दैनिक भास्कर हिंदी: वायगांव के बप्पा : यहां खत्म हुआ था पांडवों का वनवास

August 30th, 2017

डिजिटल डेस्क,अमरावती। वायगांव का सिद्धिविनायक गणपति मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि इस गणेश मंदिर के दर्शन के बाद ही पांडवों का अज्ञातवास खत्म हुआ था। इस महाभारतकालीन मंदिर के दर्शन के लिए भक्त दूर -दूर से यहां आते हैं।

गौरतलब है कि अमरावती से मात्र 23 किमी दूरी पर स्थित वायगांव में विनायक गणपति का मंदिर है। अमरावती परतवाड़ा मार्ग के वायगांव मोड़ से पश्चिम दिशा बसे वायगांव में इस मंदिर में सिद्धिविनायक गणपति की मूर्ति स्थापित है। 1650 के दौरान स्वयं-भू प्रकट हुए गणेश की मूर्ति के संदर्भ में कहा जाता है कि मध्ययुग में मुगलकाल के दौरान जब जिले के अचलपुर, दारापुर,खोलापुर क्षेत्र में मुगलों का साम्राज्य था। अक्सर मुगलों की फौज मंदिर में स्थापित मूर्तियों को खंडित कर देती थी। ऐसे हमलों से गणेश की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए हू-ब-हू दूसरी मूर्ति बनाकर उस स्थान पर स्थापित की गई और स्वयं-भू गणेशजी की मूर्ति को भूमिगत कर दिया गया। 

खुदाई के बाद मिली मूर्ति

मुगलों का साम्राज्य समाप्त होने पर रिद्धि-सिद्धि के दाता लंबोदर गणेश की मूर्ति की खोज के लिए वायगांव क्षेत्र के अनेक स्थानों पर खुदाई की गई, लेकिन काफी खोजबीन के बाद भी गणराज की मूर्ति नहीं मिल पाई। उस दौरान जिस जगह आज मंदिर है, वहां की खुदाई की गई। वहां पर गणेश की स्वयंभू मूर्ति मिल गई, जो तकरीबन 16वें दशक की बताई जाती है। तभी से रिद्धि-सिद्धि के देवता गणेश के मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा वाड़ा रूपी मंदिर परिसर में की गई।

बाईं ओर सूंड

यह गणेशजी उस दशक से निरंतर भक्तों के दुख हर रहे हैं। संपूर्ण महाराष्ट्र का आकर्षण वायगांव स्थित गणेशजी की मूर्ति संपूर्ण महाराष्ट्र में अपने आप में विशिष्ट आकर्षण का केंद्र बनी है। बाईं ओर सूंड वाली राज्य की एकमात्र मूर्ति की बाईं ओर सिद्धि और दाहिनी ओर रिद्धि विराजमान है। मूर्ति के पैरों पर पद्म, शंख चिन्हांकित है जिसे ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। पहली किरण मूर्ति पर मंदिर में स्थापित मूर्ति के दोनों हाथों पर फूलों से बने अष्टमहासिद्ध, अनिमा, गरिमा, लगिमा, महिमा, इशित्व, वशित्व, प्राप्ति बांधी गई है। किसी भी प्रकार से असंतुष्ट व्यक्ति को इस मूर्ति के दर्शन से शांति का आभास होता है। रोजाना सूर्योदय की पहली किरण इस मूर्ति को स्पर्श करती है। 

भक्तों के सहयोग से मंदिर के कार्य 

इस मंदिर के अध्यक्ष विलास इंगोले ने बताया कि पिछले अनेक दशकों से इंगोले परिवार मंदिर की देखरेख कर रहा है। इस मंदिर के निर्माण के लिए परिवार के लोगों ने अपने खेतों में से जगह दी है। मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता भक्तों का उत्साह, भीड़ को देखते हुए परिवार के सदस्यों ने ट्रस्ट की स्थापना की। मंदिर का कार्य भक्तों से दान रुप आने वाली निधि से होता है। गणेशोत्सव के दौरान भक्तों के लिए मंडप, जल व्यवस्था, प्रशस्त प्रांगण, वाहन पार्किंग व भोजन कक्ष की व्यवस्था की गई है।

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