दैनिक भास्कर हिंदी: नितीन राऊत या सुनील केदार कौन होगा जिले का पालकमंत्री

December 30th, 2019

डिजिटल डेस्क, नागपुर। राज्य मंत्रिमंडल में जिले से 3 केबिनेट मंत्री होने के बाद यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है कि जिले का अगला पालकमंत्री कौन होगा। आरंभ में माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ मंत्रिपद की शपथ लेनेवाले 6 मंत्रियों में शामिल डॉ.नितीन राऊत नागपुर के पालकमंत्री बनेंगे। लेकिन अनिल देशमुख व सुनील केदार के केबिनेट मंत्री बनते ही चर्चा होने लगी है कि जिले में पालकमंत्री पद को लेकर स्पर्धा सामने आ सकती है। पालकमंत्री पद कोई संवैधानिक पद नहीं है। शासकीय कार्यों की निगरानी के लिए उद्देश्य के साथ मुख्यमंत्री हर जिले में पालकमंत्री नियुक्त करते हैं। कई बार स्थानीय मंत्री को ही पालकमंत्री बनाया जाता है। मंत्री की इच्छा के अनुरुप भी उन्हें जिम्मेदारी दी जाती है। गृहमंत्री रहे आर.आर पाटील को उनकी इच्छा के अनुरुप गड़चिरोली का पालकमंत्री बनाया था। नागपुर में स्थानीय को ही स्थान मिलता रहा है। शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार में नितीन गडकरी पालकमंत्री थे। बाद में कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार में सतीश चतुर्वेदी , रणजीत देशमुख, शिवाजीराव मोघे, नितीन राऊत पालकमंत्री बने। शिवाजीराव मोघे यवतमाल जिले के हैं। कहा जाता रहा कि नागपुर में कांग्रेस नेताओं की आपसी स्पर्धा को देखते हुए मोघे को दो बार नागपुर का पालकमंत्री बनाया गया। पृथ्वीराज चव्हाण के नेतृत्व की कांग्रेस सरकार के समय तो नागपुर का पालकमंत्री पद खासा चर्चा में रहा। मुख्यमंत्री कार्यालय से तत्कालीन राज्यमंत्री राजेंद्र मुलक को नागपुर का पालकमंत्री बनाने के संबंध में पत्र जारी कर दिया गया था। लेकिन शाम का निर्णय सुबह बदल गया। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया कि वह पत्र त्रुटिवश जारी हुआ। सवाल यह भी उठा था कि केबिनेट मंत्री रहते हुए राज्यमंत्री को पालकमंत्री क्यों बनाया जा रहा है। केबिनेट मंत्री रहते हुए नितीन राऊत की नाराजगी सामने आयी थी। उसके बाद उन्हें पालकमंत्री नियुक्त किया गया था। 

जिला परिषद में साथ-साथ शुरु की थी देशमुख-केदार ने राजनीति

राज्य मंत्रिमंडल के विस्तार में स्थान पानेवाले अनिल देशमुख व सुनील केदार जिले के ग्रामीण क्षेत्र की राजनीति में सबसे अधिक प्रभाव रखते हैं। दोनों की राजनीतिक शुरुआत जिला परिषद से लगभग साथ साथ ही हुई है। शिवसेना के नेतृत्व में 1995 में बनी गठबंधन सरकार में वे दोनों मंत्री बनाए गए थे। फिलहाल विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से वे सबसे करीबी पड़ोसी विधायक हैं। जिले में राकांपा के मामले में अनिल देशमुख ही सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। कार्यकर्ताओं की शिकायतें या निवेदन उनके माध्यम से ही राकांपा प्रमुख शरद पवार या अन्य राकांपा नेताओं तक पहुंचती है। वे स्थानीय स्तर पर राकांपा में पालक की भूमिका में है। शहर राकांपा में नेतृत्व को लेकर विवाद की स्थिति में उन्हें शहर अध्यक्ष भी बनाया गया था। सुनील केदार जिला कांग्रेस में प्रभावशाली स्थान रखते हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में जिले में कांग्रेस के एकमात्र विधायक चुने गए थे। सुनील केदार के पिता बाबासाहब केदार जिले में बड़े सहकार नेता रहे हैं। 1992 में अनिल देशमुख व सुनील केदार राजनीतिक मामले में साथ साथ चर्चा में आए थे। दोनों कांग्रेस में थे। देशमुख पंचायत समिति चुनाव जीते थे। उसी वर्ष  उन्होंने जिला परिषद का चुनाव जीता। सुनील केदार भी सावनेर क्षेत्र के पाटणसावंगी सर्कल से जिला परिषद का चुनाव जीते। तब जिला कांग्रेस में नेताओं में वर्चस्व की राजनीति भी अधिक चर्चा में थी। रणजीत देशमुख जिला ही नहीं प्रदेश स्तर पर कांग्रेस की राजनीति में बड़ा प्रभाव रखते थे। अनिल देशमुख व सुनील केदार के बीच राजनीतिक समझ कुछ ऐसा परिणाम कर गई िक अनिल देशमुख जिला परिषद अध्यक्ष बनकर राज्यमंत्री का दर्जा पा गए। 1995 में राज्य की राजनीति में जमकर उलटफेर हुआ। शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। सत्ता में रही कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं थी। हालांकि उस चुनाव में भी कांग्रेस 80 सीट जीतकर सबसे आगे थी। लेकिन 73 सीट जीतकर शिवसेना ने भाजपा के सहयोग से सरकार बना ली। भाजपा के 65 विधायक चुने गए थे। निर्दलीय व क्षेत्रीय दलों के 60 विधायक चुने गए थे। उनमें 45 विधायक निर्दलीय थे। यह भी बताया जा रहा है कि सबसे अधिक निर्दलीय विधायक विदर्भ से ही जीते थे। अनिल देशमुख ने काटोल व सुनील केदार ने सावनेर से निर्दलीय चुनाव जीता था। शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी तो दोनों मंत्री बन गए। देशमुख को केबिनेट व केदार को राज्यमंत्री पद मिला था। 1999 में राकांपा बनी। देशमुख व केदार ने शिवसेना भाजपा गठबंधन का साथ छोड़कर राकांपा को थाम लिया। हालांकि बाद में केदार राकांपा को छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए। दोनों के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे कार्यकर्ताओं से जुड़े रहनेवाले नेता है। संगठन मामले में विपरीत स्थिति रहने पर भी वे चुनाव जीतते रहे हैं। अनिल देशमुख 5 बार में 18 वर्ष मंत्री रहे हैं। सुनील केदार भी 5 बार विधायक चुने गए हैं।
 

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