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बच्चों का रखें ख्याल: महाराष्ट्र सहित देशभर में तेजी से बढ़ रहे हैं टाइप 1 डायबिटीज के बच्चे, डॉ. निखिल लोहिया ने सुरक्षित जीवन के लिए बताएं खास टिप्स

Nagpur News. तजिन्दर सिंह। उपराजधानी में टाइप 1 डायबिटीज को लेकर समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। “मधुर पाठशाला” के बैनर तले इस बीमारी से जूझ रहे बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाने के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे अपने बच्चों को सही मात्रा में इंसुलिन देने के साथ उन्हें सामान्य और संतुलित जीवन जीने में सहयोग कर सकें।
बाल रोग एंडोक्रिनोलॉजिस्ट विशेषज्ञ डॉ. निखिल लोहिया के अनुसार, इंसुलिन की कमी के कारण शरीर रक्त में मौजूद शर्करा को ऊर्जा में परिवर्तित नहीं कर पाता, जिससे स्थिति गंभीर और कई बार जानलेवा भी हो सकती है। ऐसे में भोजन से पहले शुगर की नियमित जांच और निर्धारित मात्रा में इंसुलिन देना अत्यंत आवश्यक होता है। आमतौर पर मरीज की जरूरत के अनुसार दिन में तीन से चार बार इंसुलिन लेना पड़ता है। वहीं, इंसुलिन को लेकर नई रिसर्च भी लगातार जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में उपचार और बेहतर होगा। वर्तमान में हफ्ते में एक बार लगने वाली इंसुलिन, अधिक स्थिर और सुरक्षित विकल्पों तथा कम दुष्प्रभाव वाली नई दवाओं पर काम चल रहा है, जो भविष्य में मरीजों के जीवन को और सहज व सुरक्षित बना सकती हैं।
विशेषज्ञ डॉ. निखिल लोहिया का कहना है कि उन बच्चों पर खास ध्यान देने की जरूरत है, जिनके परिवार में पहले से डायबिटीज है, जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है और बार-बार बीमार पड़ने वाले बच्चे के स्वास्थ्य को साधारण तौर से नहीं लिया जा सकता।
महराष्ट्र में भी टाइप 1 डायबिटीज के बच्चों की संख्या बढ़ रही है। भारत, जिसे अब “दुनिया की डायबिटीज राजधानी” कहा जाने लगा है, यहां डायबिटीज केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों को भी तेजी से प्रभावित कर रही है। हालिया शोध और आंकड़ों के अनुसार, भारत में बच्चों के बीच टाइप 1 डायबिटीज (T1D) के मामलों में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है।
चिंताजनक आंकड़े: दुनिया भर में दूसरे स्थान पर है भारत
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (IDF) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14 वर्ष से कम उम्र के लगभग 95,600 बच्चे टाइप 1 डायबिटीज से ग्रस्त हैं। हर वर्ष करीब 15,900 नए मामले सामने आते हैं। इन आंकड़ों के साथ भारत वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है।
क्या है टाइप 1 डायबिटीज?
टाइप 2 डायबिटीज के विपरीत, जो मुख्यतः जीवनशैली और खान-पान से जुड़ी होती है, टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून रोग है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय (Pancreas) की बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, जो इंसुलिन बनाती हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं मामले?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं
- जेनेटिक और पर्यावरणीय कारक: HLA जीन कॉम्प्लेक्स वाले बच्चों में जोखिम अधिक पाया गया है।
- वायरल संक्रमण: एंटरोवायरस और मम्प्स जैसे संक्रमण संभावित ट्रिगर माने जाते हैं।
- बदलती जीवनशैली: प्रदूषण, असंतुलित आहार और विटामिन-डी की कमी भी जोखिम बढ़ा सकती है।
- शुरुआती संकेतों को न करें नजरअंदाज
बाल रोग एंडोक्रिनोलॉजिस्ट विशेषज्ञ का कहना है कि निम्न लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिए
- अत्यधिक प्यास लगना (Polydipsia)
- बार-बार पेशाब आना (Polyuria)
- बिना कारण वजन कम होना
- अत्यधिक थकान और चिड़चिड़ापन
- इंसुलिन ही है एकमात्र उपचार
टाइप 1 डायबिटीज का प्रभावी और अनिवार्य उपचार इंसुलिन थेरेपी है। इंसुलिन को छोटी सुइयों के माध्यम से त्वचा के नीचे (सबक्यूटेनियस) इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है। इस रोग में प्रतिदिन कई बार इंसुलिन देना मानक उपचार माना जाता है। आहार और शारीरिक गतिविधि सहायक भूमिका निभाते हैं, लेकिन इंसुलिन का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि शरीर स्वयं इसका उत्पादन नहीं कर पाता।
जागरूकता और सहयोग है जरूरी
टाइप 1 डायबिटीज के साथ जीवन एक बच्चे और उसके परिवार के लिए 24 घंटे की चुनौती होती है। हालांकि, समय पर पहचान और आधुनिक तकनीकों—जैसे इंसुलिन पंप और कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (CGM)—की मदद से बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और समाज को मिलकर ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिससे किसी भी बच्चे को इलाज या दवाओं की कमी के कारण अपने भविष्य से समझौता न करना पड़े।
कुछ बिंदुओं को अच्छे से समझें
1. संतुलित और पोषक आहार
- बच्चों को पौष्टिक भोजन दें (फल, सब्जियां, दाल, दूध)
- जंक फूड और ज्यादा शुगर वाले खाद्य पदार्थ कम करें
- विटामिन-D का स्तर सही रखें
2. संक्रमण से बचाव
- बार-बार होने वाले वायरल संक्रमण (जैसे एंटरोवायरस) से बचाने के लिए साफ-सफाई पर ध्यान दें
- समय पर टीकाकरण कराएं
3. नियमित स्वास्थ्य जांच
- अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, तो बच्चों की समय-समय पर जांच कराएं
- ब्लड शुगर की निगरानी उपयोगी हो सकती है
4. शुरुआती लक्षण पहचानें (इन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें)
जल्दी पहचान सबसे बड़ा “बचाव” है:
ज्यादा प्यास लगना
बार-बार पेशाब
अचानक वजन कम होना
कमजोरी और चिड़चिड़ापन
जंक फूड से बच्चों को रखें दूर
जंक फूड बच्चों के स्वास्थ्य और टाइप 1 डायबिटीज के प्रबंधन दोनों पर अप्रत्यक्ष रूप से असर डालता है। जंक फूड में अत्यधिक शुगर, नमक और अस्वास्थ्यकर फैट होते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। लगातार ऐसे भोजन का सेवन करने से शरीर में सूजन (inflammation) बढ़ सकती है, जिससे इम्यून सिस्टम असंतुलित हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह असंतुलन उन बच्चों में जोखिम को बढ़ा सकता है, जिनमें पहले से आनुवंशिक प्रवृत्ति होती है। हालांकि, इस पर अभी और शोध जारी है।
टाइप 1 डायबिटीज के बच्चों के लिए जंक फूड और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे खाद्य पदार्थ रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) को तेजी से बढ़ाते हैं, जिससे शुगर लेवल को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप, इंसुलिन की मात्रा को बार-बार समायोजित करना पड़ता है और अचानक शुगर बढ़ने या गिरने का खतरा बना रहता है।
संतुलित और नियंत्रित आहार की जरूरत होती है। इसमें ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, प्रोटीन युक्त भोजन और पर्याप्त पानी शामिल होना चाहिए। जंक फूड को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं, लेकिन इसे सीमित मात्रा में और कभी-कभार ही देना चाहिए।
जंक फूड बच्चों के समग्र स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों में बचपन से ही स्वस्थ खान-पान की आदतें विकसित करें, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित और स्वस्थ रह सके।
Created On :   23 April 2026 7:15 PM IST












