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आज है आषाढ़ माह की देवशयनी एकादशी

July 23rd, 2018 13:32 IST

डिजिटल डेस्क, भोपाल। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी व्रत 23 जुलाई 2018 को पड़ रहा है। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी, पद्मनाभा तथा प्रबोधनी के नाम से भी जाना जाता है। देवशयनी एकादशी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया है। इस व्रत को करने से जातक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, तथा सभी पापों का नाश होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना करने का महत्व होता है। देवशयनी की इस रात्रि से भगवान का शयन काल आरंभ हो जाता है।

देवशयनी एकादशी का पौराणिक महत्व 

देवशयनी या हरिशयनी एकादशी के विषय में पुराणों में विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है जिनके अनुसार कहा जाता है कि इस दिन से भगवान श्री विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्री विष्णु उस लोक के लिए गमन करते हैं और इसके पश्चात चार माह के अंतराल के बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने पर विष्णु भगवान का शयन समाप्त होता है तथा इस दिन को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत शैय्या पर शयन करते हैं इसलिए इन माह अवधियों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है।


देवशयनी एकादशी पूजा विधि

देवशयनी एकादशी व्रत का आरंभ दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाता है। 
दशमी तिथि की रात्रि के भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।  
अगले दिन प्रात: काल उठकर दैनिक कार्यों से निवृत होकर व्रत का संकल्प करें।  
भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन करना करें।  
पंचामृत से स्नान करवाकर भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा करनी करें।  
भगवान को ताम्बूल, पुंगीफल अर्पित करने के बाद मन्त्र द्वारा स्तुति करना चाहिए।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

प्रबोधनी एकादशी से संबन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है| सूर्यवंशी मान्धाता नाम का एक राजा था। वह सत्यवादी, महान, प्रतापी और चक्रवती था। वह अपनी प्रजा का पुत्र समान ध्यान रखता था। उसके राज्य में कभी भी अकाल नहीं पड़ता था। परंतु एक समय ऐसा आया की राजा के राज्य में अकाल पड़ गया अत्यन्त दु:खी प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी यह देख दु;खी होते हुए राजा इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन ढूंढने के उद्देश्य से सैनिकों के साथ जंगल की ओर चल दिए घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे।

राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम कर उन्हें अपना कष्ट विवरण सहित बताया। इस पर ऋषि ने उन्हें देव शयनी एकादशी व्रत करने को कहा। ऋषि के कथन अनुसार राजा ने एकादशी व्रत का पालन किया और उन्हें अपने संकट से मुक्ति प्राप्त हुई।

इस व्रत को रखने वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है। देव शयन एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

 

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