दैनिक भास्कर हिंदी: गोधरा कांड से जुड़ी वो हर बात, जो आप जानना चाहते हैं 

October 9th, 2017

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। साल 2002 में गुजरात में एक भूचाल आया था। पूरा गुजरात आग, हिंसा, चीख, पुकार में कहीं खो गया था। हम बात कर रहे हैं 27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड की। 27 फरवरी 2002, यह दिन भारत के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। घटना को 15 साल बीत चुके हैं। इस दिन रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के एस-6 कोच में कुछ लोगों ने आग लगा दी और इससे पूरे देश में खलबली मच गई। संदेह और सबूत बता रहे थे कि घटना को एक धर्म विशेष के लोगों ने अंजाम दिया था। आग लगने से ट्रेन में सवार 59 लोग मारे गए।

इस घटना का असर यह हुआ कि गुजरात, सांप्रदायिक दंगों की आग में जल उठा। हर तरफ खून-खराबा होने लगा। एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों के खून के प्यासे हो गए। 28 फरवरी 2002 की रात एक धर्म के लोग हाथों में ईंट-पत्‍थर, त्रिशूल तलवार लेकर उतर पड़े। दूसरे धर्म के लोगों को घरों से खींच-खींच कर मारना शुरू कर दिया। दो दिन पहले तक साथ हंसने-खेलने वाले एक दूसरे की जान के प्यासे हो गए। लोगों ने अपने ही मोहल्ले के लोगों का सिर काटकर सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया।

हजारों लोग अपना घर छोड़कर जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग गए। कई लोगों को उनके घरों के साथ जला दिया गया। बड़ी संख्या में बच्चे लापता हो गए। आधिकारिक तौर पर इस घटनाक्रम में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए 11 दोषियों की फांसी की सजा को 'उम्रकैद' में बदल दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस कांड में मारे गए 59 लोगों के परिवार को 10-10 लाख का मुआवजा देने का फैसला भी दिया।

तब मोदी थे गुजरात के सीएम

गोधरा की आग पूरे गुजरात में फैल चुकी थी। दंगों के समय कानून-व्यवस्था बरकरार न रख पाने का आरोप तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगा। आरोप था कि सब कुछ उनकी जानकारी में रहते हुआ। कई पीड़ितों ने आरोप लगाया कि पुलिस सामने खड़ी रही और लोग एक खास धर्म के लोगों का नरसंहार करते रहे। आरोप यहां तक थे कि कारसेवकों ने पुलिस की शह पर इस घटना को अंजाम दिया। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा ही इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उन्हें जैसे ही इसकी जानकारी हुई उन्होंने आला अधिकारियों को हालात से निपटने के लिए कहा और लगातार हालात का जायजा लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने दंगों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया, जिसने 2012 में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी और उन आरोपों को भी खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि मोदी सरकार ने दंगे रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

केंद्र के दबाव में हटाना पड़ा POTA
3 मार्च 2002 को गोधरा में ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (POTA) के तहत केस दर्ज किया गया। इसके साथ ही गुजरात सरकार ने 6 मार्च 2002 को कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया। 9 मार्च 2002 को पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी के तहत केस दर्ज कर लिया। हालांकि बाद में केंद्र सरकार के दबाव में आकर आरोपियों पर लगा POTA हटाना पड़ा।

कांग्रेस नेता की भी हुई थी हत्या
गोधरा से भड़की दंगों की चिंगारी अहमदाबाद और वडोदरा में भी भड़की। गुलमर्ग सोसाइटी में घुसे दंगाइयों ने कांग्रेस नेता एहसान जाफरी समेत कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया। नरोदा पाटिया में भी भयंकर हिंसा देखने को मिली। वडोदरा के कुछ हिस्सों में भी दंगों की आंच दिखी। आखिरकार सेना की मदद से दंगों पर काबू पाया गया। 1 मार्च को सरकार ने दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया था। लंबे समय तक चली मशक्कत के बाद राज्य के हालात सामान्य हुए।

नानावटी आयोग ने सौंपी रिपोर्ट
26 मार्च 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा में ट्रेन में लगी आग और गोधरा के बाद हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जांच के लिए विशेष जांच आयोग का गठन कर दिया। 18 सितंबर को नानावटी आयोग ने गोधरा कांड को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपी और कहा कि यह घटनाक्रम पूरी तरह प्लान किया गया था, जिसके तहत एस-6 कोच पर पेट्रोल डालकर आग लगाई गई थी।

एक साल बाद फिर बनी बीजेपी की सरकार
दंगों के एक साल बाद गुजरात में एक बार फिर विधानसभा के चुनाव हुए। राज्य में बीजेपी फिर से सत्ता में आई तो आरोपियों के खिलाफ फिर से POTA लगा दिया गया। 4 सितंबर 2004 को यूपीए सरकार ने हाई कोर्ट के जस्टिस यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति गठित की, जिसे मामले की जांच सौंपी गई। 17 जनवरी 2005 को समिति ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में एस-6 कोच में लगी आग को हादसा बताया था और इस बात की आशंका से इनकार किया था कि किसी ने बोगी में आग लगाई है। हालांकि बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने समिति के गठन पर सवाल खड़े कर दिए और उसे गैरकानूनी करार दिया। क्योंकि उस वक्त नानावटी-शाह आयोग पहले ही मामले की जांच कर रहा था।

9 साल बाद आया फैसला
लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद 22 फरवरी 2011 को विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी ठहराया जबकि 63 को बरी कर दिया। अदालत ने 11 दोषियों को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एसआईटी के बाद कोर्ट से भी राहत दे दी गई और उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया गया। एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने ऊपरी अदालत में इसके खिलाफ अपील की लेकिन वहां भी मोदी के खिलाफ मामले रद्द कर दिया गया।