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हाईकोर्ट : पॉलिटेक्निक-इंजीनियरिंग कॉलेज कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी से छूट नहीं, 24 साल बाद जन्मतिथि का प्रमाण पत्र मांगना गलत

हाईकोर्ट : पॉलिटेक्निक-इंजीनियरिंग कॉलेज कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी से छूट नहीं, 24 साल बाद जन्मतिथि का प्रमाण पत्र मांगना गलत

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने चुनावी ड्युटी के खिलाफ गैर अनुदानित पॉलिटेक्निक व इंजीनियरिंग कालेजों की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। यह याचिका एसोसिएशन आफ  दि मैनेजमेंट आफ पॉलिटेक्निक व  एसोसिएशन आफ दि अनएडेड इंजीनियरिंग कालेज की ओर से दायर की गई थी। याचिकाओं में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत उन्हीं संस्थानों के कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगा सकती है जिस पर उसका नियंत्रण है और जिसे वह वित्तीय सहयोग प्रदान करती है। याचिकाकर्ता से जुड़े सारे संस्थान व कालेज गैर अनुदानित है ये सरकार के नियंत्रण में नहीं आते हैं। इसलिए इन कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में उपलब्ध कराने की मांग नहीं की जा सकती है। यह जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के खिलाफ है। इसके अलावा यदि निजी इंजीनियरिंग कालेज व गैर अनुदानित पॉलिटेक्निक संस्थानों के कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है तो इससे यहां का कामकाज प्रभावित होगा। इसका छात्रों की पढाई पर भी असर पड़ेगा।वहीं चुनाव आयोग की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता प्रदीप राजगोपाल ने दावा किया कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 159 के तहत चुनाव आयोग को याचिकाकर्ताओं से चुनावी ड्यूटी के लिए कर्मचारियों की मांग करने का अधिकार है। क्योंकि गैर अनुदानित इंजीनियरिंग व पॉलिटेक्निक संस्थान सरकार के कानून के तहत पंजीकृत हैं। प्रवेश व फीस से जुड़ी सरकार की नीतियां इन पर लागू हैं। इस लिहाज से गैर अनुदानित संस्थान भी सरकार के नियंत्रण के दायरे में अाते हैं। इसके अलावा पारदर्शी व निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग को कर्मचारियों की आवश्यकता है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने चुनाव आयोग की ओर से चुनावी ड्यूटी उपलब्ध कराने की मांग लेकर जारी की गई नोटिस के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।

24 साल बाद कर्मचारी से जन्मतिथि का प्रमाण पत्र मांगना गलत

वहीं बांबे हाईकोर्ट ने नियुक्ति के 24 साल बाद नियोक्ता द्वारा कर्मचारी से जन्मतिथी का दस्तावेजी प्रमाण मंगाने को अनुचित व अन्यायपूर्ण माना है। यहीं नहीं हाईकोर्ट ने कर्मचारी को चार साल पहले सेवानिवृत्त करने के लिए नियोक्ता को चार साल की अवधि का आधा वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने टाटा मेमोरियल अस्पताल से 1993 में सेवानिवृत्त किए गए इलेक्ट्रिशियन रमेश शिंदे (परिवर्तित नाम) को राहत प्रदान की है। शिंदे की टाटा अस्पताल में 1966 में इलेक्ट्रिशियन के तौर पर नियुक्ति की गई थी। नियुक्ति के समय सर्विस रिकार्ड में शिंदे ने अपनी जन्म तारीख 8 अगस्त 1937 बताई थी। 1971 में टाटा मेमोरियल सेंटर ने शिंदे को अपनी जन्म तारीख के विषय में प्रमाणपत्र देने को कहा। शिंदे अपना जन्म प्रमाणपत्र देने में विफल रहे। लिहाजा टाटा मेमोरियल सेंटर ने शिंदे की उम्र जानने के लिए उसे मेडिकल टेस्ट के लिए भेजा। मेडिकल टेस्ट के आधार पर शिंदे की उम्र 1971 में 33 साल पायी गई और इस आधार पर उसकी जन्म तारीख को 8 अगस्त 1937 से बदलकर 30 नवंबर 1933 कर दिया गया। लेकिन कई सालों तक सर्विस रिकार्ड में बदली गई तारीख के विषय में शिंदे को जानकारी नहीं दी गई। इस दौरान उसके पहचान पत्र में जन्म तारीख 8 अगस्त 1937 ही दर्शायी गई थी। मेडिकल टेस्ट में दर्शायी गई उम्र का शिंदे ने विरोध किया। यहीं नहीं उसने दावा किया कि मेडिकल टेस्ट के आधार पर तय की गई उम्र को पुष्ट नहीं माना जा सकता। उसने कहा कि टेस्ट के जरिए उम्र तय करने में पांच साल का अंतर होता है। कई वर्षों बाद नियोक्ता ने 1990 में फिर शिंदे से उसकी जन्म की तिथि को लेकर दस्तावेजी प्रमाण मांगा। इस पर शिंदे ने हलफनामा दायर कर अपनी जन्म तारीख 8 अगस्त 1937 बताई। जिसे नियोक्ता ने मानने से इंकार कर दिया। यहीं हीं उसे दिसंबर 1992 में पत्र जारी कर नवंबर 1993 में सेवानिवृत्ति किए जाने की जानकारी भी दे दी। इसके खिलाफ शिंदे ने औद्योगिक न्यायालय में आवेदन दायर किया। आवेदन में शिंदे ने नियोक्ता के निर्णय को अनुचित श्रम व्यवहार बताया। औद्योगिक न्यायालय ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया। जिसे नियोक्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में बदलाव करते हुए कर्मचारी को चार साल का आधा वेतन देने का निर्देश दिया। नियोक्ता ने एकल न्यायाधीश के आदेश को अपील दायर कर न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी व न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ के सामने चुनौती दी। खंडपीठ ने मामले से जुड़े तथ्यों पर गौर करने के बाद कहा कि नियुक्ति के 24 साल बाद कर्मचारी से उसकी जन्म तिथि के विषय में दस्तावेजी प्रमाण मंागना अनुचित व अन्यायपूर्ण है। साथ ही जब नियोक्ता ने कर्मचारी के सर्विस रिकार्ड में जन्म तारीख में बदलाव किया तो इसकी जानकारी तुरंत कर्मचारी को नहीं दी गई। कई सालों तक कर्मचारी द्वारा दी जन्म तिथि को कायम रखा गया। यह कहते हुए खंडपीठ ने नियोक्ता की अपील को खारिज कर दिया। और एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया। 
 

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