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हाईकोर्ट : सरकारी नौकरी में रहते नहीं लड़ सकते चुनाव, एयरपार्ट की ड्यूटी फ्री दुकानों को मिले इनपुट टैक्स क्रेडिट  

हाईकोर्ट : सरकारी नौकरी में रहते नहीं लड़ सकते चुनाव, एयरपार्ट की ड्यूटी फ्री दुकानों को मिले इनपुट टैक्स क्रेडिट  

डिजिटल डेस्क, मुंबई। नौकरी में रहते विधानसभा चुनाव लड़ने की अनुमति मांगनेवाले एयर इंडिया के कर्मचारी को अंतरिम राहत के तौर पर चुनाव लड़ने की अनुमति देने से बांबे हाईकोर्ट ने इंकार कर दिया है। हालांकि इस याचिका को विचारार्थ मंजूर कर लिया गया है। याचिका में याचिकाकर्ता प्रदीप ढोबले ने एयर इंडिया एमप्लाई सर्विस रेग्युलेशन की धारा 82 की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। इस धारा के तहत ऐसा नियम है कि एयर इंडिया का कर्मचारी सेवा में रहते किसी भी राजनीतिक व सांप्रदायिक संगठन से नहीं जुड़ सकता और उसकी गतिविधियों में भी शामिल नहीं हो सकता। इस धारा के अंतर्गत संसद, विधानसभा व स्थानीय निकाय के चुनाव में हिस्सा लेने पर भी रोक लगाई गई है। याचिकाकर्ता ने पहले अपने नियोक्ता से लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति मांगी थी। इसके बाद िवधान सभा चुनाव लड़ने की इजाजत मांगी। किंतु 3 अप्रैल 2019 को नियोक्ता यानी एयर इंडिया ने उसे चुनाव लड़ने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता उदय वारुंजकर ने दावा किया कि चुनाव लड़ना कानूनी व संवैधानिक अधिकार है। नियोक्ता द्वारा  चुनाव लड़ने पर लगाई गई पाबंदी बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है। इसलिए इस पाबंदी को अमान्य कर दिया जाए। क्योंकि जनप्रतिनिधित्व कानून सार्वजनिक उपक्रमो में कार्यरत लोगों को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ना संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में एयर इंडिया की सर्विस से जुड़ा कानून कैसे इस अधिकार को नियंत्रित कर सकता है। वहीं एयर इंडिया की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने कहा कि  याचिकाकर्ता अपनी नौकरी छोड़कर लोकसभा व विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहे तो किसी को कोई आपत्ती नहीं है। नौकरी में रहते हुए धारा 82 के चलते यह संभव नहीं है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति एनजे जमादार की खंडपीठ ने कहा कि याचिका में बहस योग्य प्रश्न उपस्थित किए गए हैं। इसलिए हम याचिका को विचारार्थ मंजूर करते हैं। खंडपीठ ने कहा कि नियमानुसार किसी अधिनियम पर रोक नहीं लगाई जा सकती । इस मामले में याचिकाकर्ता को राहत देने का अर्थ धारा 82 पर रोक लगाने जैसा होगा। इसलिए हम याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देने से इंकार करते हैं। 

 

इंटरनेशनल एयरपार्ट की ड्यूटी फ्री दुकानों को मिले इनपुट टैक्स क्रेडिट  

‌वहीं बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में साफ किया है कि मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित ड्यूटी फ्री शॉप इनपुट टैक्स क्रेडिट पाने के लिए पात्र है। इनपुट टैक्ट क्रेडिट भुगतान किए गए कर पर मिलनेवाली छूट की व्यवस्था है। न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति भारती डागरे की खंडपीठ ने फ्लेमिंगो रिटेल ट्रेवल लिमिटे़ड की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया है। ड्यूटी फ्री दुकान में चाकलेकट, परफ्यूम, कास्मेटिक व शराब बेची जाती है । यह दुकाने मूल रुप से विदेश आने व जानेवाले यात्रियों की जरुरतों को पूरा करती है। खंडपीठ ने साफ किया है कि यदि इन दुकानों के मालिको को इनपुट टैक्स क्रेडिट से वंचित किया जाएगा तो इससे न सिर्फ विदेशी व्यापार प्रभावित होगा बल्कि विदेशी मुद्रा के संवर्धन व सरंक्षण पर भी असर पड़ेगा। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ड्यटी फ्री दुकाने एक तरह से निर्यातक की श्रेणी में आती है क्योंकि यहां समान खरीदने वाले उनका इस्तेमाल अपने देश में जाने के बाद करते हैं। यदि किसी कारणवश वे अपने देश नहीं जा पाते है तो ऐसी स्थिति में उन्हें सामान वापस कर दुकान से रिफंड लेने की व्यवस्था भी दी गई है।  एेसे में यदि इन दुकानों पर सेवा व दूसरे स्थानीय कर लगाए जाएंगे तो इससे चीजे और मंहगी होगी। याचिका में मुख्य रुप से याचिकाकर्ता ने बिक्री कर उपायुक्त के 10 जनवरी 2019 के आदेश को चुनौती दी थी। जिसके तहत याचिकाकर्ता को इनपुट टैक्स क्रेडिट देने से मना कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि देश के दूसरे इलाके में स्थित इंटरनेशनल एयरपोर्ट में बनी ड्यूटी फ्री दुकानों को इनपुट टैक्स क्रेडिट दी जाती है। ऐसे में मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित ड्यूटी फ्री दुकान को इनपुट टैक्स से वंचित करना वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) के उद्देश के विपरीत है। यह संविधा के अनुच्छेद 286 के प्रावधानों के भी विपरीत है। क्योंकि जीएसटी ने एक राष्ट्र एक कर की व्यवस्था दी है। वहीं राज्य सरकार व केंद्र सरकार ने दावा किया था कि ड्यूटी फ्री दुकानों से ली जानेवाली चीजो का इस्तेमाल दूसरे देश में पहुंचने के बाद ही किया जाता है यह पूरी तरह से सच नहीं है। इसके अलावा ड्यूटी फ्री दुकानों को हर तरह के टैक्स से छूट नहीं दी जा सकती है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद बिक्री कर उपायुक्त के 10 जनवरी 2019 के आदेश  व एक नोटिस को खामीपूर्ण मानते हुए उसे रद्द कर दिया।

 

दोबारा पोस्टमार्टम के बाद बेटे का शव लेने को राजी हुआ पिता

इसके अलावा संदिग्ध अवस्था में मौत का शिकार हुए बेटे के शव का दोबारा पोस्टमार्टम किए जाने की शर्त पर एक पिता ने अपने बेटे का शव लेने के लिए बांबे हाईकोर्ट में रजामंदी दिखाई है। राजावाड़ी अस्पताल में किए गए पोस्टमार्टम से मृतक अंकुश के पिता आनंद पांडे संतुष्ट नहीं थे, इस लिए उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।याचिका में पांडे ने दावा किया गया था कि अंकुश 15 सितंबर 2019 को घर से काम के लिए निकला था। लेकिन जब वह काम से नहीं लौटा तो अंकुश से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई। 16 सितंबर को किसी अजबनी ने अंकुश का फोन उठाया। फोन पर पांडे को राजावाड़ी अस्पताल में आने के लिए कहा गया। जब पांडे राजावाड़ी अस्पताल पहुंचे तो उन्हें अपने बेटे की मौत की जानकारी मिली। इसके बाद याचिकाकर्ता को अपने बेटा का शव लेने के लिए कहा गया लेकिन याचिकाकर्ता को अपने बेटे की मौत संदिग्ध लगी। इसलिए उन्होंने विशेषज्ञों से अपने बेटे का शव पोस्टमार्ट कराने व मामले की सही तरीके से जांच कराने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 
इस दौरान सरकारी वकील ने न्यायमूर्ति आरवी मोरे की खंडपीठ के सामने कहा कि राजावाड़ी अस्पताल में याचिकाकर्ता के बेटे का पोस्टमार्टम हो चुका है और पुलिस ने दुर्घटनावश मौत का मामला दर्ज किया है। घटना को लेकर पांच गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं। जिसमे से दो चश्मदीद गवाह है। एक चश्मदीद ने बाताया कि अंकुश 15 सितंबर को एक घाटकोपर इलाके में एक ताड़ी-माड़ी केंद्र में आया था। जब वह ताड़ी खरीदने आया तो वह काफी नशे में था।  वह ठीक से चल नहीं पा रहा था और कुछ देर बाद वहीं पर बैठ गया फिर कुछ क्षण बाद वह अचेत हो गया। जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। सरकारी वकील ने कहा कि फिलहाल याचिकाकर्ता के बेटे का शव राजावाड़ी अस्पताल में रखा गया है। जिसे याचिकार्ता नहीं ले रहे हैं। यदि याचिकाकर्ता सहमति दे तो शव का दोबारा पोस्टमार्ट कराया जा सकता है। इसके बाद याचिकाकर्ता को शव लेना पड़ेगा। इसके लिए याचिकाकर्ता राजी हो गए। इसके बाद खंडपीठ ने जेजे अस्पताल को शव का दोबारा पोस्टमार्टम करने का निर्देश दिया और पोस्टमार्टम के बाद याचिकाकर्ता को अपने बेटे का शव लेने के लिए कहा। 
 

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राजस्थान में सियासी घमासान फिर तेज, मंत्रिमंडल विस्तार पर गहलोत-पायलट आमने सामने


डिजिटल डेस्क, जयपुर। पंजाब में जब से कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को दरकिनार कर कांग्रेस प्रदेश कमेटी का अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को बनाया है, तब से राजस्थान में पायलट गुट का भी जोश हाई है। अब पायलट गुट के दबाव के कारण मंत्रिमंडल पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट के बीच तलवारें खिंच गईं हैं,  दोनों गुट आमने-सामने आ गये हैं। फिलहाल विस्तार की कोई तारीख तय नहीं है लेकिन यह माना जा रहा है कि अगले महीने इस पर कोई फैसला लिया जा सकता है। अभी गहलोत कैबिनेट में 9 पद खाली हैं। अगर कांग्रेस 'एक व्यक्ति एक पद' के फॉर्मूले को मानती है तो शिक्षा राज्य मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा को अपना पद छोड़ना होगा। वैसे गोविंद डोटासरा ने यह कहकर कि 'मैं दो-चार दिन का मेहमान हूं' अपने जाने के संकेत दे दिये हैं। एक पद विधानसभा उपाध्यक्ष का भी खाली है।   
 
आंकड़ों के हिसाब से गहलोत कैबिनेट में कुल 11 पद खाली हैं। लेकिन इन सभी पदों पर फिलहाल मंत्री नहीं बनाए जाएंगे। अंदेशा है कि विस्तार के बाद भी नाराजगी रह सकती है। उन हालातों का सामना करने के लिए फिलहाल कैबिनेट में दो या तीन पद खाली ही रखे जाएंगे। 
मत्रिमंडल विस्तार पर अगर पूरी तरह गहलोत हावी रहे तो 2 या 3 ही मंत्रियों की छुट्टी होगी। पर ये फैसला लेना भी गहलोत के लिए आसान नहीं होगा,  क्योंकि उन्हें उन लोगों के बीच फैसला लेना होगा जिन लोगों ने मुश्किल वक्त में उनका साथ दिया था। 
अगर विस्तार पर पायलट गुट का दबाव रहा तो फिर 6 से 7 मंत्री आउट होना तय माने जा रहे हैं। और, अगर आलाकमान ने प्रदर्शन को आधार माना तो कई मंत्रियों को जाना पड़ सकता है, लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है। हालांकि, अजय माकन का 28-29 को जयपुर दौरा है। जिसमें वह जयपुर आकर हर विधायक से बात करेंगे। उसके बाद यह तय होगा कि कौन रहेगा और कौन जाएगा?   

इन मंत्रियों की कुर्सी पर खतरा


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इनकी हो सकती मंत्रिमंडल में एंट्री- पायलट गुट के 3 और गहलोत गुट के 7 चहेरों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। 

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डोटासरा के बयान से उनके जाने के संकेत

प्रदेश में मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाऐं जारी हैं उस बीच शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर छा गया है। इसमें उनको राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डीपी जारोली से कहते सुना जा सकता हैं- ‘मेरे पास एक घंटे फाइल नहीं रुकेगी, आप सोमवार को आ जाओ। एक मिनट में निकाल दूंगा, जितनी कहोगे। मैं दो-पांच दिन का ही मेहमान हूं। मुझसे जो कराना है करा लो।’ इसके बाद बोर्ड अध्यक्ष डीपी जारोली ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं आता हूं सर। इस वायरल वीडियो के बाद से ये कयास तेज हो गए हैं कि मंत्रिमंडल से डोटासरा की रवानगी तय है। 
 

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Habibganj Railway Station: भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन आपके लिए तैयार, यहां की सेफ्टी, सिक्योरिटी और फैसिलिटी सबसे अलग


डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन बनकर तैयार हो चुका है। री-डेवलपमेंट के बाद इस स्टेशन पर ऐसी सुविधाएं मिलेंगी जो मौजूदा समय में भारत के किसी भी रेलवे स्टेशन पर नहीं है। हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, अस्पताल, मॉल, स्मार्ट पार्किंग, हाई सिक्योरिटी समेत कई सुविधाएं मिलेंगी। इसके लोकार्पण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। अगले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्टेशन का लोकार्पण कर सकते हैं। आइये जानते हैं कैसे एक सामान्य रेलवे स्टेशन बना वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन...

16 अप्रैल 1853 बॉम्बे से 14 कोच और 400 यात्रियों के साथ भारत की पहली ट्रेन ठाणे के लिए रवाना हुई। इस ट्रेन ने 34 किलोमीटर की दूरी तय की। इसके बाद भारत ने नए युग की ओर पहला कदम तब रखा जब उसने स्टीम इंजनों का निर्माण शुरू किया। राजपूताना मालवा के अजमेर वर्कशॉप में पहला स्टीम लोको नंबर F-734 1895 बनाया गया था। इसके बाद बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए 1901 में रेलवे बोर्ड का गठन किया गया।

आजादी के बाद भारत को विरासत में मिले रेल नेटवर्क में काफी सुधार की जरूरत थी। महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ने के लिए कई लाइनों को री-रूट किया गया और नई लाइन का निर्माण किया गया। भारत की 42 रियासतों के स्वामित्व वाले रेलवे को जोड़कर इंडियन रेलवे का गठन हुआ। 1947 में आजादी के बाद भारतीय रेल का 55 हजार किलोमीटर का नेटवर्क था। 1952 में मौजूदा रेल नेटवर्क को एडमिनिस्ट्रेटिव पर्पज के लिए 6 ज़ोन में डिवाइड किया गया। 

भारतीय इकोनॉमी के समृद्ध होने के साथ भारतीय रेलवे ने सभी प्रोडक्शन देश में ही करना शुरू कर दिया। 1985 के बाद धीरे-धीरे स्टीम इंजनों की जगह बिजली और डीजल लोकोमोटिव्स ने ले ली। कई सालों तक इलेक्ट्रिफिकेशन से लेकर ट्रैक और स्टेशनों के डेवलपमेंट पर काम हुआ। फिर आई 14 जुलाई 2016 की तारीख। भारतीय रेल के लिए ऐतिहासिक दिन। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत इंडियन रेलवे ने 1979 में तैयार हुए हबीबगंज स्टेशन के मॉडर्नाइजेशन के लिए पहला कॉन्ट्रेक्ट किया। 

5 सालों तक चले मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट के बाद जुलाई 2021 में हबीबगंज स्टेशन बनकर तैयार हो गया। इस स्टेशन में वर्ल्ड क्लास सुविधाएं है जिसके लिए करीब 100 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। हबीबगंज स्टेशन पर 5 प्लेटफॉर्म है, जिन्हें अलग-अलग शेडों से कवर किया गया है। यात्रियों को किसी तरह की कोई परेशानी न हो उसे ध्यान में रखते हुए सुविधाएं देने की कोशिश की गई है। दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय बनाए गए हैं। आने वाले समय में स्टेशन को ब्रिज के जरिए तैयार हो रहे मेट्रो स्टेशन से भी जोड़ा जाएगा।

हबीबगंज स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि प्रवेश करने और ट्रेनों से उतरकर बाहर निकलने वाले यात्री एक-दूसरे से नहीं टकराएंगे। प्रवेश करने वाले यात्री दोनों तरफ मुख्य भवनों से प्रवेश करेंगे। लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर से एयर कॉन्कोर पर पहुंचेंगे। वहां आराम करेंगे और ट्रेन के आने पर प्लेटफार्म पर उतरकर यात्रा शुरू करेंगे। दूसरें शहरों से हबीबगंज पहुंचने वाले यात्री ट्रेन से उतरेंगे और अंडरग्राउंड सब-वे से बाहर निकल जाएंगे। 

स्टेशन पर एक साथ 1100 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है। इस स्टेशन पर साफ-सुथरे AC वेटिंग रूम से लेकर रिटायरिंग रूम और डोर्मिटरी की सुविधा है। वीआईपी लाउंज भी बनाया गया है। एयरपोर्ट टर्मिनल्स पर जिस तरह की शॉप्स होती है उसी तरह की सुविधाओं के लिए यहां रिटेल स्पेस का प्रोविजन किया गया है। 

स्टेशन और लोगों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है। इसके लिए यहां 162 हाई रिजोल्यूशन कैमरे लगाए गए हैं। कंट्रोल रूम में बैठकर पूरे स्टेशन पर नजर रखी जाती है। इन कैमरों के डेटा को डेढ़ सौ टेराबाइट के सर्वर पर एक महीने तक स्टोर किया जाता है। फायर डिटेक्टर से लेकर सुरक्षा से जुड़े अन्य उपकरण यहां इंस्टॉल किए गए हैं। स्टेशन के बाहर के इलाके को 300 करोड़ रुपए की लागत से डेवलप किया जा रहा है जहां मॉल समेत अन्य सुविधाएं होंगी। 

हबीबगंज रेलवे स्टेशन की बिल्डिंग को इनवॉयरमेंट फेंडली बनाया गया है। बिजली की खपत को कम करने के लिए स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दिन में लाइट की जरुरत ही नहीं है। टेंप्रेचर को कंट्रोल करने के लिए छत पर इंसुलेटड शीटिंग की गई है। इसके अलावा बिजली की आपूर्ति के लिए प्लेटफॉर्म के शेड पर सोलर पैनल लगाए गए हैं। इस स्टेशन को बनाते समय कंस्ट्रक्शन टीम को कई तरह के इंजीनियरिंग चैलेंजेज का भी सामना करना पड़ा।

अब सवाल उठता है कि क्या इतनी सारी सुविधाओं से युक्त ये स्टेशन आम लोगों की पहुंच से दूर हो गया है? क्या अब इस स्टेशन पर रेलवे का कोई कंट्रोल नहीं है? क्या ये स्टेशन प्राइवेट है? इसे समझने के लिए हमे समझना होगा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी को।स्टेशन पूरी तरह तैयार है। जैसे ही यात्रियों का दबाव बढ़ेगा, लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर शुरू कर दिए जाएंगे। अभी न के बराबर यात्री आ रहे हैं, इसलिए ये सुविधाएं बंद हैं।

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ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

डिजिटल डेस्क, टोक्यो। टोक्यो ओलंपिक में पूरी दुनिया से आए हुए खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खेल में अपनी प्रतिभा दिखाने के अलावा जर्मन की महिला जिमनास्टिक्स ने फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपने मन के कपड़े पहनने की आजादी को अपने खेल के जरिए प्रमोट करने का फैसला किया है, जिससे उनकी हर तरफ चर्चा हो रही है। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness

जर्मनी की महिला जिमनास्ट रविवार को हुए टोक्यो ओलंपिक मुकाबले में फुल बॉडी सूट पहने नजर आई। खिलाड़ियों ने बताया कि इस सूट को फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी को बढ़ावा देने साथ ही महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन किया गया है जिसे पहनकर महिला खिलाड़ी आरामदायक महसूस कर सकें।

Germany's gymnasts wear body-covering unitards, rejecting 'sexualization' of sport - CNN 
 

जर्मनी की 4 जिमनास्ट जिनके नाम है पॉलीन शेफर-बेट्ज, सारा वॉस, एलिजाबेथ सेट्ज और किम बुई लाल और सफेद रंग के इस यूनिटार्ड सूट में नजर आई जो लियोटार्ड और लेगिंग्स को मिलाकर बनाया गया था। खिलाड़ी इसी को पहन कर मैदान में उतरीं थी। 

German gymnastics team, tired of 'sexualisation,' wears unitards | Deccan Herald
 

जर्मनी की टीम ने अपनी ट्रेनिंग में भी इसी तरह के कपड़े पहने हुए थे और अपने कई इंटरव्यूज में खिलाड़ियों ने कहा था कि इस साल फाइनल कॉम्पटीशन में भी वो फ्रीडम ऑफ चॉइस को प्रमोट करने के लिए इसी तरह के कपड़े पहनेंगी। खिलाड़ी सारा वॉस ने द जापान टाइम्स को बताया था यूनिटार्ड को फाइनल करने से पहले उन्होंने इस पर चर्चा भी की थी। सारा ने ये भी कहा कि जैसे जैसे एक महिला बड़ी होती जाती है, वैसे ही उसे अपने शरीर के साथ सहज होने में काफी मुश्किल होती हैं। हम ऐसा कुछ करना चाहते थे जिसमें हम अच्छे भी दिखे और सहज भी महसूस करें। चाहे वो कोई लॉन्ग यूनिटार्ड हो या फिर शॉर्ट। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness
 

सारा ने यह भी बताया कि उनकी टीम ने इससे पहले यूरोपीय चैंपियनशिप में भी इसी तरह का फुल बॉडी सूट पहना था और इसका उद्देश्य सेक्सुलाइजेशन को कम करना है। हम लोगों के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहते थे जिससे वो हमे फॉलो कर सकें। जर्मन के खिलाड़ियों की लोग काफी प्रशंसा भी कर रहे हैं। 


ओलंपिक प्रतियोगिताओं में जिमनास्ट महिलाओं को फुल या हाफ बाजू के पारंपरिक लियोटार्ड ही पहनना होता है साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में फुल कपड़े पहनने की अनुमति तो है लेकिन किसी भी महिला जिमनास्ट ने इस तरह के कपड़े नहीं पहने थे। यह पहली बार था जब जर्मन खिलाड़ी महिलाओं ने इस तरह के कपड़े पहने थे। 
बीते कुछ सालों में खेल प्रतियोगिताओं में महिलाओं के शारीरिक शोषण के बढ़ते मामलों को देख महिला खिलाड़ियो की चिंता बढ़ती जा रही है अब एथलीटों की सुरक्षा को देखते हुए नए सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाए जा रहे हैं।