comScore

आस्था या अंधविश्वास : सर्पदंश पीड़ुितों का मेला, मंत्रों से बांधे गए बंधन खोले गए

September 15th, 2018 17:35 IST
आस्था या अंधविश्वास : सर्पदंश पीड़ुितों का मेला, मंत्रों से बांधे गए बंधन खोले गए

डिजिटल डेस्क, छिन्दवाड़ा/परासिया। मेडिकल साइंस ने कितनी ही तरक्की कर ली हो, किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि वे आज भी जीवन और मौत दोनों पर भारी पड़ रहीं हैं। सर्पदंश पर उपचार करवाने के स्थान पर झाड़ फूंक करवान इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसका प्रमाण कल उन स्थानों की भीड़ देखकर मिला जहां सर्पदंश के शिकार लोग गुनिया ओझा से वह धागा खुलवाने हजारों की संख्या में पहुंचे थे।

खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों को नियंत्रित करने और पर्यावरण मित्र कहे जाने वाले सर्प को उनकी उन्हीं विशेषताओं के चलते पूजा जाता है। देश में 80 फीसदी सर्प में विष नहीं होता है। इस मामले में अधिकांश मौते पीड़ित के घबरा जाने पर हार्ट फैल होने अथवा ब्रेन हेमरेज होने से होती है। सर्पदंश पीड़ित के पैर में पंडा-पड़िहार काकाला धागा बंध बांधते हैं। ऋषि पंचमी के दूसरे दिन अर्थात भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की षष्टी को ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश पीड़ितों को मंत्रों से बांधे गए बंधन खोलने विशेष पूजन अर्चना हुई।

यहां हुए आयोजन
आदिवासी बाहुल्य जिला छिंदवाड़ा के विभिन्न भागों में सर्पदंश पर झड़ाई फुकाई करने वाले आसानी से मिल जाते हैं। जो अपनी पृथक-पृथक तरीकों से सर्पदंश पर विष उतारने अर्थात विष का प्रभाव नगण्य करने का दावा करते हैं। परासिया- जुन्नारदेव- तामिया ब्लाक के विभिन्न आबादी वाले क्षेत्रों में भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी और षष्टी पर सर्पदंश पीड़ितों का मंत्रों से विष रोकने की प्रक्रिया के तहत अगली प्रक्रिया पूर्ण की गई।

ब्लाक परासिया के गांव बरारिया में पड़िहार बिरजू कहार, उसके सहयोगी संत कुमार डेहरिया, दिलीप डेहरिया, मंतलाल अहके, गंगाराम कहार, सजन कहार, संजय कहार, विनोद कहार, मुनीर कहार, जगदीश कहार ने बंध खोलने प्रक्रिया पूर्ण की। वहीं तामिया के खंचारी गांव में पड़िहार श्याम लाल कहार, उनके सहयोगी मूलचंद पाल, लखन राय, विष्णु कहार, छुटल्ला यादव ने यह पूजन आराधना की।

मान्यता है कि
जिन्हें सर्पदंश होने पर मंत्रों से बंधन बांधकर बचाया गया। उन सभी के बंधनों को पंचमी और षष्टमी को खोलने की प्रक्रिया पूर्ण हुई। प्रात: पड़िहार और उसके सहयोगियों ने लकड़ी की पटिया पर अंकित नागदेव का सामूहिक रूप से पूजन किया। यहां सर्पदंश पीड़ितों द्वारा लाए गए प्रसाद को अर्पित कर तीन- तीन सादे पान को एक सफेद कपड़ा में बांधकर एक अन्य पड़िहार को दिया गया। जो खुले आसमान के नीचे सूर्य की ओर मुख कर लकड़ी के पटा में उक्त कपड़े को रखकर उसकी गांठ को खोलकर वापस लौटा देता है। नदी और मेढ़ पर ऊगने वाला चारा- साटा को जड़ से उखाड़कर लाया और उसके नीचे सर्पदंश पीड़ित को खड़ा किया। मंत्रोच्चारण के साथ एक व्यक्ति ने एक पात्र से पीड़ित के सिर पर दूध डालना प्रारंभ किया, वहीं पीड़ित के पैर में बंधा धागा खोलने का प्रयास करने वाला पड़िहार अचानक अचेत हो गया। जिससे उसके सहयोगियों ने अपने हाथों में उठाए रखते हुए उसके कान में जोरों से मंत्रोच्चारण सुनाया। यह प्रक्रिया 5 से 7 बार दोहराई गई। उसके बाद उक्त पड़िहार ने होश मेें आकर पीड़ित के पैर में बंधा काला धागा को छोड़ दिया। पड़िहार के अनुसार सर्पदंश पीड़ितों को मंत्र बंधन खुलवाने पहुंचना अनिवार्य है, जो इस वर्ष नहीं आए, उन्हें अगले वर्ष आना होता है। किन्हीं कारणों से नहीं आने पर उनके परिजनों को इस पूजन में शामिल होना अनिवार्य है।

इनका कहना है
सर्पदंश पर झड़ाई फुकाई की अपेक्षा अस्पताल पहुंचकर उपचार करवाना चाहिए। साधनों के अभाव में लोग पहले पड़िहार के पास पहुंच जाते थे। मंत्रों से सर्पदंश के उपचार की परम्परा अभी भी जारी है। चिकित्सा सुविधाएं बढ़ने, अस्पताल पहुंचने के संसाधन उपलब्ध होने और जागरूकता आने से अब लोग उपचार के लिए अस्पताल पहुंचने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
जगदीश पाल, अध्यक्ष- अंत्योदय समिति, ब्लाक परासिया.

कमेंट करें
kFWrJ