दैनिक भास्कर हिंदी: यौन उत्पीड़न के मामले में झूठ नहीं बोलती भारतीय महिलाएं -हाईकोर्ट 

April 7th, 2018

डिजिटल डेस्क,मुंबई। यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले को देरी से दर्ज कराने का मतलब यह नहीं है कि पीड़िता झूठ बोल रही है। क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है कि जब भारतीय महिला झूठा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाती है। बांबे हाईकोर्ट ने सामूहिक बलात्कार के मामले में दोषी पाए गए चार आरोपियों की सजा को बरकरार रखते हुए अपने फैसले में इस बात को स्पष्ट किया है।   न्यायमूर्ति एएम बदर ने मामले से जुड़े चारों आरोपियों की अपील खारिज करते हुए कहा कि यदि पीड़ित तुरंत पुलिस में यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं दर्ज कराती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह झूठ बोल रही है। मामले से जुड़े आरोपी दत्तात्रेय कोर्डे, गणेश परदेशी, पिंटु खोसकर व गणेश जोले को निचली अदालत ने दस साल के कारावास की सजा सुनाई है। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ चारों आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की।

यह है मामला
चारों आरोपियों ने 15 मार्च 2012 को नाशिक में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था। ही महिला के मित्र के साथ मारपीट भी की थी। आरोपियों ने अपील में दावा किया था कि उन्हें इस मामले में फंसाया गया है, क्योंकि उन्होंने पीड़ित व उसके साथी को अशिष्ट आचरण करते देखा था और पुलिस में उनकी शिकायत करने की बात कही थी। इसलिए उन्हें मामले में फंसाया गया है। यहीं नहीं आरोपियों ने कहा था कि पीड़िता ने घटना के दो दिन बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके अलावा मेडिकल रिपोर्ट में भी बलात्कार की संभावना को नकारा गया है और महिला के शरीर पर जख्म के निशान भी नहीं मिले हैं।   लेकिन न्यायमूर्ति ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई भारतीय लड़की या महिला यौन उत्पीड़न की झूठी शिकायत दर्ज कराए। मामले से जुड़े तथ्यों पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति ने कहा कि प्रकरण से जुड़ी महिला बेहद रुढ़िवादी समाज से है। वह अपने पहले पति से अलग हो चुकी है। ऐसे में हो सकता है कि सामाजिक कलंक से बचने के लिए उसने दो दिन बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई हो। इसलिए देरी के आधार पर उसकी बातों को झूठा नहीं माना जा सकता है। मामूली अनियमितताओं व सिर्फ मामला दर्ज करने में देरी उसका प्रकरण कमजोर नहीं हो जाता। न्यायमूर्ति ने कहा कि शरीर पर चोट का निशान नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि पीड़ित का यौन उत्पीड़न नहीं हुआ है।