कड़ी फटकार: कैंसर दवाओं की बिक्री में लूट, सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी नहीं कोई असर

डिजिटल डेस्क, नागपुर. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों पर दवाओं की कीमतों में भारी मार्जिन को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने एक चौंकाने वाले मामले का जिक्र किया। एक दवा डीलर की पत्नी का कैंसर का इलाज एक बड़े निजी अस्पताल में चल रहा था। डीलर ने अस्पताल से कहा कि कीमोथेरेपी इंजेक्शन उसे डीलर रेट पर सिर्फ 11000 रुपए में मिलता है, लेकिन अस्पताल ने बाहरी दवा लेने से इनकार कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपए वसूल किए। कोर्ट ने साफ कहा कि अस्पताल दवाओं पर इतने ऊंचे मार्जिन वसूल नहीं कर सकते।
7 हजार की दवा के बदले 60 हजार रुपए की वसूली
यह फैसला नागपुर महानगर के लिए खास मायने रखता है। कैंसर दवाओं पर भारी मार्जिन की शिकायतें सामने आई हैं। कुछ कैंसर रोधी दवाओं की थोक कीमत करीब 7 हजार रुपए हैं, लेकिन अस्पताल और रिटेल चेन में एमआरपी 60 हजार रुपए तक वसूली जा रही है यानी 400 से 800 प्रतिशत तक का अंतर। महाराष्ट्र एफडीए के सर्वेक्षण में अस्पताल के उपभोग्य सामान (आईवी सेट, सिरिंज, कैथेटर आदि) पर 2841 प्रतिशत तक मार्जिन पाया गया था। उदाहरण के लिए, 11 रुपए का आईवी सेट के बदले मरीज से 325 रुपये वसूले जा रहे था। एफडीए ने कैंसर दवाओं की इस अंधाधुंध लूट पर सख्त कार्रवाई का संकेत दिया है। नागपुर में आएसटी कैंसर अस्पताल में सालाना करीब 5500 नए कैंसर मरीजों का पंजीकरण मेडिकल में 2500 से अधिक नये मरीज दर्ज होते हैं। स्क्रीनिंग अभियानों में हजारों संदिग्ध मामले सामने आते हैं।
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निर्माण से शुरू होता है खेल
सूत्रों ने बताया कि कैंसर दवाओं की सप्लाई चेन में कई परतें हैं। निर्माता (कंपनी) दवा बनाता है। फिर स्टॉकिस्ट व डिस्ट्रीब्यूटर, एजेंट, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (एमआर), थोक व्यापारी, रिटेल फार्मेसी और अस्पताल फार्मेसी आते हैं। नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर निर्माता एमआरपी तय करते हैं। अस्पताल, कंपनियों से कम दर (पीटीआर-प्राइस टू रिटेलर व स्टॉकिस्ट) पर खरीदते हैं, लेकिन मरीज से पूरा एमआरपी वसूलते हैं। औसत ट्रेड मार्क-अप 170 प्रतिशत तक बताया गया है, कुछ मामलों में 700 प्रतिशत या उससे अधिक होता है। कैंसररोधी दवाएं बेवासिजुमैब, पाल्बोसिक्लिब, पेम्ब्रोलिजुमैब, डोसेटेक्सल या पैक्लिटैक्सेल, थायोटिपा या डासाटिनिब इन पांच दवाओं की सर्वाधिक मांग बताई गई है। एनपीपीए ने 137 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत कैप किया है। नई एमआरपी 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी। कई जेनेरिक-बायोसिमिलर ब्रांड्स में 70-93 प्रतिशत तक कटौती हुई है, जबकि कुछ महंगी पेटेंटेड-ओरिजिनेटर दवाओं में कोई बदलाव नहीं। इस तरह दवाओं के कारोबार में अनियंत्रित तरीके से लूट मची थी। जिसे अब नियंत्रित किया जा रहा है। जेनेरिक और बायोसिमिलर ब्रांड्स में बहुत कमी होगी।
30 फीसदी मरीजों की मृत्यु
मेडिकल के कैंसर रोग विभाग में हर साल 2500 कैंसर के नए मरीज दर्ज होते हैं। इनमें से 30 प्रतिशत 750 मरीज मुंह व गले के कैंसर से पीड़ित होते हैं। इन मरीजों में आधे 375 मरीज तीसरे व चौथे चरण में होते हैं। इन मरीजों का उपचार होने के बावजूद उनका बचना नामुमकिन होता है। 375 मरीजों की मुंह व गले के कैंसर के चलते मौत हो जाती है। इनमें 90 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र के व 10 फीसदी शहरी क्षेत्र के होते हैं। इसका प्रमुख कारण तंबाकू व तंबाकूजन्य पदार्थों का सेवन है। आरएसटी कैंसर हॉस्पिटल में सालाना 5,500 नए मरीज दर्ज होते हैं। इनमें मुंह व गले के कैंसर के तीसरे व चौथे चरण के मरीजों की संख्या 825 होती है। अस्पतालों में मुंह के कैंसर के मरीजों की आयुवर्ग 45 से 60 और इससे अधिक होती है। इसका प्रमाण महिलाओं में कम और पुरुषों में अधिक होता है।
डेंटल से हर महीने भेजे जाते हैं 10 मरीज
शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय व अस्पताल (डेंटल) में दातों व जबड़ों की समस्या के लिए आने वाले मरीजों में भी मुंह व गले के कैंसर के मरीज पाए जाते हैं। सूत्रों ने बताया कि हर महीने जांच के बाद औसत 10 मरीजों को मेडिकल में भेजा जाता है। इन मरीजों में कैंसर के लक्षण पाए जाते हैं या उन्हें मुंह व गले का कैंसर हो चुका होता है। ग्रामीणों में जांच के लिए सुविधाएं नहीं होने से वहां के लोग स्थानीय क्लिनिक या स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर दवाएं लेते रहते हैं। सही जांच नहीं होने से उन्हें इस बात का पता नहीं चलता कि कैंसर हो चुका है। समय बर्बाद होने से उनका कैंसर तीसरे या चौथे चरण में पहुंच जाता है। ऐसे में उन्हें बचा पाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे संदिग्ध लक्षण
जिन मरीजों में कैंसर पाया जाता है, उनमें कई तरह की समस्याएं पाई जाती है। उनका मुंह पूरी तरह नहीं खुल पाता है। आवाज में परिवर्तन होता है। मुंह में छाले आ जाते हैं। मवाद जम जाता है। कई बार मुंह से या जबड़ों से खून बाहर आता है। दातों व जबड़ों में दर्द होता है। मुंह से बदबू आती है। भोजन चबाने व निगलने में परेशानी होती है। दांत हिलने लगते हैं। मुंह के भीतर का मांस कठोर हो जाता है, वहां गांठ हो जाती है। ऐसे लक्षण दिखने पर कैंसर की जांच की जाती है। मुुुंह का कैंसर गाल, जबड़ा व मसुड़ों में होता है। यह मुंह से गले तक के भाग को प्रभावित करता है। मरीजों को दवाओं को अलावा रेडिएशन थेरेपी, बायोप्सी, कीमोथेरेपी, सामान्य सर्जरी आदि पद्धतियों से उपचार किया जाता है।
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