दैनिक भास्कर हिंदी: फिलिस्तीन शरणार्थियों की मदद से अमेरिका ने हाथ खींचे, UNRWA को नहीं देगा फंड

September 1st, 2018

हाईलाइट

  • अमेरिका ने फिलिस्तीन शरणार्थियों की मदद से अपने हाथ खींच लिए हैं।
  • शुक्रवार को घोषणा करते हुए अमेरिकी सरकार ने कहा कि वह अब से UN की संस्था UNRWA को कोई फंड नहीं देगा।
  • UNRWA वही संस्था है, जो फिलिस्तीन शरणार्थियों के लिए काम करती है।

डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक और फैसले से देश और दुनिया को चौंका दिया है। इस बार अमेरिका ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों की मदद से अपने हाथ खींच लिए हैं। शुक्रवार को घोषणा करते हुए अमेरिकी सरकार ने कहा कि वह अब से UN की संस्था UNRWA को कोई फंड नहीं देगा। UNRWA वही संस्था है, जो फिलिस्तीन शरणार्थियों के लिए काम करती है। फंड नहीं मिलने से इस सामाजिक कार्य पर काफी गहरा असर पड़ सकता है। बता दें कि पिछले साल अमेरिका ने इस एजेंसी को 350 मिलियन डॉलर्स दान किए थे।

बता दें कि अमेरिका यूएन रीलिफ ऐंड वर्क्स एजेंसी (UNRWA) का सबसे बड़ा डोनर रहा है। मगर अब से फिलिस्तीन के रिफ्यूजियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी को अमेरिका कोई फंड नहीं देगा। UNRWA ने भी इस फैसले की आलोचना की है और एजेंसी पर लगाए गए आरोपों का खंडन किया। वहीं स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता हीथर नॉर्ट ने कहा कि प्रशासन ने इस मुद्दे को अच्छी तरह से देखा है और फिर फैसला लिया है कि अमेरिका अब UNRWA को कोई फंड नहीं देगा।

फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के एक प्रवक्ता ने इस फैसले को फिलिस्तीन के लोगों पर हमला बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र के रेजलूशंस को चुनौती देने जैसा है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ऐंटोनियो गुटरेस ने मामले पर टिप्पणी करते हुए इस फैसले की निंदा की है। उन्होंने कहा कि UNRWA को पूरी उम्मीद है कि दूसरे देश इस फाइनैंशल गैप को खत्म करने में पूरी मदद करेंगे ताकि यह संस्था अपना काम जारी रख सके। ट्रंप के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए गए हैं, जिसमें फिलिस्तीन के लोगों की अनदेखी की गई है। इन फैसलों में येरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करना भी शामिल है।

गौरतलब है कि 68 साल पुरानी संयुक्त राष्ट्र की यह  UNRWA एजेंसी 5 मिलियन फिलिस्तीन शरणार्थियों की जॉर्डन, लिबिया, सीरिया, वेस्ट बैंक और गाजा जैसे देशों में मदद कर रही है। इनमें से अधिकतर शरणार्थी वे हैं जिन्होंने 1948 के युद्ध के बाद अपने घर छोड़ दिए थे।

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