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बॉम्बे हाई कोर्ट: केवल कबूलनामे के आधार पर व्यक्ति को सजा नहीं दी जा सकती, आजीवन कारावास से किया बारी

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2 साल की बच्ची के अपहरण कर हत्या के मामले में दोषी व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा से बरी करते हुए कहा कि केवल कबूलनामे के आधार पर व्यक्ति को सजा नहीं दी जा सकती है। अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध संदेह से परे आरोप साबित नहीं कर पाया। उसके साक्ष्य अधूरे, अविश्वसनीय एवं कानूनन अस्वीकार्य थे। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया और उसे सभी दोष से बरी कर दिया गया।
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति श्याम सी. चांडक की पीठ ने 50 वर्षीय शांतिलाल दशरथ गायकवाड़ की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दो अलग-अलग और विरोधाभासी कबूलनामे दिए थे। एक कबूलनामे पर आरोपी के हस्ताक्षर ही नहीं थे। केवल कबूलनामे के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती है। मृत बच्ची का शव भी बरामद नहीं हुआ। अभियोजन पक्ष के पास हत्या सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं। कोई भी गवाह भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि उनके सबूत तब सामने आए, जब जांच का पहला दौर पूरी तरह से असफल हो चुका था। गवाहों की गवाहियों और याचिकाकर्ता के इकबालिया बयानों को एक साथ पढ़ने से यह पता चलता है कि जब याचिकाकर्ता पीड़ित मिली, तो वह उसे कुछ खिलाना चाहता था। इसी दौरान उसने ठाणे रेलवे स्टेशन के दो बार प्लेटफॉर्म नंबर 10 पर पुलिस से संपर्क किया, क्योंकि वह पीड़ित के बारे में रेलवे पुलिस को रिपोर्ट करना चाहता था।
पीठ ने पाया कि जिस पुलिस से याचिकाकर्ता ने संपर्क किया था, उन्होंने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उसके बाद पूरे दिन पीड़िता याचिकाकर्ता के साथ ही रही। अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार पिछले ढाई साल से याचिकाकर्ता ठाणे रेलवे स्टेशन के फुटपाथ पर रह रहा था। हालांकि गवाह ने यह बयान नहीं दिया है कि ठाणे रेलवे स्टेशन पर रहने से पहले उसने याचिकाकर्ता को आखिरी बार कब देखा था। इसलिए गवाहों द्वारा याचिकाकर्ता की पहचान तस्वीरों पर आधारित थी। वह तस्वीरें कानून के अनुसार साबित नहीं की गई थी और न ही वे इतनी साफ थीं कि उनमें दिख रहे कथित अपराधी और पीड़ित की पहचान की जा सके। अभियोजन अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित नहीं की गई है और वास्तव में यह अधूरी है। न्यायाधीश अभियोजन के सबूतों को सही परिप्रेक्ष्य में और कानून के अनुसार समझने में विफल रहे। याचिकाकर्ता (आरोपी) को ट्रायल कोर्ट ने 9 जुलाई 2024 के आईपीसी की धाराओं 363 (अपहरण), 302 (हत्या), 201 (सबूत नष्ट करना) में दोषी ठहराया था। पीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। यह मामला एक लगभग 2 साल की बच्ची के अपहरण और हत्या से संबंधित था। ठाणे के मानपाड़ा स्थित जी. एल. कॉलोनी में रहने वाले शंकर जगदेव सिंह एक सोसाइटी में वाटर प्रूफिंग का काम करता था। उसकी बच्ची 20 अगस्त 2013 को शाम 6 बजे अपने घर के सामने खेल रही थी और वहां से गायब हो गई थी।
Created On :   26 March 2026 10:22 PM IST








