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Nagpur News: कमीशन देकर लिया मरीजों का डेटा, डॉक्टर को झटका

Nagpur News बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने मरीजों का डेटा अवैध रूप से साझा करने के मामले में एक डॉक्टर द्वारा दायर एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने पाया कि डॉक्टर का कार्य केवल पेशेवर नियमों का उल्लंघन ही नहीं था, बल्कि उसका इरादा शुरू से ही गलत था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चिकित्सा पेशे में सहयोगियों के प्रति सम्मान और पेशेवर आचार-संहिता का पालन अनिवार्य है, और याचिकाकर्ता डॉक्टर ने इस आचार-संहिता का उल्लंघन किया। यह फैसला न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके की पीठ ने डॉक्टर उत्पल बांधेकर द्वारा दायर याचिका पर दिया। यह प्रकरण धंतोली पुलिस स्टेशन में वर्ष 2022 में दर्ज अपराध से संबंधित है, जिसमें डॉक्टर बांधेकर के विरुद्ध धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आईटी एक्ट के तहत आरोप लगाए गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामला नागपुर के न्यू रूट्स हेयर ट्रांसप्लांट क्लिनिक के संचालक डॉ. निलेश पुंड की शिकायत से शुरू हुआ। डॉ. पुंड ने अपनी रिसेप्शनिस्ट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी कि वह अस्पताल के मरीजों का गोपनीय डेटा अवैध रूप से साझा कर रही थी। जांच के दौरान पता चला कि रिसेप्शनिस्ट महिला, याचिकाकर्ता डॉ. उत्पल बांधेकर के संपर्क में थी और वाट्सएप व ई-मेल के जरिए मरीजों की जानकारी उन्हें भेज रही थी। इसके बदले में डॉ. उत्पल उसे कमीशन दे रहे थे, जो रिसेप्शनिस्ट के पति के खाते में जमा की जाती थी।
कोर्ट में दी गई दलीलें
डॉ. उत्पल के वकील ने तर्क दिया कि यह केवल चिकित्सा जगत के नियमों का उल्लंघन हो सकता है, कोई आपराधिक अपराध नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि आईपीसी की धारा 408 (नौकर द्वारा विश्वासघात) उन पर लागू नहीं होती, क्योंकि वे डॉ. पुंड के कर्मचारी नहीं थे। वहीं, सरकारी वकील और डॉ. पुंड के वकील ने व्हाट्सएप चैट और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) पेश किए। उन्होंने बताया कि डॉ. उत्पल लगातार रिसेप्शनिस्ट के संपर्क में थे और उन्होंने जान-बूझकर मरीजों को अपने क्लिनिक की ओर मोड़कर डॉ. पुंड को आर्थिक नुकसान पहुंचाया और खुद लाभ कमाया।
कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हालांकि डॉ. बांधेकर कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उन पर धारा 408 नहीं लगती, लेकिन उनके खिलाफ धोखाधड़ी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत पर्याप्त सबूत हैं। अदालत ने यह भी कहा कि, -"वाट्सएप चैट से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता डॉक्टर की मंशा शुरुआत से ही खराब थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्टरों के बीच पेशेवर नैतिकता का पालन जरूरी है और किसी दूसरे डॉक्टर के मरीजों को अनुचित तरीके से आकर्षित करना गलत है। अंततः अदालत ने कहा कि इस मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं और यह मामला ट्रायल के योग्य है। इसलिए, एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।
इसे जानना जरूरी है...
पहचान का संकट खड़ा हो सकता है
डेटा ही आज की दुनिया की सबसे कीमती संपत्ति है। यह वह ‘मुद्रा’ है, जो मौजूदा परिदृश्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था को संचालित कर रही है और इसे नियंत्रित करने वाला ही भविष्य का विजेता है। इसलिए इसे चुराने की होड़ सी मची है, लेकिन जब किसी व्यक्ति का डेटा चोरी होता है, तो वह केवल जानकारी का नुकसान नहीं, बल्कि उसकी पहचान का संकट होता है। बड़ी टेक कंपनियां और साइबर अपराधी तक यह पलक झपकते ही पहुंच सकता है। हैकर्स के लिए यह फिरौती और ब्लैक मार्केटिंग का साधन है, तो ‘प्रतिद्वंद्वी’ के लिए यह रणनीतिक बढ़त हासिल करने का हथियार है।
अपराध और कानूनी दंड
बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए भारत सरकार ने ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023' लागू किया है। इसके तहत कड़े प्रावधान किए गए हैं-
भारी जुर्माना : यदि कोई कंपनी या संगठन डेटा की सुरक्षा में विफल रहता है, तो उस पर 250 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
आईटी अधिनियम की धाराएं : भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 (कंप्यूटर संबंधी अपराध) और 66सी (पहचान की चोरी) के तहत 3 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
शिकायत निवारण : कानून अब डेटा मालिकों को यह अधिकार देता है कि वे अपनी जानकारी के उपयोग पर सवाल उठा सकें और उल्लंघन की स्थिति में मुआवजे की मांग कर सकें।
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Created On :   2 April 2026 12:42 PM IST












