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सुरक्षा और आपात स्थिति में ही कर सकते हैं फोन टैपिंगः हाईकोर्ट

सुरक्षा और आपात स्थिति में ही कर सकते हैं फोन टैपिंगः हाईकोर्ट

डिजिटल डेस्क, मुंबई। सार्वजनिक सुरक्षा व अपात स्थिति में ही नागरिकों के फोन की टैपिंग की जा सकती है इन दो स्थितियों के अलावा कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना फोन टैप करना नागरिकों के मौलिक व नीजता के अधिकार का उल्लंघन है।  बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस बात को स्पष्ट किया है। सीबीआई ने सरकारी बैंक के अधिकारी को दस लाख रुपए के घूस देने के आरोप में कारोबारी विनित कुमार के खिलाफ 11 अप्रैल 2011 को आपराधिक मामला दर्ज किया था। इससे पहले कारोबारी के फोन टैप किए गए थे। फोन रिकार्डिंग के संबंध दिए गए आदेश को मौलिक अधिकारों का हनन व इंडियन टेलिग्राफ कानून के प्रावधानों का उल्लंघन मानते हुए कारोबारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि फोन रिकार्डिंग को नष्ट करने का निर्देश दिया जाए।

फोन टैपिंग के खिलाफ कारोबारी ने दायर की थी याचिका 


न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति एनजे जमादार की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता सुजय कांटावाला ने दावा किया कि सिर्फ सार्वजनिक सुरक्षा के मामले और आपात स्थिति में ही फोन टैप करने की इजाजत दी जा सकती है। नियमानुसार फोन टैपिंग से जुड़ा निर्णय लेने से पहले इससे जुड़े प्रस्ताव को गृह मंत्रालय की समीक्षा कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए। इसके अलावा फोन टैपिंग क्यों जरुरी है इसका न्यायसंगत तर्क व निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बगैर फोन टैपिंग का आदेश नागिरकों के मौलिक व नीजता के अधिकारों का हनन है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने भी इस बात को अपने फैसले में स्पष्ट किया है। जांच एजेंसी फोन टैपिंग के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन नहीं कर सकती। सरकारी वकील ने दावा किया कि नियमों के तहत फोन टैपिंग के विषय में आदेश जारी किया गया था। 

अन्य परिस्थितियों में ऐसा करना मौलिक अधिकारों का उलंघन 

मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि जांच एजेंसियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत नागरिकों के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना फोन टैपिंग करना मनमानीपूर्ण है। सार्वजनिक हित, सुरक्षा व आपात स्थिति में ही फोन टैपिंग की अनुमति है लेकिन इसके लिए यह बताना जरुरी है कि फोन टैपिंग से क्या सुरक्षा का मसला व जनहित जुड़ा है। यह कहते हुए खंडपीठ ने कारोबारी के खिलाफ फोन टैपिंग को लेकर 29 अक्टूबर 2009, 10 दिसंबर 2009 तथा 24 फरवरी 2010 को दिए गए आदेश को रद्द कर दिया। खंडपीठ ने निर्देष दिया कि फोन टैपिंग के दौरान कि गई रिकार्डिंग को भी नष्ट किया जाए। खंडपीठ ने कहा कि मामले को लेकर फोन टैपिंग के संबंध में दिए आदेश से कोई वैधानिक उद्देश्य नहीं जुड़ा है। और टैपिंग को लेकर कानूनी मंजूरी भी नहीं ली गई थी। खंडपीठ ने कहा कि मामले से जुड़े मुकदमे के दौरान फोन टैपिंग की रिकार्डिंग को सबूत के तौर पर न पेश किया जाए। 

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