दैनिक भास्कर हिंदी: चुनावी ड्युटी से छूट देने की मांग से जुड़ी डाक विभाग के कर्मचारियों की याचिका खारिज, राजनीतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह का निर्णय सुरक्षित

September 23rd, 2019

डिजिटल डेस्क, मुंबई। चुनावी ड्युटी से छूट दिए जाने की मांग को लेकर डाक विभाग के कर्मचारियों की ओर से दायर याचिका को  बांबे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। मुंबई के पश्चिम उपनगर में कार्यरत डाक विभाग के कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि डाक विभाग में स्टाफ की कमी है। डाक विभाग मंजूर स्टाफ से आधे स्टाफ पर काम कर रह रहा है। ऐसे में यदि कर्मचारियों को चुनावी ड्युटी पर लगाया जाता है तो इससे विभाग का कामकाज प्रभावित होगा। चुनाव आयोग ने राज्य में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर डाक विभाग को चुनावी ड्युटी के लिए कर्मचारी उपलब्ध कराने की मांग को लेकर नोटिस जारी किया था। जिसे कर्मचारियों ने याचिका दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दी है। न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी व न्यायमूर्ति गौतम पटेल की खंडपीठ ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि व्यापक जनहित में डाक विभाग के कर्मचारी चुनावी ड्युटी में शामिल हो। इस दौरान खंडपीठ ने सुझाव स्वरुप कहा कि चुनावी अधिकारी चुनावी ड्युटी के लिए जरुरी प्रशिक्षण का समय डाक विभाग के कर्मचारियों के काम की समय सारणी को ध्यान में रखकर तय करे।  इस दौरान डाक विभाग की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने कहा कि डाक विभाग के लिए 1521 कर्मचारी मंजूर किए गए है। लेकिन इसमे से 768 कर्मचारी ही नियमित ड्युटी कर रहे है। ऐसे में यदि ये कर्मचारी चुनावी ड्युटी में जाते है तो इससे डाक विभाग का कामकाज प्रभावित होगा। पर खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

 

राजनीतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह का निर्णय सुरक्षित रखा

मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में मान्यता प्राप्त राजनैतिक पार्टियाें के तय चुनाव चिन्ह को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायालय ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है। राजनीतिक पार्टियों को तय चुनाव चिन्ह देने के मामले में आपत्ति दर्ज करवाते हुए जनहित याचिका दायर की गई। राजनीतिक पार्टियाें को एक सालों से एक ही चुनाव चिन्ह देने के मामले पर एम.एस. चक्रवर्ती ने याचिका दायर की थी। इसमें न्यायमूर्ति रवि देशपांडे व न्यायमूर्ति विनय जोशी की खंडपीठ के सामने अंतिम सुनवाई हुई। इसके पहले उच्च न्यायालय ने केन्द्रीय चुनाव आयोग को नोटिस भेजकर उत्तर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। कई सालों से एक पार्टी द्वारा एक ही चुनाव चिन्ह का उपयोग करने से राजनीतिक पार्टी ब्रांड के रूप में उपयोग करते है। चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक पार्टियां मंच पर चुनाव आयोग द्वारा दिए गए चिन्ह का उपयोग बोल्ड तरीके से करते है। इसलिए राजनैतिक पार्टियों को सिर्फ 20 साल के लिए चुनाव चिन्ह दिया जाए और उसके बाद उस चुनाव चिन्ह को वापस ले लिया जाए। याचिकाकर्ता के अनुसार चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के अंतर्गत चुनाव के परिणाम के अनुसार राजनैतिक पार्टियों को मान्यता देने और मान्यता वापस लेने के लिए चुनाव आयोग की उचित नीति है। मान्यता प्राप्त पार्टियों के उम्मीदवारों को तय अर्थात आरक्षित चिन्ह दिए जाते है जबकि अन्य उम्मीदवारों को अनारक्षित चिन्ह दिए जाते है। आरक्षित चिन्ह भविष्य में मतदाता के ध्यान में रहते है जिससे वह राजनैतिक पार्टियों के ब्रांड चिन्ह बन जाते है। इस वजह से आरक्षित चिन्ह की वजह से राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवारों को सीधा लाभ मिलता है जबकि बिना मान्यता प्राप्त पार्टी के उम्मीदवार को चुनाव के 15 दिन पहले चुनाव चिन्ह दिया जाता है। उस चिन्ह की ना तो कोई पहचान होती है और ना ही वह किसी के ध्यान में रहने लायक होता है। याचिका में दावा किया गया है कि संविधान की कलम 14 की समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

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