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आशा दशमी व्रत: क्या है इसकी कथा व्रत विधि और लाभ 

July 08th, 2018 14:41 IST
आशा दशमी व्रत: क्या है इसकी कथा व्रत विधि और लाभ 

डिजिटल डेस्क, भोपाल। आषाढ़ शुक्ल की दशमी को आशा दशमी व्रत किया जाता है। इस वर्ष 22 जुलाई 2018 को आशा दशमी व्रत किया जाएगा। इस दिन प्रात:काल स्नानादि कर शुद्ध स्थान पर जौ के चूर्ण से सस्वरूप युक्त इंद्रादि देवताओं के चित्र अंकित करें। फिर उनका चन्दन, गंध, धूप, पुष्पादि से पूजन कर उन्हें घृत निर्मित नैवेद्य और ऋतु फल अर्पित कर दीप जलाएं।

इस प्रकार आषाढ़ शुक्ल दशमी से आरंभ कर प्रतिमाह शुक्ल पक्ष की दशमी को उक्त विधि से व्रत करने से सारी आशाओं की पूर्ति होती है। इस कारण से इसे आशा दशमी कहते हैं।

नवमी को उपवास रखने के उपरांत दशमी के प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर श्री हरि का स्मरण करते हुए उनका पुष्प, गंध, धूप, फल आदि से पूजन कर उनके सभी आयुधों, चक्र, गदा, मूसल, खड्ग आदि का लाल पुष्पों से पूजन करें तथा गुड़ निर्मित नैवेद्य चढ़ाएं। इसके पश्चात अतिरिक्त स्थान पर द्रोण परिमित तिलों का कमल बनाकर उसके ऊपर अच्छे रंग से आठ कलियों वाला कमल बनाएं।

फिर पूर्व से आरंभ कर कमल दलों पर मन, त्वचा, श्रवण, चक्षु, घ्राण, प्राण, बुद्धि आदि का मानसिक पूजन करें एवं हरि से शरीर के निरोग एवं स्वस्थ रखने की प्रार्थना करें। ऐसा करने से शरीर निरोग रहता है तथा मन शुद्ध रहता है। इसी कारण से इसे आरोग्य व्रत भी कहा जाता है।


आशा दशमी की पौराणिक व्रत कथा

इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में निषध देश में एक राजा राज्य करते थे। उनका नाम नल था। उनके भाई पुष्कर ने द्यूत में जब उन्हें पराजित कर दिया, तब नल अपनी भार्या (पत्नी) दमयंती के साथ राज्य से बाहर चले गए। वे प्रतिदिन एक वन से दूसरे वन भ्रमण करते रहते थे तथा केवल जल ग्रहण करके अपना जीवन-निर्वाह करते थे और निर्जीव भयंकर वनों में घूमते रहते थे।

एक बार राजा ने वन में स्वर्ण-सी कांति वाले कुछ पक्षियों को देखा। उन्हें पकड़ने की इच्छा से राजा ने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया, परंतु वे सभी वस्त्र को लेकर आकाश में उड़ गए। इससे राजा बड़े दु:खी हो गए। वे दमयंती को गहरी निद्रा में देखकर उसे उसी स्थिति में छोड़कर वहां से चले गए।

जब दमयंती निद्रा से जागी, तो उसने देखा कि राजा नल वहां नहीं हैं। राजा को वहां न पाकर वह उस घोर वन में विलाप करते हुए रोने लगी। बहुत दु:ख और शोक से संतप्त होकर वह नल के दर्शन की इच्छा से इधर-उधर भटकने लगी। इसी प्रकार कई दिन बीत गए और भटकते हुए वह चेदी देश में पहुंची। दमयंती वहां उन्मत्त-सी (पागल-सी) रहने लगी। वहां के छोटे-छोटे शिशु (बच्चे) उसे इस अवस्था में देख कर भीड़ लगाकर घेरे रहते थे।

एक बार कई लोगों में घिरी हुई दमयंती को चेदि देश की राजमाता ने देखा। उस समय दमयंती चन्द्रमा की रेखा के समान भूमि पर पड़ी हुई थी। उसका मुखमंडल प्रकाशित था। राजमाता ने उसे अपने भवन में बुलाया और पूछा तुम कौन हो देवी ?

इस पर दमयंती ने लज्जित होते (शर्माते) हुए कहा- मैं विवाहित स्त्री हूं। मैं न किसी के चरण धोती हूं और न किसी का दिया भोजन करती हूं। यहां रहते हुए कोई मुझे प्राप्त करेगा तो वह आपके द्वारा दंडनीय होगा। देवी, इसी प्रतिज्ञा के साथ मैं यहां रह सकती हूं। राजमाता ने कहा- ठीक है, ऐसा ही होगा।

तब दमयंती ने वहां रहना स्वीकार किया। इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ। फिर एक ब्राह्मण दमयंती को उसके माता-पिता के घर ले आया किंतु माता-पिता तथा भाइयों का स्नेह पाने पर भी पति के बिना वह बहुत दुःखी रहती थी।

एक बार दमयंती ने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाकर उससे पूछा- 'हे ब्राह्मण देवता! आप कोई ऐसा उपाय, दान एवं व्रत बताएं जिसको करने से मेरे पति मुझे प्राप्त हो जाएं।' इस पर उस ब्राह्मण ने कहा- 'तुम मनोवांछित सिद्धि प्रदान करने वाले आशा दशमी व्रत को करो, तुम्हारे सारे दु:ख दूर होंगे तथा तुम्हें अपना खोया पति वापस मिल जाएगा।'

तब रानी दमयंती को उस विप्र ने 'आशा दशमी' व्रत का पालन करने को कहा तब से रानी दमयंती ने इस व्रत का पालन करना आरंभ कर दिया और कुछ समय बाद जब उसने अपने पति को पा लिया तब उसने अनुष्ठान किया और इस व्रत के प्रभाव से दमयंती ने अपने पति को पुन: प्राप्त कर लिया, और हंसी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत किया और मोक्ष धाम को प्राप्त हुई।
 

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