दैनिक भास्कर हिंदी: पावर और कुर्सी के लिए यूनिवर्सिटी का पूरा साल दांव-पेंच में गुजरा

December 31st, 2018

डिजिटल डेस्क, नागपुर। यूनिवर्सिटी के लिए वर्ष 2018 अंदरूनी राजनीति से गर्माता रहा। अधिकारियों और कार्यप्रणाली में दखल रखने वाले व्यक्तियों के बीच इसी बात को लेकर रस्साकशी जारी रही कि आखिर यूनिवर्सिटी का असली ‘किंग’ कौन है। पॉवर और कुर्सी के लिए खूब दांव-पेंच अपनाए गए। यूनिवर्सिटी सीनेट, एकेडेमिक और मैनेजमेंट काउंसिल समेत बाेर्ड ऑफ स्टडीज जैसे प्राधिकरणों में चुनाव और नामांकन पूर्ण हुए। नियमों ने प्राधिकरणों की राय से ज्यादा कुलगुरु के फैसले को प्रधानता दी। इसका असर यूनिवर्सिटी की साल भर की कार्रवाई पर नजर आया। यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों की मानें तो कुलगुरु डॉ. काणे ने इस वर्ष अपने विराेधियों को साफ करके अपना खुद का "स्वच्छता मिशन' चलाया। इन सब के बीच यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों को पर्याप्त सुविधाएं प्रदान नहीं कर पाया। किसी विभाग या कॉलेज का एकेडेमिक ऑडिट नहीं हुआ। 

डिप्लोमा रद्द किया
इस वर्ष नागपुर यूनिवर्सिटी ने वर्ष 1987 में डॉ.वेदप्रकाश मिश्रा को दिया गया "पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन गांधीयन थॉट्स' का डिप्लोमा रद्द कर दिया। कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के कुलगुरु और दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के प्र-कुलगुरु डॉ. वेदप्रकाश मिश्रा पर "प्लैगेरिज्म' के जरिए यह डिप्लोमा हासिल करने का आरोप लगाते हुए यूनिवर्सिटी ने यह कार्रवाई की। एक वक्त यूनिवर्सिटी द्वारा जीवन गाैरव पुरस्कार से नवाजे गए डाॅ.मिश्रा की इससे खूब किरकिरी हुई।

विरोधियों को काबू में किया
दरअसल नागपुर विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली अब तक "मिश्रा' मिश्रित थी। यूनिवर्सिटी में एक वह भी वक्त था जब शिक्षाविद डाॅ.वेदप्रकाश मिश्रा की तूती बोलती थी। यूनिवर्सिटी के आधिकारिक फैसलों में उनका मत मायने रखता था। इधर सेंट्रल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन संचालक सुनील मिश्रा की अधिकारियों से ठनी हुई थी, उन्होंने कोर्ट में विविध याचिकाएं और जगह-जगह आरटीआई दायर करके अधिकारियों की नाक में दम कर रखा था। इस साल कुलगुरु डॉ.काणे ने दोनों विरोधियों के इतिहास के पन्ने खंगाले। डॉ.वेदप्रकाश मिश्रा का विवादित गांधी विचारधारा डिप्लोमा और सुनील मिश्रा के विवादित कॉलेज को हथियार बना कर दोनों के पंख कुतर दिए। 

सेवानिवृत्त होना पड़ा
इस साल 30 जून को डॉ. पूरणचंद्र मेश्राम यूनिवर्सिटी के कुलसचिव पद से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उनकी सेवानिवृत्ति खूब चर्चा में रही। डॉ. मेश्राम की वेतनश्रेणी से जुड़ी याचिका हाईकोर्ट में लंबित है, इसी के चलते उनकी सेवानिवृत्ति आयु पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। 18 जून को उनकी याचिका पर हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने उन्हें पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी और याचिका पर सुनवाई टाल दी। लिहाजा लंबी जद्दोजेहद के बाद उन्हें सेवानिवृत्त होना पड़ा। 

कुर्सी की खींचतान  
डॉ. मेश्राम के सेवानिवृत्त होने के बाद कुलगुरु डॉ.काणे ने कुलसचिव पद का प्रभार परीक्षा नियंत्रक डॉ. नीरज खटी को सौंपा था। इससे नाराज होकर प्रभार सौंपे जाने की आस लगा कर बैठे उपकुलसचिव डॉ. अनिल हिरेखण ने महाराष्ट्र राज्य अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के पास शिकायत की थी। अब आयोग की सिफारिश है कि डॉ. अनिल हिरेखण कुलसचिव पद का प्रभार सौंपे जाने के लिए पूरी तरह से पात्र हैं। यूनिवर्सिटी प्रशासन और कुलगुरु डॉ. काणे ने डॉ. हिरेखण को प्रभार नहीं सौंप कर उनके साथ अन्याय किया है। मामले में यूनिवर्सिटी कुलगुरु डॉ.काणे को निर्णय लेना है। 

कॉलेज बंद
यूनिवर्सिटी अधिकारियों की नाक में दम करने वाले सेंट्रल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन संचालक सुनील मिश्रा के पंख कुतर दिए। अनेक वर्षों से सुविधाओं के अभाव और विवादित चल रहे उनके कॉलेज की मान्यता रद्द करने की कार्रवाई शुरू की। एडमिशन बंद करवा दिए। यही नहीं, उनके विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इधर विद्यार्थियों की शिकायत पर मिश्रा को गणेशपेठ पुलिस थाने की हवा भी खानी पड़ी थी। 

विभाग प्रमुख का नक्सल कनेक्शन  
इसी साल यूनिवर्सिटी की अंग्रेजी विभाग प्रमुख डॉ. शोमा सेन को पुणे पुलिस ने नक्सल समर्थन के आरोप में 6 जून को गिरफ्तार किया था। यूनिवर्सिटी ने इसी के चलते उन्हें सेवा से निलंबित भी कर दिया था। यूनिवर्सिटी के किसी विभाग प्रमुख के कथित नक्सल कनेक्शन से हर कोई सन्न रह गया। 

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