस्‍ताव पेश किया था, जो लोकसभा में पास नहीं हो सका था। इसके पक्ष में केवल 62 और विरोध मतलब सरकार के समर्थन में 347 वोट पड़े थे। सबसे ज्यादा 15 बार इंदिरा गांधी के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाया गया। मोरारजी देसाई की सरकार 1978 में अविश्‍वास प्रस्‍ताव के कारण ही गिर गई थी। नरसिम्‍हा राव सरकार भी 1993 में अविश्‍वास प्रस्‍ताव के कारण गिरने वाली थी, लेकिन कुछ अंतर से बच गई। लाल बहादुर शास्‍त्री और नरसिम्हा राव की सरकार के समय 3-3 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।

 

मोदी सरकार का सामना पहली बार
2014 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भाजपा की मोदी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में यह पहला अविश्‍वास प्रस्‍ताव है। पार्टी ने अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए 282 सीटें हासिल की थीं। सहयोगियों को मिलाकर एनडीए का आंकड़ा 300 पार पहुंच गया था, लेकिन एक के बाद एक लोकसभा उपचुनाव में हार के चलते बीजेपी का आंकड़ा कम हो गया। अब बीजेपी के पास लोकसभा में 272 सीटें बची हैं। इस समय लोकसभा में 535 सदस्‍य हैं। बहुमत साबित करने के लिए मोदी सरकार को 268 वोट चाहिए। भाजपा के पास अकेले ही 272 सदस्‍य हैं।

 

ऐसे लाया जाता है अविश्वास प्रस्ताव
नियम के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए संसद के सदस्य को सुबह 10 बजे के पहले लिखित नोटिस देना होता है, जिसे लोकसभा स्पीकर सदन के समक्ष पढ़ते हैं। 50 सदस्यों का समर्थन होने के बाद ही स्पीकर इसे स्वीकार करते हैं। प्रस्ताव के स्वीकार होने के 10 दिन के अंदर ही इस पर चर्चा कराने का प्रावधान है। ऐसा न होने पर इसे विफल मान लिया जाता है और जिस सदस्य ने इसे आगे बढ़ाया होता है उसे इसके बारे में बता दिया जाता है। चर्चा के बाद अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग कराई जाती है। अगर सरकार बहुमत साबित करने में विफल हो जाती है तो प्रधानमंत्री इस्तीफा दे देते हैं और सरकार गिर जाती है।