दैनिक भास्कर हिंदी: स्कॉलरशिप  बैंक अकाउंट में डालना ही सही- हाईकोर्ट

June 29th, 2019

डिजिटल डेस्क, नागपुर।  बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने साफ किया है कि केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के बैंक खाते में पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की राशि डालना सही निर्णय है। इस नीति को बदलने के लिए हाईकोर्ट कोई दखल नहीं देगा। इस निरीक्षण के साथ हाईकोर्ट ने शाहबाबू एजुकेशन सोसाइटी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। दरअसल यह स्कॉलरशिप योजना जून 2006 में शुरू हुई थी। प्रारंभिक रूप से ट्यूशन फीस शिक्षा संस्था के खाते में और मेंटेनेंस राशि विद्यार्थी के बैंक खाते में डाली जाती थी। लेकिन सत्र 2014-15  में इसमें बदलाव हुआ और केंद्र सरकार ने निर्णय लिया कि डीबीटी योजना के तहत मेंटेनेंस राशि के साथ ही ट्यूशन फीस भी विद्यार्थियों के बैंक खातों में ही डाली जाएगी। इस फैसले के खिलाफ शिक्षा संस्था ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से एड. एम.वी.समर्थ, एड.अनूप ढोरे ने पक्ष रखा। केंद्र सरकार की ओर से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल उल्हास औरंगाबादकर और एड. मुग्धा चांदूरकर ने पक्ष रखा। 

एडमिशन रद्द करने का अधिकार
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि विद्यार्थियों के खातों में ट्यूशन फीस जमा करने से विद्यार्थियों द्वारा फीस के दुरुपयोग के मामले बढ़ गए हैं। एक बार विद्यार्थी के बैंक खाते में ट्यूशन फीस आने के बाद शिक्षा संस्थाओं का उसे वसूल कर पाना मुश्किल होता है। नए शैक्षणिक सत्र के प्रवेश जुलाई तक पूरे होते हैं, तबकि  स्कालरशिप की राशि नवंबर माह में जमा होती है। लेकिन इस पर हाईकोर्ट का निरीक्षण था कि इस स्कालरशिप योजना का उद्देश्य विद्यार्थियों का फायदा देना है, न कि शिक्षा संस्थानों का। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विद्यार्थी ट्यूशन फीस नहीं जमा करते हैं तो शिक्षा संस्थाओं के पास ऐसे विद्यार्थियों का प्रवेश रद्द करने के अधिकार होते हैं। हाईकोर्ट ने साफ किया कि वे इस मामले में दखल नहीं देंगे। योजना से जुड़ी समस्याओं का निराकरण करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है।

अनियमितताएं सामने आई थीं
भारत सरकार के केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा देश भर के अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप प्रदान की जाती है। वर्ष 2013 तक इस योजना के तहत विद्यार्थियों की कोर्स फीस स्कूल/कॉलेज के बैंक अकाउंट में आर मेंटेनेंस भत्ता विद्यार्थी के बैंक अकाउंट में भेजी जाती थी। लेकिन राज्य में इस प्रक्रिया की खामियों का फायदा उठा कर कई छात्रवृत्ति घोटाले हुए। कई ऐसे मामले हुए जिसमें शिक्षा संस्थाओं ने फर्जी विद्यार्थी दिखा कर अवैध तरीके से स्कॉलरशिप हजम कर ली। ऐसे में शैक्षणिक सत्र 2014-15 में नीति में बदलाव हुआ और सारी की सारी स्कॉलरशिप विद्यार्थियों के बैंक अकाउंट में भेजी जाने लगी। इसका शिक्षा संस्थाओं ने विरोध किया और उच्च शिक्षा विभाग को ज्ञापन सौंपकर पहले की नीति लागू रखने की मांग की। शिक्षा संस्थाओं का तर्क था कि सरकार की ओर से सीधे तौर पर कोई अनुदान न मिलने से उन्हें कॉलेज चलाना मुश्किल हो रहा है। इसी मुद्दे पर उन्होंने याचिका दायर की है।
 

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