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बच्चों को मातृभाषा में ही मिले प्राथमिक शिक्षा, बने नई भाषा नीति

बच्चों को मातृभाषा में ही मिले प्राथमिक शिक्षा, बने नई भाषा नीति

डिजिटल डेस्क, मुंबई। महानगर के कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों और भारतीय भाषा प्रेमियो  ने केंद्र सरकार ने अंग्रेजी के दबदबे को खत्म करने में पहल की मांग की है। मुंबई में पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सरकार से भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने और त्रिभाषा नीति पर फिर से विचार करने की अपील की है। कार्यक्रम में शामिल लोगों के मुताबिक अगर इस बाबत ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हिंदी, मराठी, गुजराती भारतीय भाषाएं समाप्तप्राय हो जाएंगी। 

भारतीय भाषा स्वाभिमान सभा में सुविख्यात लेखिका पुष्पा भारती ने समाज और सरकार दोनों से अपील की कि अब देर न करें।  सभी मिल कर अब अंग्रेजियत हटाएं, और देश को भाषायी दासता से मुक्ति दिलाएं। उन्होंने कहा कि अंग्रेज हमारी भाषाओं को वर्नाकुलर लैंग्वेज कहते थे।  वर्नाकुलर का अर्थ है मालिक के घर में पैदा हुए गुलाम की अकुलीन और अभद्र भाषा। इस  सम्बोधन में मां के लिए गाली भी छिपी है, और नस्ल बदल देने का अहंकार और अभिमान भी छिपा है।  उन्होंने कहा कि बावजूद इसके, हमारे कुछ तथाकथित अभिजात जनों ने खुद को मालिक और दूसरों को वर्नाकुलर समझ लिया। अपने को श्रेष्ठ बनाये रखने के लिए उन्होंने भारत की हर चीज को छोटा किया है। हमारी भारतीय भाषाएं भी उनके इस षड्यंत्र का शिकार हैं। उन्होंने अंग्रेजी को लेकर श्रेष्ठता और कुलीनता का, उच्च स्तर की और कम्प्यूटर के जमाने की भाषा होने का, रोटी और रोजगार का माध्यम होने का एक ऐसा मिथक और जुनून खड़ा कर दिया है कि देश के बहुत सारे लोग, आम और खास सभी उसी ओर दौड़ पड़े हैं ।

कुछ राजनेताओं ने भी भिन्न-भिन्न कारणों से इसी बात को तरजीह दी, और देश को समझ की नहीं बल्कि एक समझौते की भाषा नीति में फंसा दिया। इन राजनीतिक समझौतों और समायोजनों को अब समाप्त किया जाना चाहिए; और देश की भाषा नीति को लेकर हमारे जो संवैधानिक संकल्प और स्वतंत्रता आंदोलन के सपने थे, उन्हें पूरा करना चाहिए। कार्यक्रम में शामिल हुए महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह ने कहा कि हिंदी में बहुत लचीलापन है, इसमें सबके साथ खड़े होने की अद्भुत ताकत है। हमें इस ताकत का देश की भाषाओं को जोड़ने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इस जोड़ से जो भारतीय भाषा बनेगी, वह सबकी होगी, और सबको मज़बूत करेगी।

सभा में मुख्य वक्ता मधुकर भावे ने हिंदी  को राष्ट्रभाषा बनाने की पुरजोर अपील की।  उन्होंने कहा कि जिस देश की राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह राष्ट्र भी नहीं होता। भारत सरकार को इस सवाल को अविलम्ब हल करना चाहिए। मुंबई उर्दू पत्रकार संघ के अध्यक्ष सरफराज आरजू , वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह, मराठी भाषा के विद्वान प्रमोद मसूरकर और हिंदी भाषी राजनेता शिवजी सिंह ने भी भारतीय भाषाओं के पक्ष में और मातृभाषा को ही शिक्षा का प्राथमिक माध्यम बनाने की पैरवी की। सभा का संचालन पत्रकार ओम प्रकाश ने और व्यवस्थापन कवि -पत्रकार अमर त्रिपाठी ने किया।

सभा में मन मोहन सरल , निजामुद्दीन राईन, अनवर आजमी, प्रीतम कुमार सिंह त्यागी, ओम प्रकाश तिवारी, गंगा शरण सिंह, राजेंद्र सिंह सेंगर, सिद्धार्थ आर्य, रामबक्श सिंह, चित्रसेन सिंह, उदय प्रताप सिंह, महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे, अवधेश व्यास, राज कुमार सिंह, अवधेश व्यास, अधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद पांडे, कृपा शंकर पांडे,  प्रशांत त्रिपाठी, जय शंकर तिवारी, राज किशोर त्रिवारी, राम आसरे सिंह, घनश्याम सिंह, विजय यादव, सर्वेश सिंह, बीना सिंह समेत साहित्य, पत्रकारिता और समाजसेवा से जुड़े अनेक मान्य लोग शामिल हुए।  

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