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हाईकोर्ट : भीमा-कोरेगांव मामले में 3 की जमानत पर फैसला सुरक्षित, निवासी डॉक्टरों के कार्य अवधि पर होगी कमेटी गठित

हाईकोर्ट : भीमा-कोरेगांव मामले में 3 की जमानत पर फैसला सुरक्षित, निवासी डॉक्टरों के कार्य अवधि पर होगी कमेटी गठित

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपी सुधा भारद्वाज,वेरनन गोंसाल्विस व अरुण फरेरा के जमानत आवेदन पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। कई हफ्ते तक चली सुनवाई के बाद सोमवार को न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील अरुणा पई ने जांच के दौरान आरोपियों के कंप्युटर से मिले पत्र व कालडेटा रिकार्ट तथा अन्य सबूतों के आधार पर आरोपियों की जमानत का विरोध किया। उन्होंने न्यायाधीश के सामने दावा किया कि पुलिस के पास भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपियों की संलिप्तता दर्शानेवाले पर्याप्त सबूत है। वहीं आरोपियों के वकीलों ने दावा किया कि पुलिस ने बिना किसी सबूत के उनके मुवक्किलों को गिरफ्तार किया है। उनकी इस मामले में कोई भूमिका नहीं है। लिहाजा उन्हें जमानत प्रदान की जाए। इस तरह से मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति कोतवाल ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया।

निवासी डॉक्टरों की कार्य की अवधि के मुद्दे के लिए हाईकोर्ट ने कमेटी गठित करने का दिया निर्देश

उधर निवासी (रेजिडेंट) डाक्टरो के कार्य की अवधि तय करने व उनके  कार्य की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए बांबे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कमेटी गठित कर 6 महीने के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्रालय विभाग के सचिव इस कमेटी के चेयरमैन होगे। कोर्ट ने इस कमेटी में मुंबई महानगरपालिका के मेडिकल कालेज में डीन (अधीष्ठता)  के तौर पर नियुक्त दो वरिष्ठ डाक्टरों व महाराष्ट्र एसोसिएशन आफ रेजिडेंट डाक्टर(मार्ड) के दो सदस्यों को भी शामिल करने को कहा है। अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकार को इस कमेटी का सदस्य सचिव नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है। न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी व न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ ने 14 डाक्टरों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह निर्देश दिया। याचिका में मुख्य रुप से अस्पतालों में कार्य के बोझ के चलते रेजिडेंट डाक्टरों की परेशानी के मुद्दे को दर्शाया गया है। याचिका में कहा गया है कि रेजिडेंट डाक्टरों के खास तौर से कार्य के घंटे तय किए जाए ताकि उन्हें शोषण व कार्य के भारी बोझ से बचाया जा सके। याचिका में दावा किया गया है कि रेजिडेंट डाक्टरों के रहने की व्यवस्था में सुधार व कार्य की स्थिति को बेहतर बनाने की जरुरत है। जिससे वे मानसिक व शारीरिक पीड़ा से बच सके। याचिका के अनुसार डाक्टरों पर काम का बोझ काफी ज्यादा है लेकिन उसकी तुलना में उन्हें पर्याप्त आराम नहीं मिलता है। इसलिए डाक्टरों के कार्य के घंटे से जुड़े विषय पर ध्यान देने की जरुरत है। इस दौरान सरकारी वकील ने कहा कि इस तरह के विषय को लेकर कमेटी गठित करना उचित होगा। जो सभी विषयों का परीक्षण करने के बाद  सिफारिशों के तौर पर सरकार को एक रिपोर्ट सौपेगी। यह कमेटी याचिकाकर्ताओं की सभी शिकायतों पर विचार करेगी। इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने भी कमेटी गठित किए जाने को लेकर सहमति व्यक्त की। इसके बाद खंडपीठ ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने का निर्देश दिया। खंडपीठ ने कमेटी को याचिका में उल्लेखित सभी पहलूओं पर गौर करने के बाद 6 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत में सौपने का निर्देश दिया। 

गोमांस बेचने के आरोपियों कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से किया इंकार

वहीं बांबे हाईकोर्ट ने अवैध रुप से गोमांस बेचनेवाले व वध के लिए गय रखनेवाले दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने जांच के दौरान मिले सूबतों के आधार पर आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया। न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि पुलिस जब घटना पर स्थल पर पहुंची तो उन्होंने मौके वरदात पर चमडी व मांस पाया। साथ ही जहां पर पशुओं का वध किया जाता था वहां से मात्र 15 फुट की दूरी पर दो गाय व चार भैसों को बांध कर रखा गया था। और जिस जगह पर गाय व भैस को रखा गया था उस जगह के मालिक आरोपी थे। इन बातों को जानने के बाद न्यायमूर्ति कोतवाल ने कहा कि आरोपियो के खिलाफ जिन धारओं के तहत मामला दर्ज किया गया है वह गैर जमानती है। इसके अलावा घटना स्थल से बरामद हुई चीजे भी आरोपियों की मामले में संलिप्त होने का इशारा करती है। इसलिए आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत नहीं प्रदान की जा सकती है। अवैध रुप से गाय का वध किए जाने की सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिस ने घटना स्थल पर पहुंच कर मामले की तहकीकात की और इस मामले में एसएस कुरैशी व समद कुरेशी को आरोपी बनाया गया। बारामती सिटी पुलिस ने इन आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 429,महाराष्ट्र प्राणी संरक्षण कानून की धारा 5बी,5सी, व 9ए के अलावा प्राणी क्रूरता प्रतिबंधक कानून  की धारा 11 के तहत मामाला दर्ज किया था। मामले में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए आरोपियों ने कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था। जिसे हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद खारिज कर दिया। 

ड्यूटी के प्रति निष्ठा व ईमानारी न रखनेवाले कर्मचारी की नौकरी बहाल करने से हाईकोर्ट ने किया इंकार

इसके अलावा बांबे हाईकोर्ट ने ड्यूटी के प्रति निष्ठा व ईमानदारी न रखनेवाले कर्मचारी की नौकरी बहाल करने से  इंकार कर दिया है। बांबे पोर्ट ट्रस्ट(बीपीटी)  में वॉचमैन के रुप में कार्यरत रमेश मांजरेकर(परिवर्तित नाम) को चोरी के आरोप में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। विभागीय जांच के दौरान बीपीटी ने मांजरेकर के कृत्य को ड्युटी के प्रति निष्ठा व ईमानदारी न रखने का आरोप लगाया था। और मांजरेकर का भी पक्ष सुनने के बाद उसे 1 जनवरी 1990 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। बीपीटी के इस निर्णय के खिलाफ मांजरेकर ने केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी। न्यायाधिकरण ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद प्रबंधन द्वारा मांजरेकर को नौकरी से निकाले जाने के निर्णय को सही माना था। न्यायाधिकरण के फैसले को मांजरेकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। एकल न्यायाधीश के सामने मांजरेकर ने दावा किया कि उसे चोरी के आरोप में मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने उसे बरी कर दिया है। ऐसे में जिन सबूतो के आधार पर मैजिस्ट्रेट ने उसे बरी किया है उन्हीं सबूतों के आधार पर बीपीटी का प्रबंधन उसे कैसे नौकरी से बर्खास्त कर सकता है। इसके अलावा मांजरेकर ने विभागीय जांच के लिए नियुक्ति किए गए अधिकारी पर भी सवाल उठाए थे। ड्यूटी के दौरान रिफाइन तेल के एक गैलन के साथ पकड़े गए मांजरेकर से जुड़े मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद एकल न्यायाधीश ने भी न्यायाधिकरण के निर्णय को कायम रखा। इससे असंतुष्ट मांजरेकर ने एकल न्यायाधीश के निर्णय को न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी व न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ के सामने चुनौती दी। मामले से जुड़े दोनों पक्षो को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि विभागीय जांच व आपराधिरक मुकदमा पूरी से अलग व भिन्न होते है। क्योंकि विभागीय जांच में मुख्य रुप से कर्मचारी की अनुशासनहीनता से जुड़ी करतूत को देखा जाता है। जबकि आपराधिक मामले में मैजिस्ट्रे पुलिस द्वारा दिए गए सबूतों के आधार पर अपना फैसला सुनाता है। हम कार्य के प्रति निष्ठा व ईमानदारी न रखने को साधरण आरोप नहीं मान सकते है। क्योंकि विभागीय जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूत पुलिस के सबूत से अलग थे। आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान कई गवाह अपने बयान से मुकर गए थे। मैजिस्ट्रेट के सामने घटना को लेकर कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। इसलिए याचिकाकर्ता को बरी किया गया है। यह कहते हुए खंडपीठ ने मांजरेकर की याचिका को खारिज कर दिया और उसकी नौकरी को बहाल करने से इंकार कर दिया। 
 

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