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असुरों पर शोध, अमेरिका को 'महाभारत' पढ़ाएंगे नागपुर विश्व विद्यालय के प्रोफेसर

July 27th, 2017 16:21 IST
असुरों पर शोध, अमेरिका को 'महाभारत' पढ़ाएंगे नागपुर विश्व विद्यालय के प्रोफेसर

सौरभ खेकडे, नागपुर। महाभारत के कई किरदार अपनी अद्भुत कलाओं और गुणों के कारण आज भी याद किए जाते हैं। कई प्रसंगों को आज की परिस्थितियों में भी तार्किक माना जाता है। इन्हीं कारणों से भारत की इस पौराणिक गाथा का महत्व दुनियाभर के विश्वविद्यालय स्वीकार कर कर रहे हैं। हिंदू यूनिवर्सिटी ऑफ अमेरिका, ऑरलैंडो ने भी अपने यहां महाभारत की पढ़ाई शुरू करने का निर्णय लिया है। यूनिवर्सिटी अगले वर्ष से पोस्ट ग्रेजुएट इन हिंदुइज्म पाठ्यक्रम में "इंट्रोडक्शन टू महाभारत' चैप्टर शामिल करने जा रही है। पाठ्यक्रम को डिजाइन करने के लिए हिंदू यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवि खंगई का मार्गदर्शन लिया है। हिंदू यूनिवर्सिटी ने डॉ. खंगई को "इंट्रोडक्शन टू महाभारत' का पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी दी है। जनवरी 2016 से डॉ. खंगई पाठ्यक्रम तैयार करने में जुटे हैं। वे अधिकांश कार्य पूरा कर चुके हैं। आगामी अक्टूबर तक वे पाठ्यक्रम तैयार कर लेंगे। जून-2018 से हिंदू यूनिवर्सिटी में उनका तैयार किया गया पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा। डाॅ. खंगई स्वयं भी लेक्चर देंगे। 

अपने शोध में सामने लाए अनछुए पहलू
डॉ. खंगई ने वर्ष 2015 में महाभारत के एक ऐसे अनछुए पहलू को अपने शोध में सामने लाए, जो वाकई अचंभित करने वाले साबित हुये । यूजीसी की मंजूरी के बाद उन्होंने "महाभारत में असुर संस्कृति के प्रतिबंब' पर शोध पूरा किया। शोध के अनुसार महाभारत समेत अन्य पौराणिक गाथाओं में जगह-जगह असुरों, राक्षसों, नागों, किरीटों का जिक्र मिलता है। यह पौराणिक गाथा सिर्फ इतिहास का जस का तस वर्णन नहीं है, बल्कि समय के साथ इससे जुड़ने वाले लेखकों का प्रतिबंब भी महाभारत में दिखता है। इस शोध में असुरों के बेहतरीन गुणों की जानकारी दी गई है।

मायासुर ने पांडवों का महल तैयार किया था। उसके वास्तुशिल्प और निर्माण कौशल का लोहा माना जाता था। मायासुर द्वारा तैयार निर्माण कार्य की झलक मोहनजोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों में भी नजर आता है। इसी तरह खांडव वन के दहन के दौरान मायासुर ने अर्जुन से अपने प्राण की भिक्षा मांगी थी, बदले में मायासुर ने पांडवों के लिए भव्य सभागृह का निर्माण किया था।
महाभारत में कई राक्षस पांडवों के मददगार थे। मायासुर ने अपने सेवक राक्षसों की मदद से कई सारे भंडार पांडवों के लिए उपलब्ध कराए थे। यही नहीं सभागृह की रक्षा 8 हजार राक्षस करते थे।

तांबे की गदा
एक ओर जहां देवगणों के शस्त्र ज्यादा मॉर्डन व हाइटेक होते थे, असुर मुख्य रूप से पेड़ों व विशाल पत्थरों को शस्त्र बनाते। इस दौर में उपयोग की जाने वाली गदा तांबे की होती थी, क्योंकि उस दौर में लोहे का उपयाेग चलन में नहीं था।

शोध के मुताबिक बृहस्पति को देवों का और शुक्राचार्य को असुरों का गुरु बताया गया है। देवता जिन दानवों को मारते, शुक्राचार्य अपनी विद्या से उन्हें फिर जीवित कर देते। इस संजीवनी विद्या को सीखने के लिए बृहस्पति ने अपने पुत्र कच्छ को शुक्राचार्य से शिक्षा लेने भेजा था। शुक्राचार्य ने सब कुछ जानते हुए भी कच्छ को शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। इससे शुक्राचार्य की महानता प्रकट होती है।

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