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वर्ल्ड ऑटिज़्म अवेयरनेस डे: ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि विकासात्मक भिन्नता है, डॉक्टर निराली लोहिया ने अभिभावकों को दिए खास टिप्स

Nagpur News. वर्ल्ड ऑटिज़्म अवेयरनेस डे हर साल 2 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य डिसऑर्डर के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाना और मिथकों को दूर कर प्रभावित बच्चों को समाज में समान अवसर दिलाना है। यह दिन हमें यह समझाने का संदेश देता है कि ऑटिज़्म कोई कमी नहीं, बल्कि सोचने और समझने का एक अलग तरीका है। साथ ही, यह परिवारों, शिक्षकों और समाज को प्रेरित करता है कि वे ऐसे बच्चों और व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील, सहयोगी और समावेशी व्यवहार अपनाएं, ताकि वे भी अपनी पूरी क्षमता के साथ जीवन जी सकें।
ऑटिज़्म पीड़ित बच्चों पर खासतौर से काम कर रहीं डॉक्टर निराली लोहिया का कहना है कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार एक न्यूरो-विकासात्मक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति के व्यवहार, संचार और सामाजिक संबंधों में भिन्नताएं देखी जाती हैं। हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग स्तर पर प्रकट होते हैं, इसलिए इसे “स्पेक्ट्रम” कहा जाता है। हम सभी को यह समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता है कि ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि सोचने और दुनिया को देखने का एक अलग तरीका है। ऐसे बच्चों और व्यक्तियों को सहानुभूति, समर्थन और समावेशी वातावरण देकर हम उनके आत्मविश्वास और क्षमताओं को बढ़ावा दे सकते हैं, ताकि वे समाज में अपनी पहचान बना सकें।
विकलांगता अधिकारों के अधिवक्ता अरुणकृष्ण मूर्ती का कहना है कि भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है—और इसमें न्यूरोडायवर्सिटी भी शामिल है।
ऑटिज़्म के प्रमुख संकेत
1. सामाजिक और संचार संबंधी चुनौतियां
- सामाजिक व्यवहार में कमी
- भाषा का सीमित उपयोग या संदर्भ के अनुसार उपयोग न होना
- आँखों में आँख डालकर बात करने में कठिनाई
- अपने विचारों या भावनाओं को व्यक्त न कर पाना
- “बाय”, “हाय-फाइव” जैसे हाव-भाव का कम उपयोग
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नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना
- दूसरों के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई या पर्सनल स्पेस की समझ का अभाव
- यदि बच्चा बोल नहीं पाता, तो वह अपनी पसंद की चीज पाने के लिए इशारा करने के बजाय माता-पिता का हाथ खींचकर ले जा सकता है।
- यदि बच्चा बोलता है, तो वह केवल ज़रूरत के शब्द (जैसे “दूध”) या मोबाइल/टीवी से सीखे शब्द (जैसे “यम्मी”, “नंबर”, “अल्फाबेट”) बोल सकता है, लेकिन “मम्मा आओ”, “डैडी कहाँ?” जैसे सामाजिक वाक्यों का उपयोग नहीं कर पाता।
- यह स्थिति केवल स्पीच डिले नहीं, बल्कि सोशल कम्युनिकेशन डिले हो सकती है।
2. व्यवहार और रुचियों में विशेषताएं
- एक ही बात या शब्दों को बार-बार दोहराना (Echolalia)
- एक ही पैटर्न या तरीके से खेलना
- असामान्य शारीरिक हरकतें (जैसे हाथ फड़फड़ाना, गोल-गोल घूमना)
- खिलौनों को लाइन में लगाना या केवल उनके हिस्सों (जैसे पहिए) से खेलना
- दिनचर्या में बदलाव होने पर परेशान होना
- एक जैसी चीज़ों की बार-बार आवश्यकता (जैसे एक ही रास्ता, कपड़े, खाना)
- कुछ वस्तुओं या चीज़ों से अत्यधिक लगाव
3. संवेदी (Sensory) संवेदनशीलता
- आवाज़, रोशनी, स्पर्श, गंध या भोजन की बनावट के प्रति अत्यधिक या बहुत कम प्रतिक्रिया
- (जैसे कुकर/मिक्सर की आवाज़ से असहज होना)
प्रभाव और कारण
ऑटिज़्म बच्चे के विकास (Developmental milestones), व्यवहार और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसके कारणों में अनुवांशिक (Genetic) और पर्यावरणीय (Environmental) दोनों कारक शामिल हो सकते हैं।
ध्यान दें:
अत्यधिक स्क्रीन टाइम (टीवी/मोबाइल) और वास्तविक जीवन के सीमित अनुभव भी ऐसे व्यवहार पैदा कर सकते हैं, जो ऑटिज़्म जैसे लगते हैं। इसलिए इंटरनेट के बजाय विश्वसनीय बाल रोग विशेषज्ञ या विकासात्मक बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना ज़रूरी है।
क्या करें और क्या न करें
✔ क्या करें
- नियमित दिनचर्या बनाएं
- बच्चे के साथ अधिक से अधिक सामाजिक संवाद करें
- सरल और स्पष्ट भाषा का उपयोग करें
- छोटे-छोटे प्रयासों और उपलब्धियों पर बच्चे को प्रोत्साहित करें
- धैर्य और निरंतरता बनाए रखें
- बच्चे की ताकत को पहचानकर उस पर काम करें
विशेषज्ञ (बाल रोग विशेषज्ञ/विकासात्मक विशेषज्ञ) से मार्गदर्शन लें
✘ क्या न करें
- बच्चे की तुलना दूसरों से न करें
- आँख से आँख मिलाने के लिए मजबूर न करें
- केवल इंटरनेट/गूगल पर निर्भर न रहें
- छोटे बच्चों को अत्यधिक स्क्रीन (टीवी/मोबाइल) न दें
- तुरंत परिणाम की अपेक्षा न रखें
- परिवार को समाज से अलग न करें
कब लें विशेषज्ञ की मदद?
- 6 महीने तक: मुस्कान या चेहरे के भाव बहुत कम
- 9 महीने तक: आवाज़ और भावों का आदान-प्रदान नहीं
- 12 महीने तक: नाम पुकारने या इशारों पर प्रतिक्रिया कम
- 18 महीने तक: शब्द न बोलना या रुचि साझा न करना
- 2 साल तक: दो शब्दों के वाक्य न बनाना
- किसी भी उम्र में: पहले सीखे कौशल (milestones) भूल जाना
- बच्चों को स्वतंत्र बनाने की दिशा
ऑटिज़्म से प्रभावित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन सही मार्गदर्शन, धैर्य और सहयोग से यह संभव है।
“नॉर्मल” और “एबनॉर्मल” जैसे शब्दों से बचें
- हर बच्चा अलग होता है—जैसे एक जूता सभी को फिट नहीं होता
- सकारात्मक और स्वीकारात्मक वातावरण बनाएं
- थेरेपी में सक्रिय रूप से भाग लें
- छोटे कदमों से शुरुआत करें
- व्यवहार के ट्रिगर्स को पहचानें
- बच्चे को अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों के लिए तैयार करें
डॉक्टर निराली लोहिया का कहना है कि बिना विशेषज्ञ सलाह के दवाइयां, विशेष आहार या सर्जिकल उपचार अपनाना नुकसानदायक हो सकता है।
एक महत्वपूर्ण संदेश
कोई भी खिलौना, मोबाइल या टीवी माता-पिता की जगह नहीं ले सकता। बच्चे के विकास में परिवार और समाज दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समय पर सही मार्गदर्शन पाने वाले कई बच्चे सामान्य स्कूलों में पढ़ते हैं और अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
ऑटिज़्म से प्रभावित बच्चों का सीखने और समझने का तरीका अलग होता है, हमें उन्हें समझने, स्वीकारने और समाज में शामिल करने की आवश्यकता है।
अंत में एक बात ध्यान रखिए ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक विकासात्मक भिन्नता है। सही समझ, समय पर हस्तक्षेप, और प्रेमपूर्ण सहयोग से हम इन बच्चों को एक स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।
Created On :   1 April 2026 7:31 PM IST











