बॉम्बे हाई कोर्ट: यदि कर्मचारी समान कार्य कर रहे हैं, तो उन्हें समान वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता

यदि कर्मचारी समान कार्य कर रहे हैं, तो उन्हें समान वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता
  • ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के आधार पर वेतन देने का दिया निर्देश
  • अदालत ने वसई विरार महानगरपालिका को 28 कर्मचारियों को लेकर फैसला

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने वसई-विरार महानगरपालिका (वीवीएमसी) को 28 कर्मचारियों की याचिका पर अपने फैसले में कहा कि यदि कर्मचारी समान कार्य कर रहे हैं, तो उन्हें समान वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता, चाहे उनकी नियुक्ति किसी भी तरीके से हुई हो। ‘समान काम के लिए समान वेतन’ एक मौलिक अधिकार जैसा प्रभाव रखने वाला सिद्धांत है। प्रशासनिक कारणों या नियुक्ति की तकनीकी खामियों के आधार पर कर्मचारियों के साथ वेतन में भेदभाव अवैध है। अदालत ने वीवीएमसी को 2009 से कार्यरत अपने 28 कर्मचारियों (सफाई कर्मचारी, क्लर्क, चपरासी) को ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के आधार पर वेतन देने का आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे की पीठ ने गजानन नामदेव ओगे समेत 28 अन्य कर्मचारियों की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘समान काम के लिए समान वेतन’ एक संवैधानिक सिद्धांत है। याचिकाकर्ता 2009 से लगातार निगम में कार्य कर रहे हैं। उनका कार्य नियमित कर्मचारियों के समान है। नगर निगम यह साबित नहीं कर सका कि उनका (कर्मचारियों) कार्य अलग है। इसलिए केवल यह कहना कि उनकी नियुक्ति पहले ग्राम पंचायत में हुई थी, भेदभाव को सही ठहराने का आधार नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं को मौजूदा वेतनमान के अनुसार वेतन दिया जाए। उन्हें सभी लाभ (भत्ते, बकाया राशि, सातवें वेतन आयोग के लाभ) दिए जाएं। इन कर्मचारियों को बकाया वेतन की गणना कर 4 सप्ताह के अंदर भुगतान किया जाए। साथ में उस पर 8 फीसदी ब्याज भी दिया जाए। आदेश का पालन न करने पर इसे अवमानना माना जाएगा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई कि वसई-विरार महानगरपालिका (वीवीएमसी) का गठन 3 जुलाई 2009 को चार म्युनिसिपल काउंसिलों और 53 ग्राम पंचायतों के विलय के परिणामस्वरूप हुआ था। वे शुरू में ग्राम पंचायत के कर्मचारी थे, जिन्हें विभिन्न पदों (सफाई कामगार, क्लर्क, चपरासी) पर नियुक्त किया गया था। बाद में इन ग्राम पंचायतों का विलय उस नगर निगम में कर दिया गया, जिसका गठन राज्य सरकार द्वारा महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम 1949 की धारा 3 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 3 जुलाई 2009 से प्रभावी रूप से किया गया था। उन्होंने अपनी याचिकाओं में दावा किया कि उन्हें नगर निगम की ओर से ‘समान काम के लिए समान वेतन’ नहीं दिया जा रहा। वे समान कार्य करने के बावजूद नियमित कर्मचारियों से कम वेतन पा रहे हैं। इसलिए ‘समान काम के लिए समान वेतन’ सिद्धांत के आधार पर समान वेतन व 7वें वेतन आयोग के लाभ दिए जाएं।

वीवीएमसी की ओर से कर्मचारियों की याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति ग्राम पंचायत में लंपसम आधार पर हुई थी। भर्ती प्रक्रिया नियमों के अनुसार नहीं हुई। इसलिए उन्हें नियमित वेतनमान देना या नियमित करना संभव नहीं। राज्य सरकार ने भी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। पीठ ने कहा कि हम नगर निगम की ओर से दिए गए इस तर्क को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हैं कि याचिकाकर्ताओं की "समान काम के लिए समान वेतन’ और वेतनमान में समानता की मांग पर इस आधार पर विचार नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ताओं की मूल नियुक्ति ग्राम पंचायतों द्वारा की गई थी।

Created On :   22 March 2026 8:24 PM IST

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