लोकसभा चुनाव 2024: 27 सालों से लहरा रहा भाजपा का भगवा ध्वज, जेपी आंदोलन से है खास कनेक्शन, जानिए जबलपुर सीट का चुनावी इतिहास

27 सालों से लहरा रहा भाजपा का भगवा ध्वज, जेपी आंदोलन से है खास कनेक्शन, जानिए जबलपुर सीट का चुनावी इतिहास
  • अब तक 9 बार भाजपा, 7 बार कांग्रेस जीती
  • एक बार भारतीय लोकदल ने भी चुनाव जीता
  • 1957 में हुआ था पहला लोकसभा चुनाव

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी के नाम से फेमस जबलपुर लोकसभा सीट की गिनती राज्य की हॉटसीट में की जाती है। जबलपुर सीट खास इसलिए भी है कि यहां पश्चिम-मध्य रेलवे और बिजली बोर्ड का मुख्यालय मौजूद है। साथ ही यहां प्रदेश के हाई कोर्ट की मुख्य पीठ भी स्थित है। आजादी के बाद से यहां कुल 17 चुनाव और एक उप-चुनाव हुए। जिनमें 9 बार भाजपा, 7 बार कांग्रेस और एक बार भारतीय लोकदल ने चुनाव जीता। साल 1991 के बाद से कांग्रेस पार्टी ने यहां पर कोई चुनाव नहीं जीता है। पिछले लगभग 2 दशक से जबलपुर लोकसभा सीट पर भाजपा ने अपना दबदबा बनाया हुआ है। पिछले चुनाव में यहां से राकेश सिंह ने चुनाव जीता था। साल 2023 का मप्र विधानसभा चुनाव जीतने के बाद राकेश सिंह ने सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद दिसंबर 2023 से जबलपुर लोकसभा सीट खाली है।

जबलपुर लोकसभा सीट का चुनावी इतिहास

आजादी के 10 साल बाद 1957 में जबलपुर लोकसभा सीट के गठन के बाद यहां पहला लोकसभा चुनाव हुआ था। पहले चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार सेठ गोविंददास दीवान बहादुर ने जीत दर्ज की थी।

साल 1962 में भी गोविंददास ने अपनी सांसदी बरकरार रखते हुए कांग्रेस को विजयी बनाया। गोविंददास की जीत का सिलसिला अगले दो लोकसभा चुनाव साल 1967 और 1971 तक जारी रहा। आपातकाल के बाद साल 1977 के लोकसभा चुनाव हुए। आपातकाल के दुष्परिणामों के कारण कांग्रेस पार्टी में भारी विरोध हुआ। नतीजतन भारतीय लोकदल ने जबलपुर सीट पर एंट्री मारी। तब लोकदल के उम्मीदवार शरद यादव ने चुनाव जीता था। हालांकि, अगले ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने वापसी कर ली और मुंदर शर्मा निर्वाचित हुए।

साल 1980 के चुनाव के दो साल बाद ही साल 1982 में उप-चुनाव हुए। जिनमें भाजपा की एंट्री हुई और बाबूराव परांजपे सांसद बने। दो साल बाद 1984 में फिर से लोकसभा के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस की वापसी हुई और अजय नारायण मुशरान निर्वाचित हुए। साल 1989 के चुनाव में जबलपुर सीट से भाजपा ने दोबारा वापसी की और बाबूराव परांजपे सांसद बने। साल 1991 में कांग्रेस वापस सत्ता में आई और श्रवण कुमार पटेल सांसद बने। यह आखिरी बार था जब जबलपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस पार्टी को जीत मिली थी। इसके बाद बाबूराव परांजपे ने जबलपुर सीट पर भाजपा को फिर विजयी बनाया। यह चुनाव जीतने के बाद जबलपुर संसदीय क्षेत्र पर भाजपा की पकड़ लगातार मजबूत होती गई और कांग्रेस लगातार यहां पिछड़ती गई। 1998 में बाबूराव परांजपे ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जबलपुर से आखिरी बार जीत दर्ज की थी। साल 1999 में भाजपा ने चुनाव जीता और जयश्री बैनर्जी सासंद बनी। साल 2004 में भाजपा को जीत मिली और राकेश सिंह सांसद बने। राकेश सिंह ने जबलपुर लोकसभा सीट से अगले तीन आम चुनाव साल 2009, 2014 और 2019 में भाजपा का परचम लहराया।

पिछले लोकसभा चुनाव का नतीजा?

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को जीत मिली थी। भाजपा नेता राकेश सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार विवेक तनखा को 4 लाख 54 हजार 744 वोटों के भारी अंतर से हराया था। भाजपा को तब कुल 8 लाख 26 हजार 454 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस पार्टी को कुल 3 लाख 71 हजार 562 वोट मिले थे।

1974 तक रहा कांग्रेस का दबदबा

जबलपुर लोकसभा सीट में पहला आम चुनाव संपन्न होने के बाद कांग्रेस का दबदबा था। साल 1982 के उप-चुनाव में पहली बार जबलपुर में भाजपा का कमल खिला था। लेकिन दो साल बाद 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस ने जबलपुर सीट पर वापसी कर कब्जा कर लिया। साल 1989 के चुनाव में दोबारा यह सीट भाजपा के खाते में चली गई। साल 1991 में कांग्रेस ने फिर से वापसी कर ली। हालांकि, यह अंतिम बार था जब कांग्रेस पार्टी ने जबलपुर सीट पर चुनाव जीता था। 1991 का चुनाव जीतने के बाद से कांग्रेस आज तक इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई।

जेपी आंदोलन से नाता

जबलपुर संसदीय सीट का इतिहास भी काफी रोचक है। आपातकाल के दौर में शरद यादव जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन में शामिल हुए थे। तब कांग्रेस पार्टी को जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था और 1977 के चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर भी बन चुकी थी। जबलपुर सीट पर सेठ गोविंद दास के निधन के बाद उप-चुनाव हुए थे। जिनमें शरद यादव ने लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के रवि मोहन को हराकर सभी को चौंका दिया था। ऐसा माना जाता है कि शरद यादव को टिकट देने की पहल जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेई ने की थी। असल में तब शरद यादव को हलधर किसान चुनाव चिन्ह मिला था। उस चुनाव में प्रचार के दौरान शरद यादव के पक्ष में एक नारे ने पूरा माहौल जनसंघ के पक्ष में बना दिया था। 'लल्लू पर न जगधर पर, मुहर लगेगी हलधर पर' इस नारे ने ऐसा जोर पकड़ा कि कांग्रेस पार्टी की उसके गढ़ में बुनियाद हिल गई। नतीजतन 1977 के चुनावों में शरद यादव ने जबलपुर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी जगदीश नारायण अवस्थी को भारी वोटों हराकर जीत हासिल की थी।

बाबूराव ने जबलपुर में रखी भाजपा की नींव

भारतीय जनता पार्टी की नींव रखने वाले कद्दावर नेताओं में बाबूराव परांजपे का नाम भी शामिल है। उन्होंने जबलपुर से तीन बार सांसदी का चुनाव जीता। उन्होंने पहली बार साल 1989 के आम चुनाव में भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर कांग्रेस के अजय नारायण मुशरान को हराया था। उस दौर में जबलपुर में बाबूराव की प्रसिद्धि इतनी थी कि शहर के प्रमुख बाजारों में लोग खुलेआम कहा करते थे, 'बाबूराव जी नहीं हम लड़ रहे हैं चुनाव'। बाबूराव के नजदीकी रहे भाजपा नेता विनोद मिश्रा बताते हैं कि उस समय भाजपा प्रमुख विपक्षी दल था और आंदोलन खूब हुआ करते थे। तब गिरिराज किशोर, मनोहर सहस्त्रबुद्धे, अजय बिश्नोई जैसे नेता बाबूराव परांजपे के साथ सक्रियता से इन आंदोलनों में हिस्सा लिया करते थे।

दो दशक तक राकेश सिंह हैं सासंद

जबलपुर लोकसभा सीट से भाजपा के वर्तमान सासंद दो दशक से सासंद हैं। उन्होंने साल 2004 में पहला चुनाव लड़ा था। तब उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी विश्वनाथ दुबे को शिकस्त दी थी। राकेश सिंह ने लगातार अगले तीन आम चुनाव साल 2009, 2014 और 2019 जीते और सांसद बने। हाल ही में राकेश सिंह को मध्य प्रदेश की डॉ मोहन यादव सरकार में लोक निर्माण मंत्री भी बनाया गया है।

Created On :   28 Feb 2024 1:00 PM GMT

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