शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0: जलवायु परिवर्तन और महिला स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय विमर्श से उभरा सशक्त संदेश - “महिला स्वस्थ, तो भविष्य सुरक्षित”

जलवायु परिवर्तन और महिला स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय विमर्श से उभरा सशक्त संदेश - “महिला स्वस्थ, तो भविष्य सुरक्षित”
मेडिवेज फाउंडेशन एवं ओसवी हेल्थकेयर के संयुक्त तत्वावधान में शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0 का गरिमामय एवं प्रभावशाली आयोजन ताज गंगेज, नदेसर, वाराणसी में सम्पन्न हुआ।

डिजिटल डेस्क, वाराणसी। मेडिवेज फाउंडेशन एवं ओसवी हेल्थकेयर के संयुक्त तत्वावधान में शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0 का गरिमामय एवं प्रभावशाली आयोजन ताज गंगेज, नदेसर, वाराणसी में सम्पन्न हुआ।

“क्लाइमेट चेंज एंड विमेंस हेल्थ” पर केन्द्रित यह राष्ट्रीय संवाद, “पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच महिला स्वास्थ्य के भविष्य का निर्माण” विषय-वस्तु के साथ आयोजित किया गया, जिसमें देशभर से आए प्रख्यात विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, चिकित्सकों, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योग प्रतिनिधियों तथा सामाजिक विचारकों ने सहभागिता की।

यह आयोजन केवल एक सम्मेलन भर नहीं रहा, बल्कि महिला स्वास्थ्य, पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक उत्तरदायित्व और नीतिगत संवेदनशीलता के प्रश्नों पर एक दूरदर्शी राष्ट्रीय हस्तक्षेप के रूप में उभरा। कार्यक्रम ने जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, रासायनिक जोखिम, जीवनशैलीगत असंतुलन और महिला स्वास्थ्य के बीच गहरे अंतर्संबंधों पर गंभीर, व्यापक और बहुआयामी विमर्श को जन्म दिया।

उद्घाटन सत्र : संतुलन, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का आह्वान

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि पद्मश्री नलिनी अस्थाना ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि जीवन में “सुर, ताल और लय” का संतुलन जितना आवश्यक है, उतना ही समाज, परिवार और प्रकृति के बीच मानवीय संवेदना तथा संतुलित संबंध भी अनिवार्य हैं। उन्होंने नारी गरिमा और पर्यावरणीय संतुलन को सामाजिक स्थिरता का आधार बताते हुए कहा— “नारी सुरक्षित है तो समाज सुरक्षित है।”

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रकृति की सीमाओं का अतिक्रमण अंततः विनाश को आमंत्रित करता है; अतः विकास और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

विशिष्ट अतिथि डॉ. एच. पी. माथुर (चेयरपर्सन, उत्कर्ष वेलफेयर) ने प्रदूषण को “धीमा जहर” बताते हुए कहा कि इसका प्रभाव केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी गहरी छाप छोड़ रहा है। उन्होंने महिला सशक्तिकरण में वित्तीय साक्षरता की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए औद्योगिक एवं पर्यावरणीय मानकों के कड़ाई से अनुपालन पर बल दिया।

मुख्य वक्ता गिरिधर जे. ज्ञानी (महानिदेशक, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया) ने “रीबिल्डिंग हेल्थ इंडिया स्ट्रक्चर फॉर विमेन” विषय पर अपने विचार रखते हुए भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार भारत में लगभग 40 लाख अस्पताल बेड होने चाहिए, जबकि वर्तमान उपलब्धता लगभग 21 लाख है। उन्होंने विभिन्न राज्यों में प्रति 1000 आबादी पर स्वास्थ्य संसाधनों की असमानता को गंभीर चिंता का विषय बताया।

प्रथम सत्र

इनविज़िबल थ्रेट्स – हाउ पॉल्यूशन, क्लाइमेट एंड केमिकल्स आर क्रिएटिंग ए साइलेंट विमेन हेल्थ एपिडेमिक

इस सत्र की अध्यक्षता सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के कुलाधिपति प्रो. जे. पी. लाल ने की। डॉ. शिप्रा धर श्रीवास्तव ने कहा कि ओपीडी में आने वाले लगभग 70 प्रतिशत मरीज महिलाएं होती हैं, जो प्रायः पारिवारिक प्राथमिकताओं के कारण अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करती हैं। डॉ. देवेश यादव ने जंक फूड और पैकेज्ड फूड को “समाज का खलनायक” बताते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन नई स्वास्थ्य चुनौतियों को जन्म दे रहा है, जिनका प्रभाव महिलाओं पर अधिक गहराई से पड़ रहा है। डॉ. संजीव सिंह ने स्पष्ट किया कि सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन ही दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुधार की वास्तविक कुंजी है।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. जे. पी. लाल ने कहा—“यदि महिला बीमार पड़ती है, तो पूरा परिवार प्रभावित होता है।” उन्होंने प्रत्येक घर को “हरित घ” बनाने, प्लास्टिक के उपयोग को कम करने और जीवनशैली में पर्यावरण-सम्मत विकल्प अपनाने का आह्वान किया। वहीं पद्मश्री चंद्रशेखर ने प्राकृतिक खेती तथा खाद्य गुणवत्ता मानकों के कठोर पालन की आवश्यकता पर बल दिया।

द्वितीय सत्र

विमेन ऑन द फ्रंटलाइन – क्लाइमेट बर्डन, लाइवलीहुड स्ट्रेस एंड हेल्थ इनइक्वालिटी

इस सत्र की अध्यक्षता सुश्री उर्वशी मित्तल ने की। उन्होंने प्लास्टिक-मुक्त समाज की दिशा में ठोस, व्यावहारिक और सामुदायिक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले कदमों की आवश्यकता पर बल दिया।

मोनिका खरे ने कहा कि जलवायु संकट का सर्वाधिक दुष्प्रभाव ग्रामीण, वंचित और निम्न-आय वर्ग की महिलाओं पर पड़ता है; इसलिए किसी भी प्रभावी नीति-निर्माण में उनके अनुभवों, चुनौतियों और आवश्यकताओं को केंद्रीय स्थान दिया जाना चाहिए।

कनिका सिंघल ने महिलाओं को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय नीति-भागीदार के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता रेखांकित की।

सत्र के विशेषज्ञों ने एकमत से कहा कि प्रदूषण, रसायनों का अनियंत्रित उपयोग और जलवायु परिवर्तन मिलकर महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक “मौन महामारी” का रूप ले चुके हैं, जिसे अब नीतिगत, सामाजिक और संस्थागत गंभीरता के साथ संबोधित करना होगा।

तृतीय सत्र

ईएसजी फॉर हर – हाउ इंडस्ट्री कैन रिड्यूस पॉल्यूशन एंड ट्रांसफॉर्म विमेन हेल्थ

इस सत्र ने उद्योग जगत की भूमिका, उत्तरदायित्व और परिवर्तनकारी क्षमता पर एक अत्यंत सारगर्भित विमर्श प्रस्तुत किया। इस सत्र की चेयरपर्सन विनिता सेठी रहीं। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि ईएसजी (Environmental, Social & Governance) केवल अनुपालन का ढांचा नहीं, बल्कि उद्योग की नैतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता का मानक होना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि जब उद्योग अपने पर्यावरणीय निर्णयों, कार्यस्थल नीतियों, आपूर्ति-श्रृंखला दृष्टिकोण और सामुदायिक निवेश को महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा से जोड़ते हैं, तभी ESG वास्तव में “for Her” बनता है।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रदूषण में कमी, सुरक्षित कार्य-परिसर, उत्तरदायी उत्पादन और संवेदनशील कॉरपोरेट नीतियाँ—इन्हीं के समन्वय से महिला स्वास्थ्य पर स्थायी सकारात्मक प्रभाव डाला जा सकता है।

रमेश नायर ने कॉरपोरेट जगत से आह्वान किया कि ईएसजी मानकों को केवल अनुपालन का विषय न मानकर, उन्हें व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में अपनाया जाए।

मुदित कुमार सिंह (IFS) ने कहा कि ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर पूरक हैं, और दोनों के संतुलित समन्वय से ही जनस्वास्थ्य में वास्तविक सुधार संभव है।

डॉ. अंकुर मूतरेजा ने प्रदूषण के महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य तथा हार्मोनल संतुलन पर पड़ने वाले गहरे प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित किया। डॉ. संदीप ठाकर ने निवारक स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यावरणीय जवाबदेही को साथ लेकर चलने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि उद्योग–सरकार–समाज के त्रिपक्षीय सहयोग से ही महिला स्वास्थ्य में स्थायी और संरचनात्मक सुधार संभव है।

स्पष्ट संदेश और भविष्य की दिशा

शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0 ने एक स्पष्ट, प्रखर और राष्ट्रीय महत्व का संदेश दिया— यदि महिला स्वस्थ है, तो परिवार, समाज और राष्ट्र स्वस्थ हैं; और इस समूचे संतुलन के केंद्र में पर्यावरणीय सुरक्षा निहित है। यह राष्ट्रीय संवाद केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ, समान, संवेदनशील और टिकाऊ भविष्य के निर्माण का संकल्प बनकर उभरा।

कार्यक्रम में औरिक सेन गुप्ता, मृणाल कांत पाण्डेय, डॉ. प्रखर सिंह, नवीन श्रीवास्तव, बृजेश श्रीवास्तव, अनुराग, डॉ. मनीष गुप्ता तथा शोध छात्र रंजीत कुमार राय सहित लगभग 300 प्रतिभागियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

Created On :   19 March 2026 7:01 PM IST

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