भरोसा सेल: 170 बुजुर्गों ने किया केस - संपत्ति विवाद और अनदेखी बड़ी वजह, ढाई साल में पहुंचे हैरान करने वाले मामले

170 बुजुर्गों ने किया केस - संपत्ति विवाद और अनदेखी बड़ी वजह, ढाई साल में पहुंचे हैरान करने वाले मामले
  • बुढ़ापे के पायदान पर पहुंचते ही उन्हीं माता-पिता को बच्चों ने बेसहारा छोड़ दिया
  • आंकड़े बताते हैं कि बुजुर्गों के उत्पीड़न के मामले में महाराष्ट्र पूरे देश में दूसरे स्थान पर है
  • राज्य की सीमा से सटा मध्य प्रदेश इस सूची में पहले नंबर पर है

Nagpur News. प्रशांत बहादुरे। जिन्होंने कभी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, बुढ़ापे के पायदान पर पहुंचते ही उन्हीं माता-पिता को बच्चों ने बेसहारा छोड़ दिया। आधुनिकता की दौड़ में बिखरते संयुक्त परिवारों और दम तोड़ते नैतिक मूल्यों की यह कड़वी सच्चाई है। आंकड़े बताते हैं कि बुजुर्गों के उत्पीड़न के मामले में महाराष्ट्र पूरे देश में दूसरे स्थान पर है, जबकि राज्य की सीमा से सटा मध्य प्रदेश इस सूची में पहले नंबर पर है। स्थानीय स्तर पर नागपुर पुलिस का ‘भरोसा सेल' आज ऐसे बुजुर्गों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण बना हुआ है, जहां हर महीने दर्जनों वरिष्ठ नागरिक रोते हुए अपने ही बच्चों के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। पुलिस के भरोसा सेल में पिछले ढाई वर्षों के भीतर कुल 170 बुजुर्गों ने अपनों के खिलाफ केस दर्ज कराया है।

आंकड़ा इस प्रकार है...

  • 2024 में 83 शिकायतें
  • 2025 में 53 शिकायतें
  • 2026 (शुरुआती 6 माह) में 34 शिकायतें
  • कुल (ढाई वर्ष में) : 170 मामले

सीनियर सिटीजन के पास हैं ये अधिकार

वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और उनके सम्मान को बनाए रखने के लिए देश में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' लागू है। बच्चों के लिए अपने बुजुर्ग माता-पिता को भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। यदि संपत्ति अपने नाम करवाने के बाद बच्चे माता-पिता को प्रताड़ित करते हैं, तो बुजुर्ग अपनी दी हुई संपत्ति वापस लेने का कानूनी अधिकार रखते हैं। बुजुर्गों को प्रताड़ित करना या घर से निकालना एक दंडनीय अपराध है, जिसमें जेल और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।

क्यों जानी दुश्मन 4 गंभीर तथ्य

  • भरोसा सेल और जिला प्रशासन के पास पहुंचने वाले मामलों की काउंसलिंग के दौरान उत्पीड़न के कुछ मुख्य और बेहद चौंकाने वाले कारण सामने आए हैं।
  • बच्चे पहले माता-पिता के नाम पर मौजूद घर, जमीन, या नकदी को बहला-फुसलाकर अपने नाम करवा लेते हैं, और काम निकलते ही उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर देते हैं।
  • बुजुर्गों की दवाइयों, खाने-पीने और कपड़ों जैसी बेहद जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने से साफ मना कर देना।
  • बहू-बेटे, बेटियां या दामाद द्वारा बात-बात पर ताने कसना, अपमानित करना, गाली-गलौज करना और अकेलेपन की गर्त में धकेल देना।
  • सब कुछ होते हुए भी कई बुजुर्गों को उनके ही आशियाने से बाहर निकाल दिया जा रहा है, जिससे वे एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं।

बोले-बच्चों ने प्रताड़ना की हद कर दी

केस - 1...जी. रमेश (बदला नाम) रिटायर हो चुके हैं। पत्नी के देहांत के बाद सारी जमा-पूंजी और मकान इकलौते बेटे के नाम कर दिया। शुरुआत में सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें बोझ समझा जाने लगा। समय पर खाना और दवाइयां नहीं दी जातीं। बेटा और बहू बात तक नहीं करते। घर के एक छोटे से कोने में रहने पर मजबूर हैं। बीमारी या जरूरतों का जिक्र करते हैं, तो मानसिक प्रताड़ित किया जाता है। वे चाहकर भी पुलिस या प्रशासन के पास नहीं जाते। उन्हें डर है कि इससे बेटे-बहू की बदनामी होगी और लोग कहेंगे कि "कैसी परवरिश दी थी।’

संपत्ति के लिए शोषण

केस - 2...सुशीला बाई (बदला नाम) के पति के नाम पुश्तैनी जमीन थी। पति की मृत्यु के बाद बेटे और बहू की नजर उस पर है। दबाव बना रहे हैं कि वह उस जमीन को उनके नाम ट्रांसफर कर दे। कागजात पर दस्तखत न करने के कारण आए दिन बहाने से धक्का-मुक्की और मारपीट की जाती है। अक्सर कमरे में बंद कर दिया जाता है, रिश्तेदारों से मिलने से रोका जाता है। सुशीला बाई थाने और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने से डरती हैं। उनका कहना है कि "अगर बेटा-बहू को जेल हो गई, तो इस बुढ़ापे में मेरा सहारा कौन बनेगा?’ वह जुल्म को चुपचाप सह रही हैं।


Created On :   13 July 2026 4:33 PM IST

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